नापाक हरकते कभी पाक नहीं होती , चालबाजी कभी इत्तेफाक नहीं होती , वास्ता दे-दे के जो अनुसरण करवाये , ऐसे मजहबों की कोई धाक नहीं होती। बलात् भगत जितना भी बद्ध दिखाए, जहन किंतु श्याम वर्ण त्याग न पाए , क्रिया, मुख से जितना भी दम्भ भरे, त्रासित छाती कभी चाक नहीं होती। नियम,नियमावली ऐसे कामगार के, तामील होती है ज्यूँ ,बेड़ियां डार के , एक आजाद शख़्सियत वहाँ होती है, जहां बंदिशों की कोई ताक नहीं होती। अपने लिए तो बटोरा उस पार तक, और दूसरों का छीना जीने का हक़ , नृशंसता की हर हद लांघी है फिर भी, शर्म से नीची कोई नाक नहीं होती। साये में जिंदगी कोई करामात ही है , मुकाम मिले तो वो भी खैरात ही है , अस्तित्व का सच तो ये है 'परचेत ', अवसानोपरांत कोई ख़ाक नहीं होती।