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अतृप्त भाव

सुबह-सबेरे, स्कूल-बस पकड़ने की जद्दोजहद, दौड़ते विद्यार्थी की पीठ पर लदा वो बस्ता हूं मैं, खुद की तो ख़ाक मे मिला दी शख्सियत हमने, फिर भी अभी चुनिंदा दिलों मे बसता हूं मैं।  कभी दिल तो हमारा भी करता है रूठ जाने को, मगर चाह के भी एहसास न होने देता जमाने को, मन के कोने मे छुपा रखें हैं अतृप्त भाव सारे, चेहरे पर हमेशा ओढ़े रखता सरसता हूं मैं।   अबाधित जिंदगी की डगर, हमसे पूछती हो ? इतनी भी अंजान न बनो , सबकुछ बूझती हो, खुद का मुकाम पाने को जिसे पैरों से रौंदकर  कई एहसान फरामोश निकल गए, वो रस्ता हूं मैं।

किसे बताऊं?

शाम-ए-तन्हाई ! देख लिया सब-कुछ आज़माकर, दो पैग पीड़ा के 'परचेत', जिंदगी बसर हो गई,  चखने मे गम खा-खाकर।

कबूलनामा

  दौर-ए-जवानी का वो मदहोश  वक्त भी क्या था, शाम को घर लौटते हुए राह मे, फूल भी मिले, कांटे भी मिले, घर की देहलीज पर पहुंचकर  हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो, मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।  

रूबर

  सेवानिवृत्ति का जुनून  आहिस्ता-आहिस्ता  मौत के घाट उतार देगा हमको,  कहां मालूम था कि  गांव का अकेलापन इकदिन,  इस कदर मार देगा हमको।

पशेमानी

तुम्हारी ख़्वाहिशों के बोझ तले दबकर भी  मैं तुमको जरूर नजर आया होता, अगर ऐ जालिम तुमने, कामयाबी का दर्जा पाने को  अपना ये जाल न बिछाया होता।

परिवेश

अफसोस, कि अब ये कैसा ज़माना आ रहा है, बोलने को तो गद्दार  भूख हड़ताल पर बैठे हैं  मगर, आनलाइन  विदेशों से वास्ते उनके, खाना आ रहा है।

बंजारा

अरे ओ बंजारे! ठिकाना ना ही  तेरा मुकम्मल है  और ना ही मेरा मुकम्मल, पहचान मतलबी, राह अजनबी,  अचानक मिल गए इक वीराने सहरा मे, फिर मिलें न मिलें तू भी मुसाफिर,  मैं भी मुसाफिर!

अधूरी धड़कन।

  राह चलते जिंदगी की   मैं गुम हो गया,  भीड़ मे रहते हुए भी  तन्हाई मे खो गया,  कोई तो आए पास मेरे,  गिड़गिड़ाए एहसास मेरे,  एकाकी रात, अधूरे ख्वाब, चादर ओढ़ मैं सो गया।

अफसोस

  निष्पक्षता धसी दुराचार के दल-दल मे, निडरता कुटिलता से डर गई,  कागजों के बागी तेबर देखकर, कलम जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर गई। दौर-ए-काॅकरोच, हया गुमशुदा हुई, परतें शराफ़त की चेहरों से उतर गई,  मोटी सी वो किताब जिसे  बाबासाहेब ने लिखा था, सुना है उसे,  अपने ही घर की चुहिया कुतर गई।

ओझल

 वादों-इरादों की राह बहुत लम्बी थी, मैं ऊब गया, आसां जो तेरे प्यार की दरिया मिली, मै डूब गया।

यथार्थता

सफर रुका नहीं और  मिलते गये काफिले हमको, शिकवे गले मिले और दिल पे लगा गये गिले हमको,  इम्तहानों के दौर से,  हम बेधडक गुज़रे हैं 'परचेत', हौंसले रक्त से मिले  और फैसले वक्त से मिले हमको।

विडम्बना देखिए

  दोनों की ही सरकारी नौकरी थी,  अच्छी तनख्वाह के अलावा, ऊपरी मे भी खूब लूटा-खसौटा, सोना-चांदी जो हाथ आया समेटा, कुछ नहीं तो भागते चोर का लंगोटा। अपने दोनों ही बच्चों को  उन्होंने  अच्छे स्कूलों से तालीम दिलवाई किसी कोर्स के लिए प्रतिस्पर्धा से जब वो चयनीत न हो पाए तो अवैध चंदे की थाली सजवाई। बच्चे दोनों मूल छोड़कर अपना अब, विदेश जाकर बस गए हैं, और मां-बाप सूरत को तरस गये हैं, लौटकर  मिलने आएंगे वो कभी, पति-पत्नी इसी भ्रम मे है, बाप पिछले साल गुजर गया, मां अभी वृद्धाश्रम मे है।

