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Showing posts from September, 2010

अद्भुत खेल !

इधर जोर-शोर से तैयारियां चल रही थी  फाइनल टचिंग की, सरकारी स्तर पर और उधर,  खेल गाँव में सांप जी लेटे हुए थे, एक अफ्रीकी ऐथेलीट के बिस्तर पर। अफ्रीकी ऐथेलीट उसे देखकर बोला, ये तो भैया मेरे साथ सरासर रंग-भेद है, मुझे भी लगता है कि अबके इस कॉमन वेल्थ के खेल में कोई बड़ा छेद है। तभी रूम अटेंडेंट  दौड़ा-दौड़ा  उसके पास जाकर बोला, नहीं भैया जी,  अबके अद्भुत ये खेल निराले है, पांच साल में  सत्तर हजार करोड़ खर्च कर , हमने सांप और संपेरे ही तो पाले है। 

नकारात्मक सोच !

नकारात्मक ख़बरों के लिए कुछ बिके हुए भारतीय मीडिया की तो मैं नहीं जानता, मगर मुझे भी मेरे कुछ दोस्त यह सलाह देते है कि मैं बहुत ज्यादा नकारात्मक लिखता हूँ। मैं उनकी बात को सिरे से नकारता भी नहीं, क्योंकि मैं कोई सतयुगी साधू-महात्मा नहीं ( कलयुगी तो ज्यादातर चंद्रास्वामी के भक्त है ) । मगर मेरा एक मासूम सा सवाल हमेशा रहता है कि वैसे तो मेरा भी मन सकारात्मक लिखने का करता है मगर जब आपके आसपास सभी कुछ नकारात्मक हो तो आप सकारात्मक सोचने की उम्मीद कैसे कर सकते है, जब तक कि अगला अपनी क्रियाशैली न बदल ले ?( यानि खुद भी नकारात्मक करके सकारात्मक बनने का ढोंग रचें ) समयाभाव के कारण बहुत लंबा नहीं लिखूंगा, मगर एक वाकये से अपनी इस नाकारात्मकपन का जस्टिफिकेशन देना चाहूँगा। मैं मूलत: उत्तराखंड से हूँ , स्वाभाविक है कि मेरे बहुत से करीबी उत्तराखंड में है, जिनसे मेरी रोज बात होती रहती है। दुनिया जानती है कि इसबार मानसून ने उत्तराखंड में क्या कहर बरपाया है। मगर हम दिल्लीवासी नहीं जानते, क्योंकि हम तो कॉमनवेल्थ गेम की तैयारियों में लगे है, उन गेम की जिसने पहले ही देश के माथे पर एक बड़ा कलंक लगा रख छोड़ा है...

अपेक्षा !

मुझे न जाने कभी-कभी  ऐसा  क्यों  लगता है कि  अब तो बस इस भरतखंड का तभी असल विकास होगा,  जब  बड़ी-बड़ी मछलियों और मगरमच्छों की बस्ती, नई दिल्ली-१ से उफनते हुए      कभी जमुना जी का निकास होगा। : : : : : : : : : : : : : : : : : : कोसी की कसम ! यमुना जी, आप सुन रही हैं न ?

शर्म के मायने !

