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Showing posts from September, 2009

पुरानी यादे और ताजा दिमाग !

देर से ही सही, मगर सभी ब्लोगर मित्रो को विजय दशमी और दशहरा की हार्दिक शुभकामनाये ! तीन-चार रोज के लिए अपने बचपन के दोस्त शुकून और शान्ति को ढूँढने उनकी तलाश में सड़क मार्ग से एक लम्बे और थकाऊ सफ़र पर निकल गया था ! खैर, जैसा कि मुझे पहले से अंदेशा था, दोनों नहीं मिले ! बस, इस सफ़र में कोई मिला भी तो बदइन्तजामी के उबड़-खाबड़ रास्ते और उनपर उडती व्यवस्था की धज्जियों की धूल ! और हद तो तब हो गई, जब राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे एक कसबे के इकठ्ठा लोग बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करने सड़क पर यातायात अवरुद्ध कर बैठ गए ! तकरीबन सवा घंटे के बाद जब रावण जी जलाये गए, तभी जाकर धीरे-धीरे यातायात खुल सका ! मंजिल पर जल्दी पहुँचने की फिराक में जब कुछ कार चालको ने आगे बढ़ने की कोशिश की तो पुलिस के एक सिपाही के आदर्श वचन भी सुनने को मिले ! वे कार चालको से कह रहे थे कि दीखने में तो आप लोग पढ़े लिखे ड्राइवर लगते है और ...... ! " मैं उमस भरी गर्मी में सीट पर बैठा-बैठा बस अपनी ही दुनिया में गुम था ! कभी पागलो की तरह यह सोच कर हस देता कि बड़ी अजीब है आज की दुनिया ! वैसे तो अमूमन भगवान् राम के पात्र बने व्यक्...

एक गांधी यह भी...!

इससे पहले कि मै इस दुर्जन की बात लिखना सुरु करू, एक शेर सुनाने का दिल कर रहा है। पेश-ए-खिदमत है; सजी फूलों की सेज से, ज़रा सी आस उधार ली हमने, विरह वेदना की तपीश, अपने गमो में उतार ली हमने, चंद यादोँ की परिधि मेँ ही ख्वाइशे सिमट के रह गई, तेरे कुछ खतो के सहारे ही, जिन्दगी गुजार ली हमने ! आदरणीय समीर जी को विस्वास दिलाना चाहता हूँ कि यह शेर अपने पूरे होशो-हवास में मैंने ही बनाया है अतः आप बेहिचक होकर वाह-वाह कर सकते है :) अब विषय पर लौटता हूँ; इस बात के लिये हमारी सुरक्षा एजेंसियों और दिल्ली पुलिस की प्रसंशा करनी चाहिए कि उन्होने प्रचार-प्रसार के क्षेत्र मे नक्सलियों की रीढ समझे जाने वाले कोबाद गांधी को दिल्ली से गिरफ़्तार करने मे कामयावी हासिल की। मुम्बई के एक पारसी परिवार मे जन्मा यह शख्स, दून स्कूल का पढा हुआ है, और कट्टर माओ घांदे भाकपा (माओवादी) का पोलित ब्योरो का सदस्य है। यह नक्सलियों के प्रकाशन कार्यो का प्रमुख है, एवं दशको से विदर्भ क्षेत्र में नक्शली विचारधारा के प्रचार प्रसार में लिप्त रहा। पुलिस और सुरक्षा बलों ने तो अपने काम को मुस्तैदी से अंजाम दे दिया, मगर अब बात आकार वहीं...

बेचारा खान !