संयोग

  ठुकरा गई थी वो जो हमको  दौर-ए-जवानी कुछ तन्हाइयां, उम्र के इस पड़ाव पर फिर से, बेताब हैं हमें गले लगाने को 'परचेत'। 

विडंबना

 न नींद ही बची,  न खुद को  मच्छरों से ही बचा पाए, रात भर खुजलाते-खुजलाते करते रहे हाये-हाए, पैर पसारने को हमने चारपाई और चादर बडी की थी,  मगर 'परचेत',  फिर भी खुलकर नही सो पाए।

बेवक्त

कुछ बेहुदे सवाल,  इस वक्त पे ना ही पूछिए  हमसे जनाब, अभी-अभी लौट के आए हैं,  दफ़न करके,  दिल के अधूरे ख़्वाब।

मेरा नसीब

पूछा भी तो किससे तुमने  मिरे बारे मे 'परचेत', वो नकचढ़ा नसीब है, अक्सर मुझसे ख़फ़ा ही रहता है।

जज्बा

मिरी आदत मे शुमार है  मेरी साफगोई का असर,  जो मुंह में आता है वो  मैं बेधड़क बोल देता हूं, कोई मेरी ढलती उम्र पर न जाए  तो बेहतर होगा 'परचेत', बत्तीसी आधी रह गई फिर भी  बीयर की बोतल का ढक्कन,  मैं अभी भी दांतों से खोल देता हूं। #औरमधुशालाकीशाकीमेरामुहतकतीरहजातीहै 🤣

नहीं समझोगे ,,,

हमारे लिए तो तुम  हमेशा अहम थे  मगर पाले तुमने ही  कुछ वहम थे,  तेरे वास्ते मुसीबतों मे भी मुश्किलों को  जिसने गले लगाया, वो हम थे,                          लिबास बदलने से बदल नहीं जाता  फ़क़त कोई किरदार 'परचेत', तुम जानते हो, तमाशा खडा करने मे  वरना  हम क्या किसी से कम थे?

अधूरे ख्वाब

खुशियों तक पहुंचने के दिल मे अरमान बहुत थे, नहीं पहुंच पाया 'परचेत' राह मे  तूफान बहुत थे।

गुस्सा

अपनी हर परेशानी का सबब, मैं तेरे मूंह पे फेंक देता, गर ये कश्ती का मुसाफिर 'परचेत', समंदर देख लेता।

मेरा देश महान!

  कुशल नेतृत्व और दृढ़ संकल्प के लिए  ५६ इंच की छाती ढूंढते हैं, और रोज़मर्रा के संचालन के लिए  अनुसूचित जाति, जनजाति ढूंढते हैं

अधूरा शेर...5

पडोस का माहौल, आबोहवा और रहन-सहन,  बिन बात खिलखिलाना, ठिकाना रास आना, अगर हमसे पूछना ही है 'परचेत, तो यह पूछो  कि किया जाता है कैसे मुस्कुराकर गम छुपाना।

अधूरा शेर....4

यही पूछने को बेताब है 'परचेत' जमाने भर से कि  आखिर दीखता कैंसा होगा पलकों का शामियाना ।

अधूरा शेर...3

सच बोलने का फलसफा कुछ ऐसा मिला 'परचेत', कि किसी ने भी बढ़कर कभी गले नहीं लगाया।

अधूरा शेर...2

सबकी उलझनों को सुलझाने मे ही बसर गई, उलझी अपनी भी थी 'परचेत', मगर गुज़र गई...

अधूरा शेर

 ........नहीं मालूम कि सज़ा भुगती है   अबतक किस जुर्म की 'परचेत', उम्र गुजर भी गई है तो क्या, यकीं रख, वक्त अभी अच्छा भी आ सकता है।

विडम्बना

हमने तो बस उन्हें  जिंदगी के एग्जाम की सलाह दी थी, नही मालूम था कि वो, इल्जाम लगाने मे इतने माहिर होगें।

चराग तले...

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  नाम सूरत और शहर की ऐसी सूरत, आ जाते हैं, मुंह उठाके ज़रूरत बे-ज़रूरत, मशहूर हो जाने की ख़्वाहिश है मगर, चराग ढूंढे है फिर भी 'परचेत', अंधेरे की मूरत।

मार

कजरारी जुल्फ़ों और गलमुच्छों का रंग  कब धवल हुआ 'परचेत', कुछ पता ही न चला, बस, साज़ और सामान जुटाने मे ही मसरूफ़ रह गया,  वक्त कब हाथ से निकल गया, कुछ पता ही न चला।

रे मन !

