अतृप्त भाव

सुबह-सबेरे, स्कूल-बस पकड़ने की जद्दोजहद,

दौड़ते विद्यार्थी की पीठ पर लदा वो बस्ता हूं मैं,

खुद की तो ख़ाक मे मिला दी शख्सियत हमने,

फिर भी अभी चुनिंदा दिलों मे बसता हूं मैं। 


कभी दिल तो हमारा भी करता है रूठ जाने को,

मगर चाह के भी एहसास न होने देता जमाने को,

मन के कोने मे छुपा रखें हैं अतृप्त भाव सारे,

चेहरे पर हमेशा ओढ़े रखता सरसता हूं मैं।

 

अबाधित जिंदगी की डगर, हमसे पूछती हो ?

इतनी भी अंजान न बनो , सबकुछ बूझती हो,

खुद का मुकाम पाने को जिसे पैरों से रौंदकर 

कई एहसान फरामोश निकल गए, वो रस्ता हूं मैं।


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