अरे नहीं-नहीं, मै अपने वाले खानो की बात नही कर रहा, वे तो मजे मे है, और खूब ऐश कर रहे है । अपना खबरिया मीडिया भी तो आजकल सलमान खान के सारे गुनाहों को भुला, बस दिन-रात उन्ही का गुणगान करने मे लगा है। ऐसा लगता है मानो उन्हे, उनके ऊपर लगे सारे आरोपो मे क्लीन चिट मिल गई हो । यहां अपने देश मे तो किसी को अपने पाप धुलने/धुलाने हो, तो बजाये गंगा मैया की शरण में जाने के, सीधे खबरिया चैनलों का रुख करना चाहिये। हां, ये तो खैर अभी शोध का विषय है कि इस पूजन मे चढावा कितना देना पडता है ? और तो और, अगर आप गरम दिल इन्सान नही है, और पडोसी से उलझना नही चाहते, तो बस, लडने के लिये उकसाने का काम भी इन्हे सौंप दीजिये, कम से कम अपने पी एम ओ का तो यही सोचना है इनके बारे में , चीन की घुसपैठ की खबरों को लेकर । हां तो मै बात कर रहा था उस चोर की, जिसे हमारे पडोसी मुल्क पाकिस्तान के लोग अपना अब्बू कहते है, और कहे भी क्यों नही, उनके इसी चोर बाप ने तो उनके हाथों मे एक ऐसी दोनाली बंदूक पकडा दी, जिसकी बदौलत न सिर्फ़ वे दुनिया को धमकाते फिरते है अपितु, अपने आंका, अमेरिका से समय-समय पर ब्लैकमेल के जरिये खूब रंगदारी भी व...

अंधेर नगरी !

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कल रविवार था, एक दोस्त से मिलने गाजियाबाद गया था! लौटते में दिमाग मनोरंजनात्मक पहलू की ओर घूम गया! यों भी जिस दोस्त से मिलने गया था, उसके मनोरंजन का बाजा तो उत्तरप्रदेश सरकार ने पहले से ही बजा रखा था ! बेचारा खीजते हुए बोला कि यार, ये मायावती बहन भी न, पता नहीं क्या-क्या गुल खिलायेगी! सारा फंड तो अपनी मूर्तिया बनाने में खर्च कर दिया, और अब केवल टीवी पर ओपरेटरो पर ३० % (तीस प्रतिशत) टैक्स लगा दिया! वे लोग हमारे से वसूल रहे है! अतः ठीक-ठाक चैनलों वाला पैक खरीदने पर महीने के करीब ५०० रूपये डिश टीवी वाले को देने पड़ रहे है! कोई पूछने वाला ही नहीं है ! दूभर हो गया है इस उत्तरप्रदेश में जीवन तो! उसकी इन्ही मनोरजन की बातो पर गौर फरमाए जा रहा था, सोच रहा था कि मायावती बहन जी ने क्या सोच कर ३०% टैक्स लगाया होगा? क्या वह भी यही चाहती होंगी कि लोग केबल कटवा ले ताकि टीवी पर इन फालतू मीडिया वालो की खबरे न सुन सके ? मन गहमा-गहमी में था, अतः वसुंधरा के पास गाडी मुख्य सड़क पर रोक हम चल दिए गम की दवा की डिस्पेंसरी को ! एक वक्त की डोज ख़रीदी, १०० का नोट उस मर्ज की दवा बेचने वाले हकीम को पकडाया, तो उसने झ...

लघु कथा- और ताऊ मर गया !

सन् ८७-८८ की बात है, महानगरी में ताऊ ( दोस्तों द्वारा दिया गया उपनाम ) की पहली नौकरी लगी थी। सुदूर गाँव से चलते वक्त ताऊ को उसके दोस्तों और परिवार के छोटे बडो ने महानगरी के बारे में काफ़ी हिदायते दी थी; मसलन सड़क ढंग से पार करना, पैसे/पर्स जेब में संभाल के रखना, किसी से झगडा मत करना, इत्यादि -इत्यादि । धोखे ही धोखे है चिरागों की चकाचौंध में, दर्रे-दर्रे पर वहाँ कई राज छुपे बैठे है ! हर चीज़ को ज़रा खुली आँखों से देखना, कबूतर के चेहरे में बाज़ छुपे बैठे है !! ताऊ का क्रूरता से तो सामना उसी वक्त हो गया था, जब अंतराष्ट्रीय बस अड्डे पर रोडवेज से उतर उसने नारायणा के लिए डीटीसी की मुद्रिका बस पकड़ी थी। हुआ यह कि उसने कंक्टर से पूछना चाहा कि भाई साहब ,क्या यह बस नारायणा जायेगी, तो तपाक से जबाब मिला था "हौर तन्ने के यह मारे घर जात्ती दिख री सै, बोर्ड नि दिख रिया कै" वो तो भला हो उस दूसरे सवारी का जिसने कहा, हां जायेगी, चढ़ जा। कुछ दिन बाद लाजपत नगर में ताऊ को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में एक ७५०/- रूपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गई। मालिक था एक खूसट बनिया । कर्मचारियो का शोषण कैसे किया जाता...