भगवान् का शुक्रिया अदा कीजिये कि "कॉमन वेल्थ" के नाम पर आज सुबह से अभी तक भ्रष्टों द्वारा बिछाई गई देश के करदाता के खून पसीने की रकम का कोई हिस्सा सरसरी तौर पर टूटकर या ढहकर बेकार नहीं गया। वो कह रहे है कि गेम्स विलेज (खेल गाँव ) खिलाडियों के रहने लायक जगह नही है। सडकों पर इंद्रदेव के कोपभाजन की वजह से बड़े-बड़े गड्डे पड़े है।नाक के नीचे का एक नया बना फूटओवर ब्रिज टूट्कर गिर गया है। नेहरु स्टेडियम मे जहां आज से 09 दिन बाद खेलो का उद्धघाटन होना है, फाल्स सीलिंग गिर गई है। खिलाड़ियों के लिए बिछाये बिस्तरों पर कुत्ते आराम फरमा रहे है। सड़कों पर पिछले पांच सालों से खेलों के नाम पर किये जा रहे निर्माण की वजह से पहले से पके बैठे एक आम दिल्लीवासी का चलना दुभर हो गया है। सुरक्षा के नाम पर आतंकवादी खुले सांड की तरह घूम रहे है। विदेशी चैनल वाले विस्फोटक लेकर या यहाँ खरीदकर स्टिंग ओपरेशन कर रहे है और तब जाकर कोई एक-दो नहीं पूरे १० बैरिकेड खेलगांव के गेट के आसपास लगा दिए गए है। जिनपर सुबह से शाम तथा शाम से रातभर तक खड़े-खड़े पहरा दे रहे पुलिस वाले दिन भर बारिश में भीगकर बीमार पड़ रहे है, क्य...

उलझन !

लगातार बरसती ही जा रही सावन की घटाएं हैं , बिखरी पड़ी  प्राकृतिक सौम्य छटाएं हैं । नतीजन  जीवन की हार्ड-डिस्क मे कहीं नमी आ गई है, ख़्वाबों की प्रोग्रामिंग सारी भृकुटियाँ तन रहीं हैं, हसरतों की टेम्पररी फाइलें भी बहुत बन रही है। समझ नही आ रहा कि रखू, या फिर डिलीट कर दू, 'फ़ोर्मैटिंग' भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !

ख्वाइश !

मैंने  कब ये चाहा  कि मैं भी बहुत बड़ा 'रिच' होता, मेरी तो  बस,   इतनी सी ख्वाइश थी ऐ जिन्दगी, कि तुझमे  भी एक ऑन-ऑफ का स्विच होता, जिसे मैं  मन माफिक जब 'जी' में आता, जलाता और बुझाता।  

शिकायत ऊपरवाले से

हे ऊपरवाले  ! इस दुनिया में, स्वार्थीजन आपको खूब अलंकारते है, भगवान्,ईश्वर, अल्लाह, रब, खुदा गॉड और न जाने  किन-किन नामों से पुकारते है।   निःसंदेह आप खेवनहार हो, इस दुनिया के पालनहार हो, खूब लुटाते हो अपने भक्तों पर, आपकी कृपा हो तो घोड़े-गधे भी  बैठ जाते है ताजो-तख्तों पर।   मगर एक बात जो मुझे अखरती है , माय बाप ! सिर्फ मेरी ही बारी क्यों कंजूस बन जाते हैं आप ? मुझे बताओ, ऐ ऊपर वाले ! मुझमे ही सारे गुण तुमने पाइरेटेड क्यों डाले? अरे, कम से कम  लेबल तो निकाल देते, कुछ नहीं था, तो यार,  एंटी-वायरस तो ओरिजिनल डाल देते। 

इमेज !

यह आज मेल से मिला था, हिन्दी रूपांतरण मनोरंजनार्थ पेश है ; यूपी से बिहार के राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगे तगड़े जाम में एक ड्राइवर फंसा हुआ था । आधा घंटा गुजरा, एक घंटा गुजर गया, लेकिन ट्रैफिक था कि हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर अचानक कुछ लोग आये और उसकी गाडी की खिड़की पर ठक-ठक किया । उस ड्राइवर ने अपनी गाडी की खिड़की का शीशा उतारा और पूछा- क्या चल रहा है भाई, ये ऐसा जाम क्यों लग गया ? वे बोले कि देश के कुछ विख्यात नेतागण सड़क मार्ग से पटना जा रहे थे, तो कुछ नक्सलियों ने उनका अपहरण कर दिया है। और अब वे नक्सली इनको छोड़ने का प्रति नेता १० लाख रूपये मांग रहे है, और साथ ही धमकी भी दे रहे है कि अगर तुरंत पैसों का इंतजाम नहीं किया तो वे उनके ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगा देंगे। इसलिए हम यहाँ एक-एक गाडी वाले के पास जा रहे है ताकि कुछ कलेक्शन कर सके। अच्छा ये बतावो कि औसतन कितना दे रहे है लोग ? ड्राइवर ने उत्सुकता से पूछा। ज्यादातर लोग तकरीबन पांच लीटर तो दे ही रहे है !!!!!!!

