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Showing posts from 2009

ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे ! (दूसरा और अंतिम भाग)

...धीरे-धीरे शाम का धुंधलका जमीन पर पसरने लगा था, मैं फिर चलने के लिए खडा हुआ तो वह वह भी उठ खडी हो गई। अभी तक की इस मुलाक़ात से मानो किसी अधिकार पूर्ण अंदाज में जब एक बार फिर से मैंने उसे साथ चलने का इशारा किया, तो वह भी तुरंत मेरे साथ चल दी। पार्क के बाहर खडी गाडी के पास पहुँच मैंने गाडी की ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट के सामने का दरवाजा खोला तो वह झट से गाडी में चढ़कर सीट पर बैठ गई। और फिर मैं ड्राइव करता हुआ इंडिया गेट पहुंचा । अब तक घुप अँधेरे में पूरा इलाका डूब चुका था, मगर इंडिया गेट पर बिखरी बिजली की रोशनी से पूरा राजपथ जगमगा रहा था। एक जगह गाडी को पार्क कर हम गाडी में ही बैठे रहे। नए साल की पूर्व संध्या होने की वजह से मैंने अपने खाने-पीने का भी पहले से ही गाडी में पूरा इंतजाम रख छोड़ा था। वहाँ घूमते लोगो, ख़ासकर नए जोड़ो को निहारते और व्हिश्की के हल्के घूंटो के साथ मैं चिकन का सेवन करता और एक चिकन पीस उसकी तरफ बढ़ा देता था। वह भी बड़े चाव से आराम से बैठ कर खा रही थी, सलीके के साथ। फिर जब अचानक आकाश में कुछ आतिशबाजी दिखी, तो मैं समझ गया कि रात के बारह बज चुके है। ड्रिंक और खाने-प...

ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे !

कब न जाने यु ही पलक झपकते दस साल गुजर गये, पता ही न चला। अचानक मुझसे मिलना और फिर कुछ ही लम्हों मे सदा के लिये मेरे साथ ही ठहर जाने का घडी भर मे लिया उसका वो फैसला आज भी वक्त बे-वक्त मुझे उन लम्हों के बारे मे सोचने पर मजबूर कर देता है। मैं समझता हूं कि इतनी जल्दी फैसला कोई भी प्राणि दो ही परिस्थितियों मे लेता है, एक तो तब जबकि उसे जो मिला है उसको पाने की उसकी चाहत बहुत पुरानी हो और अचानक वह उसे मिल जाये, दूसरा तब जबकि उसके पास और कोई विकल्प हो ही ना । मेरे हिसाब से उसके लिये भी शायद दूसरी परिस्थिति ही ज्यादा प्रबल रही होगी। बच्चो से बेहद लगाव रखने वाली स्वीटी ने दो बार दस सालो के दर्मियां मां बनने का असफ़ल प्रयास भी किया, लेकिन उसका दुर्भाग्य कि वह मातृत्व सुख पाने से वंचित रही, पैदा होने के चंद रोज बाद ही बच्चे चल बसे। स्वभाव से बहुत सरल और एक अजनवी से भी शीघ्र घुल-मिल जाने की उसकी खूबियों ने उसे शीघ्र ही मुह्ल्ले मे भी सबकी चेहती बना दिया। मौका मिलने पर हल्के-फुल्के मजाक करने से भी नही चूकती, मसलन सर्दियो मे जब सुबह-सबेरे बिस्तर से उतरते ही पैर चप्पल अथवा स्लिपर ढूढने लगते है, त...

समय आ गया है कि बीजेपी के प्रति मोह को भंग किया जाए !

आज जहां एक ओर देश की अस्सी प्रतिशत से अधिक आवादी महगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त है, वहीं दूसरी ओर सत्ता का मजा लूट रहे लोग, सार्वजनिक धन को दोनो हाथों से समेट लेने पर आम्दा है। विकास के नाम पर जहां एक ओर सार्वजनिक धन, जो कि जनता से ही भिन्न-भिन्न टै़क्स के रूप मे वसूला जाता है, को कुछ लोगो के फ़ायदे के लिये दोनो हाथो से लुटाया जा रहा है। पहले जानबूझकर धन और संसाधनो की कमी का रोना रोकर या फिर किसी और बहाने से, किसी भी परियोजना को अधर मे लटका दिया जाता है, और फिर भ्रष्ठ तरीके अपनाने के लिये समय सीमा बांध दी जाती है। जबाबदेही नाम की तो कोई चीज देश मे रह ही नही गई है। सरकार, लोगो को लूटने के नित नये तरीके इजाद करती रहती है । यहाँ टैक्स, वहाँ टैक्स। महंगाई की इस मार में अगर कोई व्यक्ति परिवार के साथ यात्रा कर रहा है तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सड़क छाप ढाबे भी १३.५ % वेट वसूल रहे है ! यानी परिवार संग ४०० रूपये का खाना ( जिसमे कि कुछ भी नहीं मिलता ) आपने इन ढाबो में खाया तो करीब ५५ रूपये सरकार के खाते में टैक्स भी भरो । जहां एक तरफ २००५ पांच में पिछले वित् मंत्री द्वारा वेतन भोग...

आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ !

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जीसस  "क्रिस" यूं कब तलक तुम, ज़रा भी टस से "मस" नहीं होगे, गिरजे की वीरान चार दिवारी में , कब तक यूंही 'जस के तस' रहोगे ? ये वो  परोपकारी वक्त  नहीं जब, महापुरुष  लटक जाया करते थे, अमृत सारा का सारा औरों को बाँट , खुद  जहर  घटक जाया करते थे।   तुम सदियों से नीरव लटके खड़े हो, खामोशी की भी हद होती है भई, एक बार सूली से उतर कर तो देखो, दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई। दौलत -सोहरत की चकाचौंध में, सभ्यता निःवस्त्र घूम रही है, संस्कृति बचाती लाज फिर रही, बेशर्मी शिखर को चूम रही है। भाई,भाई का दुश्मन बन बैठा है , बेटा, बाप को लूटने की ताक में है, माँ कलयुग को कोसे जा रही है , बेटी घर से भागने की  फिराक  में है। लोर्ड क्रिस,अब तुम उतर भी आओ, पाप का अन्धेरा घनघोर छा गया है ! यह आपके लटकने का वक्त नहीं  है , शठों को लटकाने का वक्त आ गया है। Merry Christmas to all Blogger friends !