मानसून का जोर, मूसलाधार बारिश, आंधी और तूफान बहुत हैं, पकडी है जो राह तूने  जिस डगर चला रहा है तू  अपनी कश्ती,  याद रखना,  उस डगर मे उफ़ान बहुत हैं।

परामर्श !

  हो वर्चस्व की यदि अंंतहीन जंग, उसे मरते दम तक कभी न हारो, भद्र-प्रतिद्वंद्वी, बर्ताव हो निश्छल, हो शत्रु कपटी, उसे होश से मारो। मरुधर जो उगले, नफरत का लावा, तीव्र-प्रबल धार जल कोष से मारो। निष्क्रिय होकर बोले, शटुतित धावा, लक्ष्यसिद्ध शस्त्र साध, जोश  से मारो।। विघ्न उपजाना ही तरल धर्म है रिपु का, उसका हल निकाल, उसे ठोस से मारो। जो फर्क न समझे, मनुष्यत्व का, ऐसे अक्ल के मारे को 'परचेत', रोष से मारो।।

एक पुष्प की अभिलाषा।

  मुझे चाहिए इक ऐसा दूल्हा, घर मे फूक सके जो चूल्हा, करे जो मन, कभी झूलन को झूला, दर्द करे ना कोई उसका पिंडली, एंडी और कूल्हा, मुझे चाहिए इक ऐसा दूल्हा, घर मे फूक सके जो चूल्हा।

कश्मकश

खुबसूरत सपने हमने भी सजाए थे, क्योंकि हम भी कभी फितरत वाले थे, पूरे न हुए वो अलग बात है, 'परचेत', मगर ख्वाब तो हमनें भी बहुत पाले थे।

आरज़ू

मंजूर तेरी हर ख्वाहिश, भले ही तू मेरे पास मत रहना, बस, इतनी सी आरज़ू है , अकेले तू उदास मत रहना।

शुन्य

उसका स्वरूप  हरदम सराहता हूं, जिस रोशनी को  दिल से चाहता हूं, आश लगाए रहता हूं  कि रोशनी कभी तो  मेरे घर आएगी,  अतिशय प्रेममय होकर आलिंगनबद्ध हो जाएगी। सुबह-सवेरे उठकर खोल देता हूं घरके सारे किवाड़, परदे, उम्मीद का बस, इतना सहारा, मेहनत कभी तो रंग लाएगी।।

बदलता मौसम

  जज़्बात अब हदों से आगे बढ़ने लगे हैं, अल्फ़ाज़, खामोशियों से झगड़ने लगे हैं, हर चीज तय दायरे पार करने लगी है, अंदाज मे खुमारी 'परचेत',  मदहोशियों के रंग चढ़ने लगे हैं।

समाप्त होता अध्याय ....

बिन पिए और बिना कुछ कहे, आज वो चुपचाप सो गया है, लगता है जिंदगी का खज़ाना 'परचेत', अब खत्म हो गया है।

ख़्याल !

दिल मे न गिला रखते, जुबां पर न  सिकवा आता, गर दृष्टा ही सही होती, दृष्टिकोण ही बदल जाता, सब्र से उठा लेते, उनकी हर इक  तशद्दुद ' परचेत', कमबख़्त ऐ वक्त, तू जो अगर वक्त पर आ जाता। तशद्दुद=ज़ुल्म 

चटोरों की....

मैंने ख्वाब देखा था, ख्वाहिश अधूरी रही, चाटने वाले चाट गए, प्लेट साफ पूरी रही।

तो था...

  तुझे न पा सकने का मुझे मलाल तो था, क्यों न पा सका, दिल मे ये सवाल तो था,  न पा सकने की चाहे वजह कोई भी रही हो,  वो पल था,दिन था,महिना था और साल तो था।

एहसास

अब छोड देंगे वो भी पीछा करना, हमारी परछाइयों का, उनको भी रास आने लग गया है, आलम ये तन्हाइयों का। इक शुष्क दरिया समझते थे हमें  'परचेत', जो समंदर की चाह वाले, उनको भी अब अंदाजा हो गया हैं, हमारे दिल की गहराइयों का।

