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Showing posts from August, 2013
विश्व मच्छर दिवस ! (पुन: प्रकाशित )!
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आज और कल(आज दोपहर बाद से कल दोपहर तक ) भाई-बहन के अटूट प्रेम और पवित्र बंधन का त्यौहार रक्षा बंधन है, अत: आप सभी मित्रों को सर्व-प्रथम इस पावन पर्व की मंगलमय कामनाऐ! शायद आप लोग भी जानते होंगे कि आज ही के दिन पर एक और महत्वपूर्ण दिवस भी है और वह है " विश्व मच्छर दिवस (वर्ल्ड मोंसक्विटो डे )" वैसे तो इस निकृष्ट, मलीन और दूसरों का खून चूसने वाले प्राणि को कौन नहीं जानता और कौन इससे आज दुखी नहीं है ! मगर, शायद ही बहुत कम लोग जानते होंगे कि साल में एक दिवस इस दुष्ट प्राणि के नाम पर भी मनाया जाता है, और वह दिन है, २० अगस्त ! इसलिए आइये, इस विश्व मच्छर दिवस पर एक पल के लिए, किसी अन्य जीव से अधिक मानवीय पीड़ा का कारण बनने वाले इस कलंकित रोगवाहक प्राणि के बारे में थोड़ा मनन किया जाए! सन १८९७ में लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. रोनाल्ड रॉस द्वारा इसका श्रीगणेश किया गया था, और न्यू जर्सी स्थित अलाभकारी संस्था अमेरिकी मच्छर कंट्रोल एसोसिएशन ने मलेरिया के संचरण की खोज का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया! इस उपलब्धि की बदौलत उन्हें सन 19...
हो गए हैं हम क्यों खुदगर्ज इतने !
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पैदा हुए हैं कहाँ से, ये मर्ज इतने, हो गए हैं हम क्यों खुदगर्ज इतने। गुज़रगाह बन गए हैं, सेज-श्रद्धेय, अगम्य हो गए जबसे फर्ज इतने। वफ़ा का चलन, सिकुड़ता जा रहा, दम तोड़ते जा रहे क्यों अर्ज इतने। सिर्फ स्व:हित पर सिमट गई सोचें, बुलंदियों पे 'पहले मैं' के तर्ज इतने। लहलुहान है सहरा, रिश्तों के खूं से, वारदात-ऐ-बेवफाई होते दर्ज इतने। तामील का आता,जब दौर अपना, तभी आते हैं आड़े क्यों हर्ज इतने। रेहन रखी क्यों है, गरिमा 'परचेत', हमपे किस-किसके हुए कर्ज इतने। गुज़ रगाह=street बन गए हैं सेज-श्रद्धेय= elders'bed अगम्य=congested हो गए जबसे फर्ज इतने।
स्वर्ग कामना एवं तीन लोकों की अवधारणा !
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सामने जो सत्य है उसको नजरअंदाज कर, सोच को किसी असंभव, अनदेखे और अनजाने से ब्रह्माण्ड मे ले जाकर खुद के और दुनियां के अन्य प्राणियों के आस-पास एक विचित्र मायावी जाल बुनना इंसान की पुरानी फितरत है। किन्तु साथ ही वह इस प्रशंसा का भी हकदार है कि इन्ही विलक्षण खूबियों की ही वजह से आज से कई हजार साल पहले ही उसने वो बुलंदियां छू ली थी, जिन्हें आज का मानव एक बार फिर से हासिल करने की जुगत में लगातार प्रयासरत है। लेकिन, कभी-कभी आश्चर्य इस बात का भी होता है कि आज भी इस संसार में इंसानों का एक बहुसंख्यक वर्ग उन कुछ अतीत में बुनी गई मायावी मिथ्याओं से परे हटकर नहीं देखना चाहता, जिनकी प्रमाणिकता भी संदेह के घेरे में है। इस बात पर तो शायद ही किसी को आपत्ति हो कि इस दुनियाँ में जितने भी धर्म और उप-धर्म हैं, वे सभी, किसी न किसी रूप में लोक तथा परलोक की अवधारणा पर विश्वास करते हैं। अब भले ही स्वर्ग और नर्ग (नरक...
आज यह पोस्ट अपने देश की युवा-शक्ति को समर्पित है !
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यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी भी देश की वास्तविक शक्ति उस देश का युवा-वर्ग होता है। और इसकी एक हल्की सी झलक इस देश ने गत वर्ष १६ दिसंबर को घटित एक शर्मनाक घटना के विरोध स्वरुप दिल्ली और देश के अन्य भागों में देखी। कुछ कर गुजरने का जो जज्बा युवा शक्ति के अन्दर होता है, उसकी कोई बराबरी नहीं हो सकती, उसका कोई तोड़ नहीं। बस, जरुरत होती है तो सिर्फ उस युवा-शक्ति के सही मार्ग निर्देशन की। वह एक तपता हुआ लोहा है, जिसे, जिस रूप में ढालना चाहो, ढाल सकते हो। युवा शक्ति के मार्ग-दर्शन अथवा मार्ग-निर्देशन की जरुरत की जब हम बात करते है तो उस दर्शन अथवा निर्देशन का तात्पर्य यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम उन्हें ज्ञान बाँट रहे है। उनके पास पहले से ही कहीं अधिक मात्रा में वह ज्ञान मौजूद होता है, जिसे हम उन्हें बांटने की कोशिश कर रहे होते हैं। बहुत लम्बा न खीचते हुए यही कहूँगा कि हालांकि मैं भी भला अपने देश के इन तमाम होनहार युवाओं को क्या सलाह दे सकता हूँ, किन्त...