२००९ में रचित कुछ बिखरे मोतियों के विशष्ट अंश !

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यूँ तो बेवजह सुर्ख़ियों में आने का कभी शौक नहीं रहा, मगर जैसे कि शायद आप लोग भी जानते होंगे कि मेरे एक लेख की वजह से ब्लॉगजगत पर आजकल मेरी टी.आर.पी काफी ऊपर जाकर बैठी हुई है, इसलिए मैं फिलहाल कोई टुच्चा-मुच्चा लेख अथवा कविता लिखकर उसको नीचे नहीं लाना चाहता :) सन २००९ में मैं इस ब्लॉगजगत पर लगभग हर दिन उपस्थिति दर्ज करवाई , इसलिए सोचा कि चलो, जो साल जाने वाला है उसकी कुछ जो कविताये अथवा गजल मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगी, मैं यहाँ प्रस्तुत करू, ताकि अन्य ब्लॉगर मित्र जोकि उन्हें पढने से किसी वजह से वाचित रह गए हो, वे भी एक बार फिर से उन्हें पढ़ सके ! तो लीजिये प्रस्तुत है सब २००९ का काव्य लेखा-जोखा : यहाँ सिर्फ भिन्न-भिन्न रचनाकारों की मैं कविता या गजल के कुछ चुनिन्दा अंश ही प्रस्तुत कर रहा हूँ,साथ ही उस कविता या गजल का लिंक भी मैंने यहाँ पर दिया है, विस्तृत तौर पर आप उसे उस ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते है, और मुझे उम्मीद है कि इसपर किसी ब्लॉगरमित्र / रचनाकार को कोई आपति नहीं होगी ! शुरुआत करता हूँ आदरणीय डा० रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की इस प्यारी से गजल से, उनकी गजल फ्रेम समेत पोस...

बेचारा !

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'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत पर एक ख़ास बात के ऊपर नजर गडाए था ! देखना चाहता था कि अक्सर किसी एक ख़ास मुद्दे पर एक साथ लेखों की बाढ़ निकाल देने वाले हमारे ब्लॉगर बंधू-बांधव इस मामले पर कितने संजीदा है ! लेकिन यह जानकर निराशा हाथ लगी कि किसी ने भी इस और ध्यान देकर लिखना तो दूर, कहीं पर टिपण्णी करना भी मुनासिब नहीं समझा( हाँ अगर कुछ मेरी नजरो से ही छूट गया हो तो क्षमा चाहूंगा ) ! इस ब्लॉग जगत पर मैं अक्सर देखता हूँ कि महिलाओं से सम्बंधित बातो पर कुछ लोग नाहक ही दुबले हुए जाते है! साथ ही कुछ महिला ब्लोगर किसी ब्लोगर की सार्थक पहल को भी महज एक ढकोस्लाबाजी कहकर कई बार अप्रिय शब्दावली इस्तेमाल करती है! अभी हाल का एक उदहारण मैं इस तरह से देता हूँ कि इस ब्लॉग जगत के हमारे एक वरिष्ठ और सम्मानित ब्लॉगर श्री सी.एम् प्रसाद जी ने एक लेख लिखा था, 'महिला सुशिक्षित और सशक्त हो', उस लेख की कड़ी में एक महिला ब्लोगर की टिपण्णी निराशाजनक लगी ! मैं उस टिप्पणी की चर्चा यहाँ नहीं कर रहा, मगर इस लेख के माध्यम से एक छोटा सा संदेस उन लोगो तक पहुंचाना चाहता हूँ कि आपको यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ '...

लघु कब्बाली !

पता नहीं आप लोगो का मन भी ऐसा करता है अथवा नहीं, मगर मेरा कभी-कभी ये मन बड़ी अजीबोगरीब हरकते करता है ! आज सुबह से मन कर रहा था कि मैं ताली बजाऊ , रास्ते में ड्राइव करते वक्त स्टेरिंग छोड़ ताली बजाने लगता, फिर अगल-बगल झांकता, चलने वालो को देखता कि कोई मेरी हरकते तो नहीं देख रहा :) बाद में ध्यान आया कि आज हमारे मुस्लिम बंधुओ का नववर्ष है , तो सर्वप्रथम मैंने उन्हें नवबर्ष की शुभकामनाये दी और फिर सोचा कि क्योंकि अपने मुस्लिम भाई-बहन कब्बाली गाना बहुत पसंद करते है तो चलो आज एक कब्बाली ट्राई की जाए ! सुन्दर और थोड़ा लम्बी तो नहीं बन पडी मगर जो भी है, उन्हें नवबर्ष पर समर्पित कर रहा हूँ ! तो आइये आप भी ताली बजाये, मेरे संग :) मेरी बेपनाह मुहब्बत का जानम,  ये तुमने क्या सिला दिया, ये तुमने क्या सिला दिया,,,, ये तुमने क्या सिला दिया,,,,,,२  नजरों से छलकाके इश्के-जाम , घूंट जहर का पिला दिया,   मेरी बेपनाह मुहब्बत का जानम,  ये तुमने क्या सिला दिया, ये तुमने क्या सिला दिया,,,, ये तुमने क्या...

जीवन सच !