टीस

तूफान, नदियां समंदर पे  तू न इस तरह हमसे सवाल कर, डूबती हुई कई कश्तियां  हम भी लाए हैं भंवर से निकाल कर। xxxxxxxxxxxxxxx छुपा लो जितना छुपाना है  खुद को, परदो के पीछे, फिर नहीं आएंगे हम, बस, और कुछ दिनों की ही बात है, किसी दिन लेटे-लेटे तेरी गली से गुजर जाएंगे हम। xxxxxxxxxxxxxxx हम गाय, भैंस,घोड़े नहीं थे,  फिर भी बंधे हमेशा तबेले रहे, तन्हाइयां साथ अपने बहुत थी, सफर में किन्तु अकेले रहे।

सवाल

गिले-शिकवे तुम हजार करोगे और  खुदा होने का दावा भी बार-बार करोगे, 'परचेत' पूछता है अरे वो जाहिलों, खुद के दिल से खुद का कब दीदार करोगे। 

तसल्ली

खुदगर्जी के वास्ते न कभी  किसी को बदनाम किया तूने, किसी की भी उपलब्धियों को  न कभी अपने नाम किया तूने, क्योंकि तू इक  हद की हद तक परचेत था 'परचेत',  इसलिए जिंदगीभर,  अपनी शर्तो पर काम किया तूने।

दस्तूर

जिंदगीभर पकते रहे यह सुनते-सुनते कि नेगेटिव नहीं हमेशा पौजेटिव सोचो, काश कि जमाने को अस्पताल का  यह दस्तूर भी पता होता कि  नेगेटिव आए तो सही,  पौजेटिव मतलब जेब पर डाका।

निश्चय।

  जिंदगी मे जो रात आखिरी होगी, समझ लेना कि वो बात आखिरी होगी, झख मारते रहे तेरे वास्ते,  जिंदगी भर 'परचेत', अब ये सावन की बरसात आखिरी होगी।

आरज़ू

जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो, उसे तू अपने दिल में ऐसे न  बसाया कर,  इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत', अपना ग़म लेके इधर-उधर मत जाया कर।

परख

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क्षणभंगुर

  उनको देखकर कुछ न भाया, सहज थे,असहज से भा गए, नूर चेहरे का तो तब छलका, महफ़िल में जब तुम आ गए।

बोझिल मन !

अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के, इक ज़माना था जो हम गाते, तय पथ था और सफ़र अटल, उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते। जागी है जब कुछ ऐसी तमन्ना कि इक नये सांचे में ढल जाते, नजर आता जो सुकून हमको, कागज पर लफ्ज़ उतर जाते । सफर जारी है धीमे-धीमे मगर,   मुकर्रर वो रास्ते नहीं भाते, घर की मुंडेरी पे बैठने को 'परचेत',  अब परिंदे भी नहीं आते।।

लॉकडाउन को-रोना-२०१९ की घरेलू हिंसा।

गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे थे, तमाशबीन बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे से रूठे थे।  डरी सूरत बता रही थी,बिखरे महीन कांच के टुकडो की, कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे थे।  ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन, इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे थे।  पटकी जा रही थी हर चीज,जो पड़ जाए कर-कमल उनके,   वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे थे।  तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत', मनुहार मिलाना भूल गए, फकत इतने भर से ही बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे थे।

कुपत

तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि  बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।

Yकीं

  रात गहरी बहुत है मगर,  यकीं रखो, हम सोएंगे नहीं। तूम रुलाने की जितनी भी कोशिश कर लो,  रोएंगे नहीं, बेदना के पार्क मे सन्नाटे संग  खामोशी भी बैठी है 'परचेत', इसलिए किसी के बहकावे में आकर,  आपा खोएंगे नहीं।

बोल संस्करण !

हमने तो मरने को नहीं कहा था, अरे वो, हमें पत्थर दिल कहने वालों, जो पास है तुम्हारे उसी पे जी लेते, मुफलिसी ,  तंगदिली मे जीने वालों । बस, मेरे साथ सिर्फ इक मेरी गिला़ और तुम्हारे संग तमाम सिकवों का काफ़िला, मैं अभिभूत और ऐतबार पराजित, 'परचेत', यकीं रख, लम्बा न चल पायेगा ये सिलसिला। सिसकियां आई, हिस्कियां आई और पराज भी आए हैं, देहलीज पे तेरी, युवा आए और उम्रदराज भी आए हैं, अरे वो, हुस्न की मलिका, नागवार है इतराना तेरा, उम्र दराजी के तजुर्बे  में हमने  तो उन्हें भी देखा है,    कबूतर के चेहरे मे मु़डेरी पर जो बाज आए हैं। जो आज आनी चाहिए थी, वो तुम्हें आज आती नहीं, खुद को हुश्न की मलिका बताते हुए लाज आती  नहीं, हमने तो, तुम्हारे हुस्न की बस खैर मांगी थी, ऐ दोस्त! जो जवानी में न आ सके, वो उम्र दराज आती नही। न निशां पड़ते, न ही दाग होते, तले जिसके अंधेरा न होता,  ऐ काश! कि हम वो चराग होते, हम कहते, छुप लो बनकर प्यार हमारे इस सूने से दिल में, छुप लेते,अगर जो तुम राग होते।  

