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Showing posts from June, 2012

कार्टून कुछ बोलता है-कुछ अपना भी इलाज बताओ !

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अब जाकर गगन देखो !

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शान-ओ-शौकत के लिए, लूटने की इनकी लगन देखो,   दौलत दिखे जहाँ, झपटते है कैसे,होकर  ये  नगन देखो।  करतल लिए जपते हैं माला, नैतिकता एवं आदर्श की,  सहज हैं चेहरे मगर इनके शठ-दिलों की अगन देखो।      खुल जाए जो एक बार किस्मत किसी अंगूठा छाप की,  कुर्सी पे बैठ करता है  मक्कार  कैसे पटुता से गबन देखो।    लोकतंत्र को समझ लिया इन्होने, इक पुश्तैनी बपौती, सिंहासन पे काबिज रहने की पीढ़ी दर पीढ़ी लगन देखो।    देश के खाली खलीतों से इनकी, और न खिदमत होगी,  धरा तो लूट खाई है हरामखोरों, अब जाकर गगन देखो।    खलीते=जेबें  चित्र  गूगल साभार !

माही और मानसिकता !

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आखिरकार वही हुआ जिसका डर था। २० जून, २०१२  की रात करीब ग्यारह बजे दिल्ली के निकट हरियाणा के कासन की ढाणी नामक स्थान पर ७० फीट गहरे बोरवेल में गिरी   माही को २४ जून को सेना, एनएसजी, और पुलिस  के जाबाजों के अथक परिश्रम के बाद बाहर निकाल तो लिया गया, मगर उस रूप में नहीं जिस रूप में  अपने जन्मदिन का केक काट नन्हे मन में फूली समाई,इठलाती हुई  माही घर के बाहर गली में खेलते हुए, किलकारियां मारते हुए  उस मकान मालिक द्वारा बिछाई गई मौत की सुरंग में घुस गई थी, जिसके मकान मे उसके माँ-बाप किराये पर रहते है l  बोरवेल में फंसी नन्ही जान  की सलामती के लिए हर   करने वालों ने अपना काम किया  l   तमाशबीनो ने तमाशा देखा, मौके पर जमा लोगों की नजर उस सुरंग पर जमी रही जिसमे माही गिरी थी  l     प्रशासन ने घडियाली आंसू बहाए, दुआ मांगने वालों ने  दुआओं और हवनो का दौर जारी रखा। अन्धविश्वासी लोग शहर से लेकर गांव तक  पूजा-अर्चना कर माही की सकुशल वापसी के लिए प्रार्थना करते रहे। अमूमन मौके का फाय...

खलीतों पर भारी पड़ रहा, इन गजराजों को पालना,

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स्वयं स्तुति और संतुष्टि पहुँची जब सदयता निभाने,  इक मर चुके रेपिस्ट की भी जान बख्श दी प्रतिभा ने !  जाने जा किधर रहा है, अरुण मधुमय यह देश हमारा,     कर दिया इसे पराभूत, एक बुझती शिखा की विभा ने ! आमजन का  उठ गया है इस व्यवस्था पर से भरोसा,    शठ-स्तवन शुरू  किया जबसे, कुटिलों की जिब्हा ने !  खलीतों पर भारी पड़ रहा,  इन गजराजों को पालना,    की सैर भी करोड़ों   की 'परचेत', एक अकेली इभा ने ! 

भागीरथ के पुरखे तर ही जायेंगे, इसकी क्या गारंटी है ?

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कहाँ से शुरू किया जाये, इसी उहापोह में काफी वक्त जाया कर गया ।  सन् अस्सी के दशक की बात है, कॉलेज के दिनों में जब तत्कालीन वितमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश केन्द्रीय वार्षिक बजट का भिन्न-भिन्न विशेषज्ञों द्वारा किये गए विश्लेषण को किसी पत्रिका में पढ़ रहा था, और वहाँ लिखी प्रतिक्रिया में व्यक्त की गई चंद बातें, जिसमे कहा गया था कि पूर्वी राज्य और उत्तर के पर्वतीय इलाके जिनकी अपनी तो कोई ख़ास आय है नहीं, के लिए केंद्र को अपनी आय में से खर्च की एक बड़ी मद इनके लिए आरक्षित रखनी पड़ती है,  दिल  को भेदती सी निकल गई  थी । आहत युवा-मन बस यही सोचता रह गया था कि ऐ काश, हमारा क्षेत्र भी आर्थिक रूप से एक साधन-संपन्न क्षेत्र होता तो शायद वह बात इतनी न अखर ती । और फिर तब शुरू होते थे मन के ख्याली पुलाव ।     काल्पनिक  दुनिया  में गोते     लगाता   युवा-मन सोचता कि अगर  मैं एक वैज्ञानिक किस्म का बलशाली और रसूकदार इंसान होता तो अपने पहाड़ों से निकलने वाली सारी नदियों को बाँध के जरिये वहीं पह...