रहे इम्तहानों से बेखबर, जिन्दगी की ये रहगुजर, भटकते हुए इधर-उधर, जिन्दगी यूँ जाती गुजर।  तुत्ती -बोतल से होता शुरू  मुश्किल मंजिल-ए-सफ़र, भरती जवानी जब देह में , गुजरता वक्त शीतल पेय में।   घिरती उलझनों में जवानी , मन खोजता  रंगीन पानी , पहुँचता जब अगले तल में , तन सिमटता शुद्ध जल में।  कभी बोतल मुह से घटकी , कभी सेज  ऊपर से लटकी, बोतल पे  ही  ख़त्म  होता , बोतल से शुरू  हुआ सफर।   रहे इम्तहानों से बेखबर, जिन्दगी की ये रहगुजर ।  

लो फ्लोर राजनीति की तकनीकी खामियां !

यों तो अपर फ्लोर में भी सफ़र करते वक्त हमें कभी बैठने के लिए एक अदद सीट नहीं मिली, मगर इस "लो फ्लोर" राजनीति में तो मुसाफिर त्रिशंकु बनकर रह गया, न ठीक से बैठ पाता है और न ही खडा रह पाता है! वो भी क्या दिन थे, जब अपर फ्लोर में भले ही बैठने के लिए सीट न मिलती हो, मगर पिछले हिस्से में खड़े होकर, अन्य मुसाफिरों संग बतियाते हुए ऑफिस से घर और घर से ऑफिस का डेड-दो घंटे का सफ़र यूँ ही कट जाता था! खैर, आज जब हर चीज गिर रही है(महंगाई के अलावा) तो ये भी अपर फ्लोर से गिरकर लोअर फ्लोर पर आ गई ! हाँ नहीं बदला तो सिर्फ इसकी मार झेलने वाला, वह वही है ! अगर ईमानदारी और कुशलता से अपर फ्लोर वाली का संचालन ठीक से किया जाता तो सफ़र के लिए बहुत ही सुन्दर और आरामदायक व्यवस्था उसी में हो सकती थी, मगर इस देश को तो राजनीति की भ्रष्टता मार गई! एक वाकया याद आ रहा है, किसी काम से फरीदाबाद से लौट रहा था, बदरपुर के पास एक आरटीवी ड्राइवर ने गलत दिशा से गाडी को घुमाते हुए मेरी गाडी का बम्पर तोड़ डाला! ४६ डिग्री के तापमान में गुस्से में तमतमाते हुए मैंने उस आरटीवी के ड्राइवर के एक लगा दी ! पास खड़ा ट्रैफिक पुलि...

एक ख्याल; अच्छे कर्म और ग्लोबल वार्मिंग !

आज जब ग्लोबल वार्मिंग से सम्बंधित एक लेख विस्फोट पर पढ़ा, जिसमे की आर एस एस प्रमुख श्री विष्णु भागवत के विचारों को उल्लेखित किया गया था, तो मेरे मन में भी एक ख्याल आया, जिसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; मेरा यह मानना है कि धर्म और कर्म एक सिक्के के दो पहलू है, और धर्म का आशय अच्छे कर्म करते हुए उच्च मर्यादाओं मे रहने से है। अगर आप भी इस बात मे विश्वास करते है और साथ ही भगवान पर भरोसा रखने वालों मे से है, तो आप लोगों को नही लगता कि इस सुपर साइंस के युग मे भी हम लोग कैसे यह सोच लेते है कि एक अकेले भगवान, चाहे वे कितने ही सर्वशक्तिमान क्यों न हो, इस पूरे विश्व को अपने ही बलबूते पर अकेले सम्भाल रहे होंगे? वह खुद ही इस धरा पर विचरण करने वाले हर एक प्राणी पर नजर रखकर उसका लेखा-जोखा करते होंगे ? वह भी तब, जब यह पूरी दुनियां ही एक से बढ्कर एक पापियों से लबालव हो। इम्पोशिबल सी बात लगती है । अगर मेरी बात सत्य है तो कल्पना कीजिये कि वे पूर्वज कितने ज्ञानी रहे होंगे, जिन्होने यह पता लगाया था कि इस दुनियां के सुचारु संचालन मे भगवान की मदद हेतु तेतीस करोड देवी-देवता भी है। य़ों तो मै खुद भी बहुत ज्यादा...

शर्मशार है लोकतंत्र !

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रोज की भांति सुबह तड़के जागा और बाहर बरामदे में खडा हाथ पैर हिला-डुला रहा था कि सामने पार्क के कोने पर एक इंसानी आकृति सी दिखी! गौर से देखा तो वह अपने मोहल्ले में झाडू-पोचा करने वाली अहिल्या थी ! पार्क के कोनो में पड़े कागजो को समेट रही थी! जिस रास्ते पर सुबह अपने पालतू कुत्ते को लेकर टहलने के लिए जाता हूँ, वहीं एकदम सड़क के किनारे ही अहिल्या बाई झुग्गी डाल रहती है ! मैं जब पास से गुजरा तो वह कुछ कागज़ चूल्हे में डाल आग जलाने की कोशिश कर रही थी! मुझे देख नमस्कार बाबू जी बोली ! मैंने भी नमस्कार कहा और पूछा, ज्यादा ठण्ड हो गई है, आज सुबह-सुबह कागज समेट कर ले जा रही थी ! वह बोली , बाबूजी क्या करे, चुल्हा जलाने के लिए लकडिया ही नहीं है, और महंगाई इतनी हो गई ! फिर वह देश की एक ख़ास नेता को भद्दी गाली देने लगी ! मैंने कहा,क्या करे, इन्हें जिताते भी तो तुम्ही लोग हो ! वह बोली, नहीं बाबूजी हम तो इन्हें कभी वोट देते ही नही , क्योंकि ये जब भी आते है महंगाई बढ़ती है ! मैं आगे बढ़ा और सोचने लगा कि जब इस देश का निम्न वर्ग कहता है कि ये तो इन्हें कभी वोट देते ही नहीं, मध्यम वर्ग कहता है कि हम लोग तो पढ़े ...

अंधे आगे नाच के, कला अकारथ जाए !