सवाल

किस राह मे गिर गया, अबे 'परचेत'  साले! फूल था और राह तूने अपनी कांटों की चुनी!

कबाब में हड्डी

अबे, पहले तो ये बता तू है कौन?  तुम जैसों के मुंह लगना मेरा चस्का नहीं, मेरी तो बीवी से भी बिगड़ी पड़ी है, चल हट, मुझे सम्हालना तेरे बस का नहीं।

श्रद्धांजलि!

वो बिन वजह हंसना तेरा,  वो बिन वजह रोना तेरा, जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी -मेरी कहानी है।  इक प्यार का नगमा.... #आशाभोंसलेविनम्रशर्द्दाजली!

बंदिशें ।

मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी, हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।

बताएं भी किसे?

  बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ, फेहरिस्त लम्बी है इस  तन्हाई की, अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' ,  राह तकते-तकते इक हरजाई की।

पुरानी यादें।

भले ही वो हैंगओवर मेरे  लिए कुछ ही पल का था, नशा मेरे प्यार का मगर, तीखा नहीं हल्का था, क्या बताऊं किस कदर उस नशे मे मैं खो गया, नशा जो पलभर के वास्ते तेरी आंखों से छलका था।

कुदरत

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परिंदों ने घर बसाया, बच्चों संग फुर हुए, निशानियां बसावट की मैं देख पाया था, अपने छोटे से आशियां में उनके लिए, जो मैंने भी इक छोटा सा नीड़ बनाया था।

बंदिशें अपनी।

रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं,  और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता, कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं, और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता। जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं  मानो ये जज़्बाती नहीं, जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं, अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर, और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता। अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो, दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो, डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी, मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।

सलाह

तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा, फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना, अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले, एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।

अंदाज!

मेरी डांडी-कांठियों का मुलुक ज्यैल्यू, Go there in the spring. हैरा बण मा बुरांश का फूल जब बण मा आग  लगाणा होला, भीटा पाखों थैं फ्योलिं का फूल,  पिन्ग्ला रंग मा रंग्याणा होला .. लाइयां पैयां ग्वीराल फूलु ना, The earth will be decorated, Go there and sing.

O sitting moon !

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O setting moon! Come back soon. For me, you are not a dark midnight, for me, to be honest, you are a happy noon. O setting moon! Come back soon.

पुनर्विवरण !

रातों के हर पहर-दोपहर,  जब भी  मैं करवट बदलूं, बदली हुई हर करवट पर,  कसम से आहें भरता हूं , उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,  कह देता कि  मैं तुमपर मरता हूं , मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,  सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।

वज़ह!

गर तुम न खरीददार  होते, यकीन मानिए,  टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।

वाजिब बात

रूठ जाते हैं मुझसे मेरे अपने ही और  मुझको मनाने मे जरा भी रुचि नहीं, दिलचस्प हों भी अगर मुहब्बत की राहें, क्या फायदा, जब दिल मे ही शुचि नहीं?  

कश्मकश

सबब खामोशी, तेरा बहाना अच्छा है, इश्क़ हुआ मगर इजहार न किया, अंदाज़े मोहब्बत छुपाना अच्छा है, शकुन बुरा ही सही, दिल जलाना अच्छा है।

हकीकत

उजागर न होने दिया हमने  उजागर न करने के ऐब से, वाकिफ बहुत खूब थे हम, तुम्हारे छल और फरेब से।

सलाह

कह रहा हूं मैं तुमसे,  ऐ बेस्वाद, बेसुरे भड़वे, जुबां पे थोड़ी मीठास घोल, मत बोल इतने भी बोल कडुए। तू शिद्दत रख और  समर्पण कर, मत पड़ फरेब में जिस्मानी शाम की, रूहानी एहसास खुदा की इबादत ,  लिखदे तू जाकर अपने नाम की।

मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची, बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची, उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत', थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।