कुत्ते से करिये मालिक की पहचान !

दिये गये शीर्षक पर कुछ लिखने से पहले एक छोटी सी भंडास निकालना चाहुंगा. आप घबराइये नही, यह भंडास अथवा बद्दुआ मैं उन निर्लज बेशर्मो पर निकाल रहा हूं जिन्होने आम दिल्ली वालों का जीना पिछले एक दशक से दुभर कर रखा है, विकास के नाम पर। कभी फ़्लाईओवर के नाम पर, कभी सडक चौडीकरण के नाम पर, कभी जल निकासी के नाम पर और कभी कौमनवेल्थ के नाम पर। आजकल तो हालात ये हैं कि सुबह से शाम तक की बारह घंटे की दिनचर्या मे चार घंटे तो सिर्फ़ सड्कों पर ही गुजारने पड रहे है, कौमनवेल्थ की रिहर्सल के नाम पर पर लगने वाले जाम की वजह से । देश की तीस हजार करोड की कौमन वेल्थ को तो इस देश के ये कुछ भस्मासुर चट कर गये और ऊपर से धमकी आम जन को कि अगर फ़लां-फ़लां लेन मे घुसे तो.........समझ मे नही आता है कि ये लोकतंत्र है या फिर नादिरशाही ? इन चंद भस्मासुरों ने बिके हुए मीडिया संग मिलकर क्या-क्या सब्जबाग नही दिखाये थे इन दिल्ली वालों को, मसलन पांच गेयर तो छोड दीजिये ये तो कह रहे थे कि अगर गाडी मे छ्टा गेयर भी लगा दिया गया तो उस पर भी गाडिया दौडेगी। यमुना के नीचे से ठां से रेल निकलेगी और सीधे स्टेडियम मे ही जाकर रुकेगी......औटो की ...

कोई तन्हा न रहे !

घिर आये है बदरा घने, हो रही तेज बारिश भी, दिल में इक कसक भी है, लब पे सिफारिश भी।   शाम ये उल्फत भरी है, कहीं कोई तन्हा न रहे, मायूस न हो किसी की , छोटी सी गुजारिश भी।   गुजरें न किसी की शामे उदास, 'मयखाने' में, दिल में जीने की तमन्ना हो, और ख्वाइश भी।  सिर्फ खफा रहने से जिन्दगी बसर नहीं होती, अर्जी में इंतिखाब भी रहे और फरमाइश भी।   मिलता है हर किसी को हिस्से का ही मुकद्दर, करें क्यों 'परचेत', तकदीर से आजमाइश भी।  

कार्टून- डोपिंग का असर !

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छवि गूगल से साभार !

सरकारी आंकडे भी भरोसेमंद नही रहे !

सरकार ने माना है कि उसके द्वारा पिछले मंगलवार को जारी इस वित्तीय वर्ष के अप्रैल से जून तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ८.८ प्रतिशत की आर्थिक विकास दर से सम्बंधित आंकडो के आंकलन मे गलतियां थी और वह नये सिरे से इनका आंकलन करेगी। यह बात वित्त मन्त्री ने तब मानी जब कुछ वित्तीय समीक्षकों ने इन आंकडो पर यह कह्ते हुए संदेह व्यक्त किया और आलोचना की कि सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मुल्यांकन बाजार मुल्य पर किया। बाजार मुल्य पर किये गये इस मुल्यांकन मे वस्तुओ के उत्पादन और सेवाओं की लागत सिर्फ़ ३.६५ प्रतिशत आंकी गई है, जबकि वास्तविक तौर पर यह दस प्रतिशत से भी अधिक है। साथ ही यह भी दर्शाने की कोशिश की गई कि इस दौरान देश मे उत्पादों का उत्पादन और उसकी आपूर्ति तो छक के है, मगर कोई इन उत्पादों को खरीदने वाला ही नही है। यह बात भी यहां उल्लेखनीय है कि अनेक वित्तीय समीक्षक यह मानते है कि हमारे देश मे सकल घरेलू उत्पाद को मापने का पैमाना अन्तर्राष्ट्रीय मानको से भिन्न है और अगर हम ईमानदारी से अन्तर्राष्ट्रीय मानकों का पालन इसकी गणना मे करें तो हमारी यह विकास दर ४ प्रतिशत से भी नीचे है। अगर आपने इ...