देखिएगा कि अन्ना भी न कन्फ्युजियायें !

" वे ईमानदार आदमी हैं और करप्शन में उनके शामिल होने का  सीधा सबूत नहीं है। बहरहाल कोई रिमोट कंट्रोल है जो उनके फैसलों को तय  करता है और इसलिए उन पर संदेह है।" एक बात मैं  बिना विद्वेष  के कह सकता हूँ  कि इस मौजूदा दौर में देश-व्यापी भ्रष्टाचार के  विरुद्ध  आन्दोलन का जो बिगुल बजा, उसका क्रेडिट  सर्वथा अन्ना  को जाता है ।  और इसमें कोई शक की गुंजाइश भी नहीं होनी चाहिए कि अपनी काली करतूतों को दबाने की जो महारथ हमारे इन भ्रष्ट नेताओं को हासिल है , बेचैनी भले ही तमाम  देश का नागरिक महसूस कर रहा हो , किन्तु अगर  अन्ना  बिगुल न बजाते, त्रस्त लोग  साथ न आते,  राजशाही और नौकरशाही के भ्रष्टाचार भले ही रोज उजागर होते, किन्तु लीपा-पोती के ये कुशल कामगार  पेरिस प्लास्टर की पुट्टी  और उच्च गुणवता वाले पेंट का  वो अद्भुत मिश्रण  इस्तेमाल  करते कि  इनके जीते जी तो क्या, इनकी अगली पुस्तों तक भी  इनकी इस  कारीगरी का रंग फीका नहीं पड़ता  । ल...

समान नागरिक संहिता(Uniform Civil Code ) - आवश्यकता और अनिवार्यता !

शुरुआत करूंगा इन चार ख़बरों से;  पहली खबर अगस्त २०१० की  है जिसमे  एक नाबालिग शादीशुदा जोड़े को दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रोटेक्शन दिया था। जहां लड़के ने 18 साल पूरे नहीं किए थे, जबकि लड़की 16 साल की थी। कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला देते हुए इस मामले में नाबालिगों की शादी को वैध माना था। जस्टिस बी. डी. अहमद और जस्टिस वी. के. जैन की बेंच ने यह अहम फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा कि लड़की अपनी मर्जी से शादी कर चुकी है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है। यह मामला अपहरण व बलात्कार का नहीं, बल्कि धारा-375 (रेप) के अपवाद में आता है जिसमें 15 साल से ऊपर की उम्र की पत्नी की मर्जी से बनाया गया संबंध रेप नहीं है।   दूसरी खबर  जो पांच जून, २०१२ की है, वह भी दिल्ली से ही है जिसमे  दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि मासिक धर्म शुरू होने पर मुस्लिम लड़की 15 साल की उम्र में भी अपनी मर्जी से शादी कर सकती है। इसी के साथ अदालत ने एक नाबालिग लड़की के विवाह को वैध ठहराते हुए उसे अपनी ससुराल में रहने की अनुमति प्रदान कर दी।  जस्टिस एस....

कार्टून कुछ बोलता है-प्लानिंग कमीशन !

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उत्तराखंड में पैर पसारते वाइज !

जहाँ तक जातिगत वैमनस्यता का सवाल है उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से भी अलंकारित किया जाता है, में कुछ चुनिन्दा अवसरों, खासकर चुनावी मौसम में सीमित स्तरों पर ही इसके दर्शन होते दिखाई देते है। मगर आजादी के बाद से इस राज्य का पर्वतीय इलाका मैदानी क्षेत्रो से जुड़े चंद कस्बों में हुए छिट-पुट साम्प्रदायिक दंगों के कुछ अपवादों को छोड़, अब तक अमूमन धार्मिक विद्वेष से अछूता ही रहा है। और उसकी जो दो प्रमुख वजहें रही है, उनमे से पहली है, वहाँ के लोगो का सौहार्दपूर्ण और मित्रतापूर्ण व्यवहार और दूसरी वजह यह है कि यूं तो अल्पसंख्यक इस राज्य के पूरे इलाकों में बिखरे पड़े है किन्तु अगर राज्य बनने के बाद जुड़े मैदानी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो पूरे पहाडी क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की आबादी का , वहाँ की कुल आबादी के मात्र दो से पांच प्रतिशत तक होना। ये बात और है कि अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से मुसलमानों की कुल आवादी का प्रतिशत यहाँ बढ़ गया है। आज नैनीताल, उधमसिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून जिलों में मुसलमानों की प्रभावशाली उपस्थिति है। राज्य के उधमसिंह नगर जिले में 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है तो हरिद...