तब्दीली

तेरी याद आना  गुज़रे जमाने की बात हो गई, पानी का गिलास  सामने टेबिल पर पड़ा देखकर, अब तो हिचकियों भी नहीं आती।

सफर अभी बाकी है।

अभी नहीं, सफ़र जब खत्म होने की दहलीज पर होगा,  तभी सोचेंगे ऐ जिंदगी ! कि ज़ख्म कहां-कहां से मिले।

परिभाषा

कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं कि जो फटते नहीं, फासले अगर बढ़ने लगें तो फिर घटते नहीं।

हो ली,,,

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पर्व रंगों का है वेरंगीन बन, बैठा हूं बातें करता खुद से, कभी न जाने क्यों ऐसा लगे, हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।   मदहोश-बेखबर, था तो नहीं, दर्द का एहसास है बे-खुद से, घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर, अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।

दरकार नहीं

मैं  अभी सो रहा हूं, मर्जी के हिसाब से,  मर्जी के हिसाब से मुझे जागना है, तुम मत रुको मेरे लिए, ऐ ज़िन्दगी, भाग लो, जितनी तेजी से तुम्हें भागना है।

लुभावना

सफर मे धूप तो बहुत होगी, सूरज को ढक सको तो चलो,  एम्बूलैंस लेकर जा रही है रोगी,  राह उसकी रोक सको तो चलो।

इल्तज़ा

  मोहब्बत मे, आंखों मे भर आए आंसुओं को गिरने न देना 'परचेत', क्योंकि प्यार के आंसू ही रूह की खुराक होते हैं।

वाजिब सवाल !

सवाल ये नहीं है कि जवानी में हम क्यों जीने मरने की कसमें खाते हैं, सवाल ये है कि साठ के बाद ही क्यों 'परचेत',दर्द भरे गीत पसंद आते हैं।

वाहियात

आज उन्होंने जैसे मुझे,  पानी पी-पीकर के कोसा, इंसानियत से 'परचेत',  अब उठ गया है भरोसा।

दुविधा

इश्क़ कोई पोंछा नहीं है, सिखा गई आज काम वाली बाई, किधर जाऊं समझ नहीं आता, आगे कुआं है और पीछे खाई।

पैगाम

इस जिंदगी का फलसफा बस, इतना सा रहा 'परचेत',  मुकाम पर हम खुद को लानत-मलामत हजार देते हैं, संदेश उसतक पहूंचा देना, ऐ तख्त पर लटकाने वालों,  चलो, कुछ यूं करते हैं अब जिंदगी, तुझको गुज़ार देते हैं।

हकीकत

बेवफा क्या हुआ, कतार में खड़े हैं कुशलक्षेम पूछने वाले, जब बावफ़ा था 'परचेत'  तो गली का कुत्ता भी  नहीं पूछता था।

संस्कृत सीखिए

  अपने मुहल्ले में जरा सा सोबर दीखिए ओर संस्कृत बोलना सीखिए, खुद ही पूरी संस्कृत मत खाइए, थोड़ा बीवी को भी सिखाइए। जब झगड़े का मूड़ हो तो संस्कृत में ही लड़ना, जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ना, झगड़ा कोई सुन रहा होगा, मन में न खल रहा होगा, पड़ोसियों को लगे कि घर में हवन-पूजन चल रहा होगा।

ऐ जिंदगी!

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अब और कहां तक  होगी इससे भी बदसूरत ज़्यादा, जिंदगी, तू जिंदा कम नजर आती है, मूरत ज्यादा।

पश्चाताप

अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए, और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी, क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत', हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।

ओ रे पिया, मैं तुम्हारी

अपना तन-मन लुटा के हारी, ओ रे पिया, मैं तुम्हारी, आगोश तुम्हारे, मेरा सुलभ लगे मन, चाहे तन हो कितना ही भारी, ओ रे पिया, मैं तुम्हारी। संबंधों के तौर-तरीके मैं ना जानू, और बनावटीपन मैं ना मानू, या फिर कह लो दुनियादारी, अब रह नहीं सकती मैं कुंवारी,  ओ रे पिया, मैं तुम्हारी। कोमल हूं पर कमजोर नहीं हूं, सहमी-सहमी भोर नहीं  हूं, हर पल साथ खड़े हो जब तुम, कहके दिखाए कोई मुझे अबला नारी,  ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।

कोप

शरीक हुए थे जो कल के  कवि सम्मेलन में, वो सब के सब, एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे, एक से बढ़के एक पैदाइशी चमचे, तलवेचाट, बस,यही कहूंगा कि सबके सब उल्लू के पठ्ठे थे।🤣

