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Showing posts from August, 2008

सेठ की मंदबुद्दी संतान !

उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र में ( विशेषकर टेहरी गढ़वाल में ) स्थानीय पहाडी भाषा मे एक मुहावरा बहुत प्रचलित है “सेट्ठुगा लाटा-काला” जिसका अर्थ है सेठ लोगो के मंद बुद्धि बच्चे ! इस मुहावरे के पीछे की कहानी कुछ इस तरह है : हुआ यूँ कि एक गाँव में एक सेठ ( धनी साहूकार ) परिवार रहता था, सेठ उसकी पत्नी यानि सेठानी और उनके चार बच्चे ! फसल कट चुकी थी, और फसलों की कुठायी और सफाई का काम चल रहा था, सेठ के खलिहान में एक बहुत बड़ा ढेर भट्ट ( स्थानीय एक किस्म की दाल ) का लगा हुआ था। रात को सेठ-सेठानी आपस में बात कर रहे थे, सेठानी ने सेठ से कहा ” आजू सी भट्ट भी छन रयाँ फूकण थै ( अर्थात साधारण हिन्दी भाषा में जिसका मतलब है कि अभी फूकने के लिये यह भट्ट भी रहे हुए है, जबकि वास्तविक कहने का सेठानी का मतलब था कि बाकी फसल का अनाज तो हमने सम्भाल दिया है मगर कूठाई-सफ़ाई के लिये अभी भट्ट बाकी रहे हुए है ) सेठ जी के बच्चे उनका वार्तालाप सुन रहे थे। अगले दिन सेठ और सेठानी एक शादी में सरीक होने के लिये पड़ोस के गाँव गए और जब शाम को लौटे तो खलिहान में राख का एक बड़ा ढेर देख दंग रह गए , बच्चो से पूछा कि ये सब कैं...

लघु कथा- धना

देश के बहुत से ऐसे रणबांकुरे जो १९६५ और ७१ के भारत-पाक युद्ध में कहीं गुम हो गए थे, अफ़सोस कि उनमे से अधिकाँश को देश आज तक नही ढूंड पाया। इनमे से  ऐंसा ही एक बदनसीब था, धनसिंह। उत्तराखंड के सुदूर अल्मोड़ा के इर्द-गिर्द बसे पहाडी गांवो का एक निवासी, तीन बहनो का इकलोता भाई। गरीब परिवार की मजबूरियां और देश-प्रेम की भावना उसे १२वीं पास करने के बाद रानीखेत कैंट खींच लायी और वह सेना में भर्ती हो गया। अभी रंगरूटी पास ही की थी कि देश के पूर्वी और पश्चमी मोर्चे पर युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। बाग्लादेश की आग पश्चमी मोर्चे तक भी पहुच चुकी थी। अत: एक दिन उसे भी जम्मू से लगी सीमा के एक मोर्चे पर तैनात होने के आदेश दे दिए गए।  जब उसे सेना की एक टुकडी के साथ दुश्मन की अग्रिम पोजिशन को पता लगाने भेजा गया तो दोनों पक्ष आपस में भीड़ गए , घमासान युद्ध हुआ, उसके सभी साथी मारे गए, जिनकी लाशें बाद मे सेना को मिल गई, मगर धनसिंह की न तो लाश मिली और न ही फिर वह लौटकर घर आया। युद्ध ...