अफसोस
निष्पक्षता धसी दुराचार के दल-दल मे,
निडरता कुटिलता से डर गई,
कागजों के बागी तेबर देखकर,
कलम जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर गई।
दौर-ए-काॅकरोच, हया गुमशुदा हुई,
परतें शराफ़त की चेहरों से उतर गई,
मोटी सी वो किताब जिसे
बाबासाहेब ने लिखा था,
सुना है उसे,
अपने ही घर की चुहिया कुतर गई।
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