तहकिकात अभी जारी रहेगी

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तहक़ीक़ात अभी जारी है

रिश्तों की खाइयों को पाटिये कि अब और न बढ़ें, दिलों के सहरा में नजर आ रही दरार बहुत भारी है, अगम्य राह, सत्य का पथ इतना दुर्गम कैसे हो गया, बाधित क्यों है आवाजाही,  तहक़ीक़ात अभी जारी है।‌ सदचित विभ्रम है और कानून  का कोई खौफ नहीं,  राष्ट्र भयभीत किया जा रहा, बिखरने की तैयारी है,  समृद्धि के पथ पर पता नहीं यह कौन सी दुश्वारी है,  संयम पांवों तले क्यों आया,  तहक़ीक़ात अभी जारी है।

दिल की बात

हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे, मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में। बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले, हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।

नादानी

पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम,  सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी,  सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े, लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,  उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत',  जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।

इश्क़-ए-सर्दी

मांग रही थी वो आज मुझसे  मेरे प्यार का हलफनामा, मौर्निग वाक पर जाती है जो पहनकर, रोज मेरा ही गर्म पजामा।

तमन्ना

तुम्हारे ओठों से चिपककर सांसों के सहारे, तुमपर ही समर्पित हो जाता, ऐ काश कि अगर 'परचेत' !  मैं तुम्हारे  सान्निध्य की कोई  बांसुरी होता।

स्वीकारोक्ति

हिम्मत ही नहीं रही जब, दिखाने को कुछ नया करके, फायदा ही क्या है 'परचेत', तब अफसानें बयां करके।

Imagination

While landing at our courtyard,  A mysterious bumblebee  is humming, It looks, at our door,  a treasure trove of happiness  is coming.

नासमझ

मुहब्बत के खातिर तुम्हारी हर बगावत की, हमेशा ही अगुवाई करता, फक़त ख्वाबों में ही मुहब्बत की दुहाई दोगे तो 'परचेत', अंजाम यही होगा।

अधूरी हसरत

दिलों की हसरत, मिलन की चाहत, न तो इबादत ही रंग लाई  और न  ही दिल की दुआ , हो जाता मिलन अचानक हमारा भी किसी मोड़ पर 'परचेत,'  कभी ऐसा इत्तेफाक न हुआ।

दौर-ए-बदलाव

सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर  एक पैग व्हिस्की, कभी वो संग-सग पीती थी, जब न तो आभासी दुनिया थी, और ना ही वो इस कदर , अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी। अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है, आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।

हौंसला

हौसलों के दमपर अभी तक,  जी है जिंदगी हमने, डटकर किया है मुकाबला,  राह की दुश्वारियों का, हर शै से निकले हैं हम,  उबरकर भी, उभरकर भी, जरा भी न कभी बेबस हुए,  बोझ ढोते लाचारियों का।

सवाल

वो लम्हा तुम जरा बताओ, जब मैं तुम्हारे संग नहीं था, कौन सा था वो लम्हा-लम्हा जिसमें, प्यार का रंग नहीं था?

यकीनन

तुम जानते हो कि मेरे होते,  सलामत है लाज तुम्हारी, इसीलिए आज तक मैं, तुम्हारे राज तक नहीं गया । मांगने की आदत जिंदगी में  मुझसे कभी पाली न गई, मोहब्बत में इसीलिए मैं भरोंसे के  अल्फ़ाज़ तक नहीं गया ।

टीस

साफ-गोई की सजा यह मिली हमको  कि हम झूठे बन गये, यही वजह थी कि जहां के आगे  ऐ जिंदगी,  हम अनूठे बन गये।

संतुष्टि

यूं तो इस मेरे किरदार को,  अंधेरों से हमेशा शिकायत ही रही, किंतु चलता चला गया,  नुक़्स भी मिले, दिशा भी मिली।

फलसफा जिंदगी

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वो अब आ नहीं सकता फिर से,  गुज़र गया जो वक्त अपनी राहों से, किन्तु, मुश्किल तो होगा जिंदगी तेरा  सुगमता से निकलना, मेरी पनाहों से। घड़ी की तरह  खिसकती जा रही हो,  पकड़कर रखूंगा तुझे अपनी बांहों से, सुगम-दुर्गम, हर दौर जिया है तेरे संग, मुझे फर्क नहीं पड़ता, साहों-सलाहों से।

राय

वर्तमान  तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना, उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के, बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना, सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।

पल-पल

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क्या बताऊं कि ये  चोंतीस साल कैसे बीते, किस मुश्किल में  हर लम्हा गुजरा जीते-जीते, याद तो होगा तुम्हें कि मैंने  तुमको भी न्योता दिया था, जवानी के फोल्डर जब मैंने,  'बीवी' ऐप डाउनलोड किया था!!