अब तू ही बता……।
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तू ही बता के हमको जहन में उतारा क्यों था, दिल शीशे का था तो पत्थर पे मारा क्यों था? सारा दोष भी तुम्हारा और चित-पट भी तेरी, कसूर गर ये हमारा था, तो नकारा क्यों था? जब तोड़कर बिखेरनी थी,तमन्नायें इसतरह, फिर मुकद्दर अपने ही हाथों संवारा क्यों था? खूब शोर मचाया था, अपनी दरियादिली का, तन-मन इतना ही तंग था तो वारा क्यों था? नहीं थी तुम्हारी कोई आरजू, कोई जुस्तजू, तो संग चलने को तुमने हमें पुकारा क्यों था? बेकसी-ऐ-इश्क, फेरनी ही थी नजर 'परचेत', तो वक्त-ऐ-साद*तुमने हमको निहारा क्यों था?. वक्त-ऐ-साद*=खुशहाली में छवि गूगल से साभार !
धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !
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तमाम जंगल के बीहड़ों में जो कुछ घटित हो रहा हो, उससे क्या उस जंगल का राजा अंविज्ञ रह सकता है? या फिर यूं कहा जाए कि यदि उसे उसके राज्य में अन्याय होता दिखाई न दे, तो फिर क्या ऐसे नजरों से लाचार प्रतिनिधि को राजा बने रहने का कोई हक़ है? यदि उसे हमेशा किसी तीसरे ने ही आकर जगाना है, तो पूरे जंगलात के लिये यह निश्चिततौर पर एक बड़ी चिंता का विषय है। और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उसे जगाने वाला भी वाकई ईमानदार प्रयास कर रहा है, या सिर्फ खानापूर्ति, ताकि सिर्फ सुहानुभूति बटोरने के लिए जंगल की तमाम वादी की आँखों मे धूल झोंक सके ? और ठीक इसी सन्दर्भ में श्रीमती सोनिया गांधी के उस पत्र को भी रखा जा सकता है, जो उन्होंने कल इस देश के प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंह को लिखा और जिसमे उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि आईएएस अधिकारी सुश्री दुर्गा शक्ति के साथ कोई अन्याय न हो। उत्तर प्रदेश में बैठे...
ख्याल एक बैंक का
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कभी सोचता हूँ कि एक बैंक खोलू, हर सुविधा बैंकों की ही तरज दूंगा, न तो मैं किसी को कोई दरद दूंगा, न किसी तरह का कोई मरज दूंगा, मैं न सिर्फ नेक दिल वालों को ही, बल्कि जरज को भी अलगरज दूंगा, चाहे कोई लौटाए या न लौटाए, मगर हाथ उसके बेड़ी नहीं, कंठ सरज दूंगा, वो देते हैं सिर्फ भौतिक सुखों के वास्ते, किंतु, मैं मोहब्बत के लिए भी करज दूंगा। जरज = बदमाश अलगरज= बेपरवाह सरज= माला तुम हमें एसएमएस भेजो न भेजो,मर्जी तुम्हारी, किंतु अलगरज हम नहीं, ये है अलगर्जी तुम्हारी।.
खबर-जबाब !
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खबर: "केंद्रीय कैबिनेट ने सूचना का अधिकार कानून में संशोधन को हरी झंडी दे दी है। संशोधन के बाद अब राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे से बाहर रहेंगी यानि अब आप किसी राजनीति पार्टी से कोई सवाल नहीं पूछ सकेंगे। अब राजनीतिक पार्टियां जनता के सवालों का जवाब नहीं देंगी यानि आप आरटीआई के तहत किसी भी राजनीतिक पार्टी के फंड वगैरह की जानकारी नहीं मांग पाएंगे। पार्टियों को आरटीआई कानून से बाहर रखने को लेकर एक्ट में संशोधन पर कैबिनेट की मुहर लगने के बाद मानसून सत्र में इसे पास करवाने की तैयारी है। दरअसल राजनैतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने के सीईसी के निर्देश से बचने के लिए ये एक्ट में ही बदलाव की कवायद हो रही है। सेंट्रल इंफोर्मेशन कमीशन के 3 जून को सभी पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने की कवायद शुरु की थी जिसके मुताबिक 15 जून तक तमाम राजनीतिक पार्टियों को सार्वजनिक सूचना अधिकारी की नियुक्ति करना था लेकिन सीपीआई को छोड़कर किसी भी पार्टी ने इस पर अमल नहीं किया। यहां तक की आरटीआई कानून लाने का श्रेय लेने वाली कांग्रेस को भी इससे एतराज था। आरटीआई एक्ट में बदलाव पर आम आद...