वतन गुलाम हुआ फिर से,कुटिलई  परिवेश का, यही सोचता हूँ कि क्या होगा अपने इस देश का ? फर्क  पाना मुश्किल हुआ, साधु -वद के वेश का, यही सोचता हूँ कि क्या होगा अपने इस देश का ? एक पटेल थे,लग्न से थी बिखरी रियासतें समेटी, ये भी  हैं ,बांट रहे कहीं बुन्देलखन्ड,कही अमेठी ! घॊडा भाग रहा है यहां हर तरफ़, वोट की रेस का, यही सोचता हूँ कि क्या होगा अपने इस देश का ? मची हुई चहु दिशा में,बदइंतजामियत की  हाय , गिला व्यर्थ,अंधे आगे नाच,कला अकारथ जाय !     जलाता  है खून 'परचेत’,निज शरीर अवशेष का, यही सोचता हूँ कि क्या होगा अपने इस देश का ?

जोकर !

वह सर्कस का जोकर, तमाम किरदारों के मध्य, एक अजीबो-गरीब किरदार, मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्शकों को हंसाना, उनका मनोरंजन करना, और खुद की शख्सियत सर्कस के जानवरों से भी कम । जोकर जो ठहरा, आम नजरों मे उसकी अहमियत इतनी कि बस उसे एक भावना-विहीन, नट्खट अन्दाज का रोल अदा करने वाला, प्राणी मात्र समझते है हम ।।

पूरे पैर पसार सोने की चाहत !

पूस की रात, दिल्ली की कुहास भरी ठण्ड, एक छोटे से सफ़र पर निकला था अमृतसर तक।  निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर कोने से सटी बेंच पर बैठ, गाडी का इन्तजार कर रहा था।   बेंच  के  बगल में ही कोई मानव रुपी जीव  पुरानी सी एक कम्बल ओढ़ , प्लेटफॉर्म के फर्श पर  अपनी दिनभर की थकान  मिटाने को व्यग्र , पैर लम्बे पसारकर  करवट बदल रहा था।   तभी कुछ दूरी से  बूटो की कदमताल  खामोशी को तोड़ते  मेरे वाले बेंच की ओर बढ़ी ,  रेलवे सुरक्षा बल के जवान थे वो  ।  पास से   गुजरते हुए  मैं उन्हें देख  ही रहा था कि  तभी अचानक  मेरी ध्यान निद्रा टूटी  यह देखकर कि एक जवान ने  चादर  ताने उस  मानव जीव पर अपने बूट की ठोकर मारी और कड़ककर बोला,  " हे बिहारी, पैर भांच के सो" ! बूट की ठोकर से और  कडकडार सुर सुनकर  वह  जीव हडबडाकर  उठ बैठा था।   एक नजर दूर जाते जवानो पर और एक नजर उसने मुझप...

सवाल हुर्रियत की भूमिका का भी है !

ऐसा होता आया था, और इस बार भी हुआ कि सरकार और नरमपंथी हुर्रियत कांफ्रेंस के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले हुर्रियत कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता फजल हक कुरैशी को गोलियों से छलनी कर दिया गया। ऐसा क्यों होता है कि जब-जब जम्मु-कश्मीर मे किसी राजनैतिक पहल की सम्भावना बनती है, मध्यस्थ को निशाना बना दिया जाता है? पहले भी जब गुप्त तरीके से इस तरह की बातचीत का ढोंग रचा गया, मध्यस्थ को ही निशाने पर रख कर इन्होने अपनी दूकान चालू रखने में उसका फायदा उठाया । लोग सीधे तौर पर पाकिस्तान और पाक समर्थित आतंकवादियों के सिर दोष मडकर, मामले को वहीं तक सीमित समझ लेते है। जबकि हकीकत मे इसका एक पहलू और भी है जिस पर गौर करना भी नितांत आवश्यक है। अगर गौर से हम देखे तो जो हुर्रियत कांफ्रेस के दो धडो, चरमपंथी और नरमपंथी की बात की जाती है, हकीकत मे ऐसा कुछ नही, या यूं कह लीजिये कि या तो पूरा ही धडा चरमपंथी है या फिर मौका परस्त। हमें यह समझने की कोशिश करनी होगी कि चाहे वह उदारवादी धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारुक हो अथवा कट्टरवादी गिलानी गुट , सिक्का एक ही है, और मौके के हिसाब से चलन बदलता रहता है। एक ऐसा मौका परस्...

मानसिकता !

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(चित्र नेट से साभार ) यों तो गुलामियत का डीएनए हमारी रगों में चिरकाल से रहा है, मगर मैं हम भारतियों की रगों में पूर्ण रूप से इसको विकसित करने में मैकाले को इसका काफी श्रेय देता हूँ ! भारत में इस्लामिक शासन की स्थापना के शुरूआती दौर में गुलाम बंश, खिलजी बंश, तुगलक बंश, शैय्यद बंश, लोधी बंश से फलना-फूलना शुरू हुआ यह अभिशाप सोलहवी सदी में जब इस्लामिक शासको का दमनचक्र बढना शुरू हुआ और फिर अगली सदी में इनके पतन के बाद भारत में ब्रिटिश राज स्थापित हुआ तो मैकाले के ब्रिटेश शिक्षा प्रणाली के प्रसार के बाद तो यह अपने चरम को ही छू गया ! William Carey in one of his letters, described Indian music as "disgusting Charles Grant published his "Observations" in 1797 in which he attacked almost every aspect of Indian society and religion, describing Indians as morally depraved, "lacking in truth, honesty and good faith" (p.103). British Governor General Cornwallis asserted, "Every native of Hindustan, I verily believe, is corrupt". जहां एक ओर हममे कम आत्म सम्मान और गु...

जरुरत आन पडी है !

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ये वोटर कब सुधरेंगे ?