कृपया ज़रा इस सच का भी सामना करे !

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पहले स्पष्ट कर दूं कि मेरा किसी भी व्यक्ति अथवा सम्प्रदाय की धार्मिक भावनाओं को न कभी ठेश पहुचाने का कोई उद्देश्य रहा है, और न कभी ऐसी कोई कोशिश करूंगा ! चिटठा जगत पर जो लोग मुझे जानते है, वे यह भी बखूबी जानते है कि पिछले साल-छः महीने में किस तरह कुछ गिनेचुने लोगो द्वारा आम लोगो की धार्मिक भावनाओं और आस्थाओ को चोट पहुचाने का जब भी यहाँप्रयास किया गया, मैंने उसका पुरजोर विरोध किया ! हम सभी लोग जानते है कि आज के इस तकनीकी युग में हम लोग जब कभी अपने परिवारों के साथ सैर पर जाते है तो फोटो खीचते/खिचवाते है, वीडियो बनाते है, ताकि कालांतर में अपनी उन स्मृतियों को ताजा कर सके ! अब मै कुछ उन इस्लाम के चैम्पियनों, जो यहाँ पर ब्लॉग के जरिये लोगो को बड़े-बड़े उपदेश देते फिरते है, उनसे पूछना चाहता हूँ कि जो फोटो मैंने नीचे दी है, उसकी क्या उपयोगिता है ? ( गंभीरता से प्रश्न कर रहा हूँ, कृपया इसे हलके में न ले ) यदि कोई उपयोगिता नहीं है तो मेरा उनसे निवेदन है कि बजाय यहाँ पर उपदेश सुनाने के अपने समाज में जाए और इस बुराई को दूर करने का प्रयास करे ! खूबसूरती देखने के लिए ही होती है, ढकने के लिए नहीं (ए...

आज मेरे पेट में भी सनसनी है !

आज मेरे पेट में भी सनसनी है, दो बातो की सनसनी है: पहली सनसनी तो इन इंडिया टीवी वालो ने पैदा की है ! वैसे आप लोगो को भी बता दूं कि अब त्योहारों का मौसम आ गया है, और अगर आप पुराना टीवी कबाडे में फेंककर, नया टीवी खरीदना चाहते है लेकिन अपनी पुरानी चीज से मोह आपको ऐसा करने से रोक रही है, तो मेरा सजेसन है कि अगर आप थोडा गरम किस्म के इंसान है तो किसी दिन शाम को एक पत्थर अथवा कोई सख्त वस्तु हाथ में पकड़कर इंडिया टीवी चैनल लगाकर समाचार सुनने बैठ जाइए, आपका काम आसन हो जायेगा! अब मैं आपको अपना पेटदर्द वाली बात बताता हूँ ! शायद आप लोगो ने भी परसों यानी १७ सितम्बर की शाम को इंडिया टीवी पर लद्दाख में चीन से लगी अग्रिम पोजीशन पर भारतीय सेना की तैनाती की उनके(इंडियाटीवी) साहसिक कवरेज़ को देखा होगा , तो आपने भी नोट किया होगा कि इनके सवाददाता और एंकर बार-बार यह दोहरा रहे थे कि " भारतीय सैनिक चीनी सीमा पर ....."वैसे तो कमोवेश हमारे सभी खबरिया चैनलों का भी यही हाल है पर मैं इन लोगो से विनम्र निवेदन करूंगा कि आप बोलने से पहले अपने तथ्यों को ठीक कर लिया करे ! वह चीनी सीमा नहीं, वह भारतीय इलाका ...

सच बोलने का इनाम !