सवाल!

हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा , कविता का सार जैसा, प्रेम से गर प्यार ना निभे, फिर प्यार का इजहार कैसा?

एहसास !

थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी, बस, ग़लती यही रही हमारी कि दुखती रग पर उंगली रख दी थी।

दानदाता च महीपति;

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कडकछाप मुद्रीकृत सारे ब्लौगर-सलौगर,  यू-ट्यूब पे कमाई की धौंस वाले यूट्यूबर, आज सबके सब मैंने पशेमान कर दिए, दस सेंट एडसेंस से मैंने भी कमाए थे, सारे के सारे गुगल को ही दान कर दिए।🤣

बहुरूपिये!

अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत,  किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी, रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।

दिले नादान

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याद तो होगा तुमको  वो दौर-ए-जवानी, इक दोराहे पर अचानक  हम-तुम मिले थे, जहां सड़क तो  खाली-खाली थी मगर, सड़क किनारे कुछ  चाहत के फूल खिले थे। शनै:-शनै: जब हमने  कदम बढ़ाए उसतरफ,  इधर, इसतरफ  एक वीरान सा सहरा था,  उधर एक अशांत  मन  जमीं पे ठहरा था, अंततः न तो छांव ही मिल पाई,  न पानी ही, ज़ख्म जो तुमने दिया था,  बहुत गहरा था।

अफसोस।

  दिन-रात हो कि सुबह-शाम बस, यही अफसोस कचोटता है हाए, ऐ जिंदगी तुझे हम तमाम उम्र, बड़े सलीके से नहीं रख पाए।

समझ !

देहिक अपच हो तो खुशी  एक  कब्ज़हर  चूर्ण जैसा होता है, यूं तो समय प्रतूर्ण है मगर,  हर पल महत्वपूर्ण जैसा होता है।

छंद

पर्व लोहड़ी का था और हम आग देखते रहे, उद्यान राष्ट्रीय था और हम बाघ देखते रहे। ताक में बैठे शिकारी हिरन-बाज देखते रहे, हुई बात फसल कटाई की, हम अनाज देखते रहे।

समझ, नासमझ !

मिले न 'फूल' तो हमने  'चतुरों' से दोस्ती कर ली, मजबूरी का नाम गांधी,  जिंदगी यूं ही बसर कर ली।

द्वंद्व

उलझकर मेरी बातें कुछ यूं,   तुम्हारी बातों में रह गई, दिल की जो भी ख्वाहिशें थी,  जज्बातों में बह गई। जिया उलझाने की तुम्हारी  ये हरकतें बड़ी नासाज़ लगी, श्रुतिपुट जो सुनना न चाहते थे  वो तुम्हारी नज़रें कह गई।

असर

शाम-ओ-सहर, हमारे मिलने पर, बीवियों की डपट का जो रंग  लग गया, अब क्या बताऊं,  तुम्हें  ऐ दोस्त! कांच के गिलासों पे भी जंग लग गया।

खुदानाखास्ता

गैर समझा करते थे जिन्हें हम, दिल ने उन्हें कुछ इसतरह अपनाया, दूर भाग खड़ी हुई तन्हाई हमसे, हम अकेले को जब मिला हमसाया । फिर वो हमसाया कुछ यूं हमें भाया, तमाम जिंदगी की पलट गई काया, जिन परछाइयों से डरते थे कभी हम, आखिर,उन्हीं परछाइयों ने हमें अपनाया।  

मुफ्तखोरी

जब भी, जो भी जुबां पे आता है तुम्हारी, बक देते हो,  मुफ्त में जिसका भी लिखा हुआ मिल जाए पढ़ देते हो,  फुर्सत मिले तुम्हें तो सोचना, एक कमेंट के भूखें को क्या, सही में कभी आप उसको उसका हक देते हो?

आगाज़ - 2026 !

वर्ण आखिरी, वैश्य, क्षत्रिय, विप्र सभी, सनातनी नववर्ष का जश्न मनाया कभी ? नहीं, स्व-नवबर्ष के प्रति जब व्यवहार ऐसा, फिर  पश्चिमी  नवबर्ष  पर तकरार कैसा? समझ पाओ तो समझ लेना क्षुब्ध भावनाएं, आपको  नूतनवर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। 🎂 🙏