इस तथ्य को जानते हुए भी कि आज के इस युग में एक अपराधी और दुराचारी को सुधारना नामुमकिन जैसी बात है, फिर भी हम लोग, यहाँ तक कि उच्च शिक्षित वर्ग के लोग भी जब देश में राजनैतिक और प्रशासनिक सुधारों की बात आती है तो पहले तो इन राजनीतिज्ञो को दो-चार गालियाँ देते है और फिर मासूमियत से कहते है कि देश के राजनीतिज्ञो को सुधारा जाए, सब अपने आप सुधर जाएगा ! कैसे सुधारा जाए इस ओर कोई ध्यान नहीं देता ! हम भूल जाते है कि इस देश में एक ख़ास किस्म का "वोटर वर्ग" भी है, जिसकी इस देश की राजनीती में एक अहम् दखल है, क्योंकि इसकी कृपा से शरीफ और ईमानदार इंसान भले ही सफल न हो, मगर कोई भी चोर उचक्का, बदमाश, कातिल, भ्रष्ट और देशद्रोही इस देश की सत्ता पर काबिज हो सकता है! अगर हम सच में देश की फिकर करते है तो आज जरुरत है इस वोटर वर्ग को सुधारने की ! क्योंकि इस वोटर वर्ग और इसके वोटबैंक की वजह से ही इस देश की आज यह राजनैतिक दुर्दशा दृष्टिगौचर है ! इस ख़ास वोटर वर्ग ने अपने तुच्छ निहित स्वार्थो के चलते कभी यह नहीं सोचा कि जिसे हम झुंडों में जाकर वोट देकर जिता रहे है, वह आगे चलकर इ...

To err is human to forgive is devine

एक बार फिर से अंग्रेजी की चार लाईने और ठेल रहा हूँ ब्लॉग पर ; Yes, I have committed a sin, If you think love is a crime. I brought down the sky for you, like a drink with a twist of lime. Of course, It’s nobody’s fault but mine. Now , all I can say is that To err is human to forgive is divine. You can just pray to a god, please forgive him, Oh lord ! as he doesn’t know what he is doing. What is the theme of love and wooing. Frankly My dear, I don't give a damn, For me, every day is a day of valentine, That’s why I say, To err is human to forgive is divine.

यूनियन कार्बाइड !

वीरान हो गई वो सजीव वादियाँ  , रहते थे जहां इन्सान कल तक , घूंट जहर का  उन्हें ही  पिलाया , थे तुम्हारे जो कदरदान कल तक। थम गया सब कुछ पल दो पल मे, था  न वह सहरा  वीरान कल तक, अब है नहीं जहां धड़कन की आहट , साँसों के  थे वहाँ तूफ़ान कल तक। उन्हें मारा बेदर्दी तडफ़ाके तुमने , समझे थे तुमको नादान कल तक, शरद तिमिर में  उनको ही लूटा , जिनके थे तुम मेहमान कल तक। उजड़ी सी लगती है आज जो बस्ती , लगती नहीं थी वो बेजान कलतक, संजोया था जो इक ख्वाबो का शहर, लगता नही था वो शमशान कल तक। - भोपाल गैस त्रास्दी पर इसे ३० दिसम्बर, १९८४ को लिखा था।  

फ्रांस की क्रांति जैसी क्रांति क्या इस देश मे भी….. ?

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शुरु करने से पहले, संक्षेप मे आये देखें कि क्या थी फ्रांस की क्रान्ति और कैसे आई थी वह क्रांति।१७८९ -१७९९ फ्रांस के इतिहास में राजनैतिक और सामाजिक उथल-पुथल और आमूल परिवर्तन की अवधि थी, जिसके दौरान फ्रांस की सरकारी सरंचना, जो पहले कुलीन और कैथोलिक पादरियों के लिए सामंती विशेषाधिकारों के साथ पूर्णतया राजशाही पद्धति पर आधारित थी, अब उसमें आमूल परिवर्तन हुए और यह नागरिकता और अविच्छेद्य अधिकारों के प्रबोधन सिद्धांतों पर आधारित हो गयी। आर्थिक कारकों में शामिल थे अकाल और कुपोषण, जिसके कारण रोगों और मृत्यु की सम्भावना में वृद्धि हुई, और क्रांति के ठीक पहले के महीनों में आबादी के सबसे गरीब क्षेत्रों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गयी। अधिक बेरोजगारी और रोटी की ऊँची कीमतों के कारण भोजन पर अधिक धन व्यय किया जाता था, और अन्य आर्थिक क्षेत्रों में धन का व्यय अल्प होता था। भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, और यह भी एक उलेखनीय बात है की इस क्रांति को सुलगाया वहाँ की महिलाओं ने । कहा जाता है की एक बार जब तंग आकार महिलाओ ने उस होता को घेरा जिसमें शाही परिवार ठहरा था, तो जब राजकुमारी ने उनके आन्दोलन करने का कारण ...

धुंधलाई यादे !

कल एक आंग्ल भाषा में कविता लिखी थी, "फ़ॉगी मेमोरी" कुछ सम्मानीय पाठको ने उसके अनुवाद की पुरजोर मांग की थी अत: यहाँ उसका छंद क्रमश: अनुवाद प्रस्तुत है, कविता रूपी अंदाज में ढालने के लिए अनुवाद को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा हूँ ; मदमस्त तेरा जहां आज भौरों ने घेरा है !, लेकिन ऐ दोस्त ! तुझे याद है कि तेरा प्यार ही तो यहाँ,सब कुछ मेरा है !! तुम्हे बताऊ,तुम्हे भुलाना नामुमकिन है ! युगों से मेरा दिल, ज्यों किसी बूढ़े खलिहान की तरह टूटकर हो गया छिन्न-भिन्न है !! I know, your life is full of bumblebee, But, your love is everything for me . do you remember, eh, Mate ? you are so hard, so hard to forget. I miss you, I wanna tell you, for epoch,an old barn falling apart! across the inner circle of my heart !! तकदीर का उसकी ख़याल न कर, जो तुमने लिखे प्यार के चार अक्षर , नहीं मालूम कि जान के लिखा था या अनजाने में ! ताजे बर्फ की उस चादर पर , तुम्हारी कला के हर कण ने क्या खुशी भरी थी मेरे दिल के तहखाने में !! Once, without knowing its fate, You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets. willingly or u...

