कबूलनामा

 दौर-ए-जवानी का वो मदहोश 

वक्त भी क्या था,

शाम को घर लौटते हुए राह मे,

फूल भी मिले, कांटे भी मिले,

घर की देहलीज पर पहुंचकर 

हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो,

मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।

 

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