एक लघुतम कथा- मरियल सर्वेसर्वा !

एक देश था, दृढ़, प्रबल, उपायकुशल, साधन संपन्न, सक्षम, साहसी, पराक्रमी, वैश्विक स्तर पर आर्थिक, सैन्य, कूटनीतिक,सांस्कृतिक एवं बौद्धिक , सर्वशक्तिमान के ये जितने पर्याय है, उन सब से परिपूर्ण था वह देश !मगर उस देश का एक दुर्भाग्य यह भी था कि उसने अपने अन्दर गद्दार और कायर निकम्मे भी प्रचुर मात्रा में पाल रखे थे ! वहाँ के कुशल इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्म के दिव्यास्त्र, आग्नेयास्त्र दुश्मन के दांत खट्टे करने के लिए बना रखे थे ! देश ने उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का बटन देश के सर्वेसर्वा के हाथों में दिया हुआ था, और चूँकि सर्वेसर्वा मरियल सा था इसलिए उसे इतनी भर जिम्मेदारी दी गई थी कि वह मौक़ा पड़ने पर सिर्फ बटन दबा दे ! इतना सबकुछ होते हुए भी विडम्बना देखिये कि जरुरत पड़ने पर वह देश अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पाया, क्योंकि उसके लोगो ने अपने आयुद्ध भंडारों का जो रिमोट बटन उस मरियल से सर्वेसर्वा को पकड़ा रखा था, ऐन-वक्त पर वह उसे इस्तेमाल नहीं कर सका ! वजह यह थी कि वह सर्वेसर्वा खुद भी रिमोट से ही चलता था, एवं जिसके पास उसे चलाने का रिमोट बटन था, वह कहीं छिपकर यह सब देख आनंदित ह...

बेचारे पाकिस्तानी गधे !

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आपने यह खबर तो अब तक सुन/ पढ़ ही ली होगी कि पाकिस्तानी खिलाडियों पर लगे स्पाट फिक्सिंग के आरोपों से नाराज पाकिस्तानियों ने सोमवार को लाहौर में गधों का जुलूस निकाला और जूते , चप्पल और सडे हुए टमाटरों से उनकी धुनाई कर अपने गुस्से का इजहार किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोपियों के नाम पर गधों के गले में जूतों की माला भी पहनाई।प्रदर्शनकारियों ने हर गधे के सिर पर कागज चिपकाकर अपने उन सभी महान क्रिकेट खिलाडियों और अधिकारियों का नाम लिखा था, जो हाल में फिक्सिंग के दोषी है । एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि इन खिलाडियों ने देश का सिर नीचा किया है। हम बाढ और आतंकवाद के कारण पहले ही इतनी मुसीबतें झेल रहे हैं और इन खिलाडियों ने हमारी खुशी का मौका भी छीन लिया। कुछ लोगों ने एक गधे के गले में बल्ला तक फँसाकर यह दर्शाने की कोशिश की कि हमारे क्रिकेटर आज किस हाल में पहुँच गए हैं। आपको बता दूं कि विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में इन गधों को सेक्युलर श्रेणी में रखा गया है, जबकि पाकिस्तान अपने आप को एक पाक-साफ धार्मिक देश मानता है। विभाजन के समय वहाँ इनके जीवित बचने की एक प्रमुख वजह यह मानी गई थी कि जब भी किसी उपद्रवी...