क्या इस देश में गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ?

कागजों पर हमारे देश में बहुत ही लुभावनी कार्यवाहियां होती है, मसलन भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय इस देश में बेटियों के लिए बड़े-बड़े प्रोत्साहन की घोषणाये करता है, राज्य सरकारें बेटी होने पर पता नहीं क्या-क्या खाते खुलवाकर इनाम बाटती फिरती है, उन्हें मुफ्त शिक्षा और पता नहीं क्या-क्या सुविधाए उपलब्ध कराती है। मगर फिर सवाल वही की हकीकत में क्या सचमुच ऐसा होता है? पासबुके खुल भी रही हों तो क्या गारंटी है कि वह पास बुक किसी गरीब की ही बेटी के नाम है ? क्या मापदंड हमारे पास है यह देखने के लिए कि वह पासबुक किसी नेता या नौकरशाह की बेटी के नाम नहीं है? सुनने और पढने में यह भली ही हास्यास्पद लगता हो लेकिन हकीकत भी इससे बहुत दूर नहीं है। आज देश बाजारीकरण और ग्लोबलाइजेशन के दौर से गुजर रहा है, जहां सुई से लेकर सेटेलाईट तक की कीमतों का निर्धारण दुनिया के तमाम बाजारी शक्तियां निर्धारित करती है। अन्य देशो के मुकाबले हमारे इस देश में सदियों से सोना एक विवाहित स्त्री का मुख्य आभूषण रहा है और एक गरीब से भी गरीब व्यक्ति को अपनी बेटी के व्याह के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं ...

Foggy memory !

यों तो अग्रेजी में हाथ बहुत साफ़ नहीं है ,या यूँ कह लीजिये कि बहुत तंग है ! मगर आज बस, परखने के लिए एक अंगरेजी पोएम लिखी, इसे भी ब्लॉग पर ठेल रहा हूँ आपके सुझाओ की प्रतीक्षा में ; I know, your life is full of bumblebee, But, your love is everything for me . do you remember, eh, Mate ? you are so hard, so hard to forget. I miss you, I wanna tell you, for epoch,an old barn falling apart! across the inner circle of my heart !! Once, without knowing its fate, You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets. willingly or unwillingly don’t know, Like on the keffiyeh of fresh snow. And gladness filled every ounce of your art ! across the inner circle of my heart !! At middle of the circle on a hoarding, It looks funny, but you had a boarding. and you mentioned innocently there, “I love you so much, oh, my dear” You killed me loftly-softly with a dart ! across the inner circle of my heart !! You sat down slowly and began to paint, and you colored entire my heart, ain’t ? why painting turned suddenly so...

घुन लगी न्याय व्यवस्था और न्यायिक आयोगों का औचित्य !

गौर से देखे तो आज हमारी पूरी क़ानून व्यवस्था ही एक जर्जर अवस्था में पहुँच चुकी है । जो अंग्रेजो के काल से चली आ रही जटिल न्यायिक व्यवस्था इस देश में मौजूद है वह आज अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश के तथाकथित तीन महत्वपूर्ण किन्तु भ्रष्ट खम्बो में से एक जो यह खम्बा भी है, इस पर से भी लोगो का विश्वास धीरे-धीरे उठता जा रहा है। हमारी न्यायिक व्यवस्था को पाकिस्तान से आया आतंकवादी कसाब आज मुह चिढा रहा है। सब कुछ खुला-खुला है कि इस आतंकवादी ने क्या किया, मगर सालभर से अधिक का वक्त और ३१ करोड़ रूपये खर्च करने के बाद भी हमारी न्याय व्यवस्था उसके साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेल रही है। दूसरी तरफ लिब्राहन आयोग, और अन्य इसी तरह आयोग हमारी जांच प्रणाली पर ही सवालिया निशान लगा रहे है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया, यह कहावत सिर्फ अयोध्या के ही केस में नहीं चरितार्थ होती अपितु अन्य मामलो जैसे बोफोर्स, १९८४ के दिल्ली दंगे, नब्बे के दशक के मुंबई दंगे और बमकांड, चारा घोटाला इत्यादि-इत्यादि सभी पर लागू है। सरकारिया काम-काज के तरीके और राजनीतिज्ञो के आचरण से भी नहीं लगता क...

ये दुनियां चलायमान है मूरख!

इस कदर करता किस बात पर अभिमान है , ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। भाई-भतीजा, गांव-गदेरा, जाना तय है  और  अन्तकाल मा कोई न तेरा, फिर  किस बात का, तुझे इतना गुमान है। ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। । अच्छा -बुरा  नीति-अनीति , इनमे से ही है तय करना, निष्पादन  जैसा , प्रतिफल भी वैसा ही भरना, कुछ ऐसा ही जगत का अपना एक  विधान है।   ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। । चरित्र मुट्ठी में बंद बालू  है   फिसल न जाये, पकड के रख,  प्रतिष्ठा  गतिवान है   खिसक  न जाए ,जकड के रख, लोभ  की आंधियो में जो डगमगाये वो ईमान है।   ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है  । ।

सरकार द्वारा प्रायोजित दीखती है मंहगाई !

