Saturday, September 18, 2010

उलझन !





लगातार
बरसती ही जा रही
सावन की घटाएं हैं ,
बिखरी पड़ी 

प्राकृतिक सौम्य छटाएं हैं ।
नतीजन 

जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है,
ख़्वाबों की प्रोग्रामिंग सारी
भृकुटियाँ तन रहीं हैं,
हसरतों की टेम्पररी फाइलें भी
बहुत बन रही है।
समझ नही आ रहा कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू,
'फ़ोर्मैटिंग' भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !

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26 Comments:

Blogger संजय भास्‍कर said...

बहुत बन रही है।
समझ नही आ रहा
कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू !
फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !!

.....बहुत खूब, लाजबाब !

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

Guru Godiyal ki jai ho

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, संजय जी !

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

Sammaan dene ke liye dhanyawaad

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

रखू,
या फिर डिलीट कर दू
....... आइडिया बढ़िया है ।

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger समय चक्र said...

वाह बहुत ही जोरदार लगी आपकी यह रचना .... आभार

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger वीना श्रीवास्तव said...

समझ नही आ रहा
कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू !
फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !

बहुत अच्छा लिखा है मजा आ गया पढ़कर...बहुत खूब

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं. उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

ये फ़ार्मेटिंग भी कम्बख्त लटाएं और जटाएं से कम तो नहीं :)

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है।
प्रोग्रामिंग सारी
भृकुटियाँ तन रहीं हैं,

आज ज़िंदगी ही कम्प्यूटर बन गयी है

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger ओशो रजनीश said...

समझ नही आ रहा
कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू !
फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !!

बहुत ही बढ़िया रचना है ........

इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... फॉर्मेटिंग भी तो आसान . ....
ग़ज़ब का मोड़ दिया है रचना को ....

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger Unknown said...

आज का अन्दाज़ बहुत पसन्द आया बन्धु !

वाह, क्या बात है !

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger kunwarji's said...

ji,
bilkul sahi keh rahe hai aap...

kunwar ji,

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger Shah Nawaz said...

अह्सास हो ही रहा है
कि जिन्दगी बौरा गई है,
जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है।


वाह! क्या बात है..... कंप्यूटरवा शायरी.... बेहतरीन!

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही लिखा आपने, जीवन का पर्याय बन गया है ये कंप्य़ूटरवा.

रामराम

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकृति को फॉर्मेट करना इतना आसान ही हो जाता!

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger मनोज कुमार said...

अह्सास हो ही रहा है
कि जिन्दगी बौरा गई है,
जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है।
अद्भुत प्रयोग! बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन), परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

Sunday, 19 September, 2010  
Blogger सूबेदार said...

उलझन --बहुत खूब सूरत
हिंगलिश- ला- जबाब
धन्यवाद.

Monday, 20 September, 2010  
Blogger अजय कुमार said...

सुंदर प्रस्तुति ।
वायरस से बचा के रखिये ।

Monday, 20 September, 2010  
Blogger संगीता पुरी said...

समझ नही आ रहा
कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू !
फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !!

अपने कंप्‍यूटर पर ही आपका नियंत्रण हो सकता है .. प्रकृति के कप्‍यूटर पर किसी का नियंत्रण नहीं !!

Monday, 20 September, 2010  
Blogger vandana gupta said...

आज के चर्चामंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Monday, 20 September, 2010  
Blogger अनुपमा पाठक said...

anuthi abhivyakti!
subhkamnayen...

Monday, 20 September, 2010  
Blogger M VERMA said...

फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !!

अनदाजे बयाँ क्या कहने
और फिर फार्मेटिंग तो अंतिम विकल्प है

Monday, 20 September, 2010  
Blogger लोकेन्द्र सिंह said...

सुंदर कविता....... ग्वालियर में तो बीते ४८ घंटों से ही झमाझम बारिश हुई है। पूरा सावन तरसाने के बाद। बेहद सुकून मिला। हालांकि परेशानियां भी उठानी पड़ रहीं हैं। कल क्वींस बैटन रिले भी आई जिसका स्वागत और विरोध दोनों ही हुआ। ग्वालियर की रैन, रिले और रिश्ते की जानकारी के लिए आप मेरे ब्लॉग अपना पंचू पर पधार सकते हैं। स्वागत है आपका..........

Tuesday, 21 September, 2010  

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