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इसमे कोई सन्देह नही कि आज दुनिया भर मे छाई इस मंदी और मंहगाई ने सारे ही अर्थशास्त्र की परिभाषाओं को उलट-फेर कर रख दिया है । अर्थशास्त्रीयों द्वारा दी गई परिभाषाओं के मुताविक आर्थिक मंदी के दौर मे लोगो की क्रय करने की क्षमता कमजोर पड्ती है , जिससे उचित ग्राहक न मिलने की वजह से वस्तुऒ और सेवाऒ के दामों मे गिरावट आती है। लेकिन आज हकीकत मे तो स्थित ठीक इसके विपरीत दीखती है, आर्थिक मंदी भी है और मह्गाई भी, यानि सब उलटा-पुल्टा। जहां एक ओर इसके लिये तेजी से बढती जनसंख्या और लोगो के जीवन स्तर मे सुधार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वही दूसरी ओर इसका एक प्रमुख कारण है, जमाखोरी और असंगत और अनुचित वितरण प्रणाली। मगर इन सबसे ऊपर है सरकारों का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार, और इसे रोकने के लिये इच्छा शक्ति का अभाव ! दिखावे के लिये भले ही हमारी सरकार, महंगाई के सम्बंध मे घडियाली आंसू बहा रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार इस सम्बंध मे कतई गम्भीर नही ! इसे एक उदाहरण से इस तरह समझा जा सकता है कि अन्य सालों के मुकाबले इस साल भी टमाटर के उत्पादन मे कोई उल्लेख्नीय गिरावट नही आई, बावजूद इसके पिछले सालों के मुक...

सांख्यिकी और संभाव्यता !

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ठुमकते हुए चलते , तुम्हारे पैरो के तलवों की सरगम  और  नूपुरों की छम -छम से  मेरे दिल की गहराइयों में छुपे भावो को ऐंसी गूढ़ शब्दीय काव्यता  मिल जाती  है ! मानो, जैसे कभी  धूल पोंछते वक्त  शेल्फ में रखी   सांख्यिकी की  किताबों से,  नीचे गिरती शुष्क फूल की  पंखुड़ियों  की गणना करते  किसी के बेइंतिहा  प्यार  की प्रबल संभाव्यता मिल जाती  है !!

कुर्बानी लेना ही नहीं, देना "भी" सीखो !

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मैं, हूँ तो निहायत ही एक भोला-भाला, सीधा-साधा सा ग्रामीण, मगर उस दुश्मन की बड़ी इज्जत करता हूँ, जो मान लो कि मुझे ख़त्म करने की इच्छा रखता हो और आकर कहे कि मैं तुम्हे मारना चाहता हूँ ! खुले मैदान में आ जावो, एक तलवार या कोई भी हथियार मेरे पास है, एक तुम पकड़ लो और दो-दो हाथ कर लेते है ! तुम जीते तो तुम जियो, मैं जीता तो मैं जिऊंगा ! और नफरत करता हूँ मैं उस कायर से, जो छुपकर वार करता है, किसी बच्चे या स्त्री को ढाल बना के और अपने को वीर समझता है! कुछ तथा-कथित विद्वान लोग, जो यह तर्क देते फिरते है कि दुश्मन को टैक्टफुली मारना ही समझदारी है, उसे प्रतिघात का मौका ही मत दो! ऐसे विद्वान अगर ज़रा सी भी ईमानदारी से अपनी गिरेवान में झाँक के देखे, तो पायेंगे कि दूसरो को भले ही वे विद्वतापूर्ण सन्देश दे रहे हो, मगर खुद है, बुजदिल और कायर ! यदि हर छलपूर्ण कार्य समझदारी है, तो किसी बैंक की दीवार पर जब कोई चोर सेंध लगाता है और खजाना लूटता है तो उसे चोरी की संज्ञा क्यों दी जाती है, उसने भी तो विद्वता पूर्वक वह काम किया ? खैर, यह तो थी प्रस्तावना, अब असल बात पर आता हूँ! आप लोग तर्क देंगे कि वैसे भी तो हम...

आह्वान- उठ, जाग मुसाफिर जाग !

कद्र जहां शान्ति की  हो  , वहां शान्ति का इजहार कर, किंतु, वैरी  न माने प्यार से  तो, पलटकर  वार कर। हम तो  सदा से शान्ति के, पथ पर ही चलते आये है, किन्तु ऐवज मे अमूमन, जख्म ही  देह ऊपर पाये है, जिल्लत उठाई है बहुत,मुगल,फिरंगियो से हारकर, अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।   आखिर इसतरह कब तक सहेंगे ,जुल्म सहना पाप है, है दुष्ट-दानव दर पे बैठा, जो मानवता पर  अभिशाप है, छद्म युद्ध थोंपा है हमपर ,निरपराधों का नरसंहार कर, अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।   बेइंसाफी की आहटों पर, चुप  न बैठों  नजरें फेरकर ,  दुश्मन लगे लांघने हदें जब , तो मोरो उसे घेरकर, पहल खुद से ना हो अन्याय की, ऐंसा व्यवहार कर अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।     दिन प्रतिदिन  दुश्मनो का हौंसला,हो रहा उन्मत्त है, उठ, जाग मुसाफ़िर जाग, अभी भी पास तेरे वक...

क्या आपका खून नही खौलता ?

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आप इस बच्ची को देख रहे हो न, इस मासूम का दोष सिर्फ इतना था कि इसने आप और हम जैसे कायरो के देश में जन्म लिया ! और पड़ोसी मुल्क के कुछ राक्षसों ने इसका स्वागत बमों और गोलियों से किया ! आप इस माँ को देख रहे हो न ? आप नहीं देख पायेंगे, क्योंकि आप तो जन्मान्ध हो ! अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड से जब अपने इकलौते बच्चे की लाश पर विलखते हुए इसकी छट्पटाती अंतरात्मा की वेदना दहाड़े मार- मार कर रो रही थी, तो अगल-बगल की दीवारों की रूह भी पसीज गई थी! मगर आप कहाँ से सुनते, आप तो जन्मजात बहरे हो ! इस जैसी पता नहीं कितनी मांये जिनका बेटा-बेटी भी आतंकवाद की भेंट चढ़ गये, वह कुछ दिनों तक फूट-फूट कर रोंयीं और अपने भाग्य को कोसती रही, और फिर आखिर दिल पर पत्थर रख कर खामोश हो गई ! मगर चाहते हुए भी आप जैसे वीर पुरुषो, जो कि हरवक्त अभेद सुरक्षा कवच और कालेवर्दी धारी कमांडो से घिरे रहते हो, का कुछ नहीं बिगाड़ सकी! और आपने सोच लिया कि चलो इस बला से भी पिंड छूटा, किसी को कोई जबाब नहीं देना पडा ! लेकिन आपको शायद मालूम न हो कि एक असहाय, कमजोर और निर्दोष की 'बद-दुआ' और दिल से निकली 'हाय' कितनी शक्तिशाली ...

और हमारे संचार माध्यम कब सुधरेंगे ?

आज एक खबर पढी, पढने के बाद अपने देश के संचार माध्यमों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था ! करीब महीना भर पहले आपने भी यह खबर पढी होगी: लखनउ, 29 अक्टूबर :भाषा: गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद थाना क्षेत्र में आज पुलिस ने 50 हजार रूपये के इनामी बदमाश रवीन्द्र त्यागी को मुठभेड़ में मार गिराया।........... इसके बाद जवाबी फायरिंग में बदमाश मारा गया, जबकि उसकी गोली से उपनिरीक्षक अनिल कपरवान तथा तीन सिपाही परमजीत सिंह, आदित्य और तेजपाल घायल हो गये, जिनमें से कपरवान और परमजीत को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खबर यह थी कि उचित चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने के कारण घायल सिपाही परमजीत सिंह की अपने पैत्रिक गाँव में कल मृत्यु हो गई ! जिस दिन यह घटना घटी थी, मैं भी गा.बाद में करीब डेड घंटे तक जाम में फंसा रहा था, इसलिए इस घटना का वाकया मेरे दिमाग में था! यह जानकार बड़ा अफ़सोस हुआ कि जिस जाबांज ने एक अपराधी को दबोचने में अपनी जान की बजी लगा दी, उसे हम उचित चिकित्सकीय सहायता नहीं उपलब्ध करा पाए ! फिर यह देश किस आधार पर किसी जाबांज अफसर या जवान से यह उम्मीद रखे कि वह अपने कर्तव्य को अंजाम देने में जी-जान लगा दे ? और त...

फिर सनक गया दिमाग कार्टून बनाने को.....

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ट्वींकल-ट्वींकल औल दि नाईट ! रविवार की व्यस्तता की वजह से कल रात को कुछ खास नही लिख पाया ! लोग कहते हैं कि इंसान का कबाडी(साहित्यिक) दिमाग पैदाइशी होता है, एक हास्य (पैरोडी कहना पता नही कहां तक उचित होगा, मुझे नही मालूम) तब लिखी थी, जब नौवीं-दसवीं मे पढ्ता था ! और मेरा तो यह मानना है यह एक ऐसी पोएम थी, जिसे ज्यादातर लोगो ने समय-समय पर अपने तरीके से भिन्न-भिन्न रूपों मे प्रस्तुत किया, आइये आपको भी सुनाता हूं! कुछ व्याकरण की गलतियों को जो उस समय पर मेरे हिसाब से सही थी, मैने उनमे सुधार नही किया, शब्द अगर अशोभनीय लगे तो अग्रिम माफ़ी ! ट्वींकल-ट्वींकल औल द नाईट जीरो वाट की धुमली लाईट वन मिड नाईट वेन माई वाइफ़ वज डीपली सिलेप्ट ऐट माई लेफ़्ट साईड सपने मे सी सौ अ पिक्चर, ऐज वह ट्रैवलिंग इन अ ऐयर फ़्लाईट जिसमे सौ हर मोस्ट ब्युटी, भेरी डेंजरस अ ग्रीडी काईट हर ब्युटिफुल फ़ेस हैड डर के मारे, तुरन्त बिकेम फ़्रोम रेड टु वाईट ऐट लास्ट जब काइट रीच्ड नियर हर, बचाओ-बचाओ ! सी क्राईड मै जागा ऐन्ड वोक्ड हर अप बाय हर आर्म्स सी होल्ड मी वेरी टाईट सुन कर हर व्वाइस अवर पडोसी, सोचा दिस कि दे हैव अ फाईट पर जब दे पीप्...

लघु कथा- परवेज

आज मुझे छुट्टी से लौटकर अपनी यूनिट आये पूरे आठ महीने बारह दिन हो गए, लेकिन साले, तूने इस दौरान मुझे एक भी ख़त नहीं लिखा ! यहाँ हमारे पास इ-मेल भेजने का कोई साधन नहीं , इसका मतलब यह तो नहीं कि तू ख़त भी न लिखे ! तुझे याद हो न हो, लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद हैं वो कॉलेज के दिनों की बाते, और वो पी. सी. की फुल फॉर्मस, सारी की सारी ....! अगर मैंने एक-एक कर कभी भाभी जी को सूना दी तो फिर रोयेगा, मैंने बता दिया ! अगर बचना चाहता है तो हर महीने कम से कम एक ख़त मुझे जरूर लिख दियाकर ! साले, एक तू और रेखा ही तो हैं मेरे इस दुनिया में, जिन्हें मैं दिल की हर बात बता पाता हूँ, और मन का बोझ हल्का कर पाता हूँ! आज फिर से इस पत्र के माध्यम से, तुझे मैं अपने दिल की एक और बात बताना चाहता हूँ ! सोचा था कि यह बात मैं अभी अपने ही दिल में दफ़न करके रखूगा, और जब काफी साल गुजर जायेंगे, तब तुम्हे बताऊंगा ! लेकिन अपने मुल्क से दूर, यहाँ इस विदेशी मुल्क में न जाने कभी-कभी ऐसा क्यों लगने लगता है कि इस साल की दो महीने की छुट्टियाँ अपने घर वालो और तुम जैसे लोगो के साथ बिता पाने का सुअवसर शायद फिर से मिले न मिले ! यूँ त...