अभी-अभी नेट पर एक खबर पढ़ रहा था; Congress on Tharoor comment: Action at appropriate time Reacting to the controversy over Shashi Tharoor’s comment on Twitter, Congress spokesperson on Friday said, “Action will be taken at an appropriate time.” जाति तौर पर यह कौंग्रेस का अंदरूनी मामला है और वह इसे किस रूप में लेते है, उनका अपना अधिकार क्षेत्र है, अतः उस पर टीका-टिपण्णी करना मै उचित नहीं समझता! लेकिन लीक से हटकर कुछ बाते कहना चाहता हूँ ; मसलन कल परसों की ही तो बात है, जब कौंग्रेस ने जसवंत सिंह की किताब पर उन्हें बीजेपी द्बारा निष्काषित करने पर कहा था कि बीजेपी के अन्दर किसी नेता को अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता नहीं है ! और जब खुद की बारी आई तो >>>>>>>>>> ! दूसरी बात यह कि जब यह खबर आई थी तो शायद मै सबसे पहला व्यक्ति रहा हूँगा जिसने कि चिट्ठा जगत पर यह टिपण्णी दी थी कि मैं शशि थरूर की बात का समर्थन करता हूँ! उसका कारण यह नहीं था कि उन्होंने इकोनोमी क्लास में सफ़र करने वालो को मवेशी कहा, बल्कि वह इसलिए कि उन्होंने एक हकीकत वयां की, बस उनका अंदाजे बया थोडा बड़े ...

AUSTERITY (तपस्या): इन्हें कब से त्याग, तप की जरुरत महसूस होने लगी?

कल पाकिस्तान के एक प्रमुख दैनिक डॉन की वेब साईट पर उसके नई दिल्ली स्थित रिपोर्टर श्री जावेद नकवी का लेख पढ़ रहा था "Is India really a big nation, which behaves small? " यूँ तो आदतन पाकिस्तानी लेखको की न सिर्फ जुबान अपितु कलम भी पूर्वाग्रह में डूबी रहती है, मगर कुछ बाते जरूर उन्होंने काफी सटीक ढंग से लिखी है, और जो कुछ क्षण को सोचने पर मजबूर करती है! और जैसा कि हमारे मीडिया की जिम्मेदाराना (गैर शब्द नहीं लिखूंगा) हरकतों पर हर कोई उंगली उठाता है, तो उन्होंने भी उठाई है, और जमकर उठाई है! एक बात और जो सोचने पर मजबूर करती है, वह यह है कि जबसे इंडियन एक्सप्रेस ने सत्ता में बैठे इन नेताओं के पांच सितारा होटल-प्रेम का भंडा-फोड़ किया, तब से अपराधी का आपराधिक मन नए फंडे अपनाकर, अपनी छवि सुधारने और क्षति नियंत्रण में लगा है! और इसमें इनकी भरपूर मदद कर रहा है,, हमारा वह तथाकथित सेकुलर और चापलूस मीडिया! अभी ऐसे ही एक मीडिया की एक हेड लाइन पढ़ रहा था,, लिखा था (अग्रेजी हेडिंग थी उसे हिन्दी में अनुवाद कर लिख रहा हूँ) "ट्रेन पर हुए पथराव ने राहुल के सुरक्षा प्रबंधों की पोल खोली" ! अब...

झलकियाँ:

बाघा बॉर्डर: कल सुरेश चिपलूनकर जी का एक लेख पढा कि किस तरह पाकिस्तानी मीडिया हमारी उन बहनों को जो देश सेवा का जज्बा लेकर सेना और अर्द्धसैनिक बलों में भर्ती हुई है, उन्हें गालियाँ देता है! यूं ही ख्यालो में खोया, सोच रहा था कि हम हिन्दुस्तानी भी बड़े अजीब किस्म के प्राणि है! शान्ति-शान्ति करते हुए भी हमने तीन-तीन प्रत्यक्ष गुलामिया झेली ! परोक्ष गुलामी तो रोज ही झेलते है, क्योंकि गुलामी झेलना हमारे खून में है,मगर फिर भी सुधरने का नाम नहीं लेते! आप लोगो में से बहुतो ने बाघा बॉर्डर पर प्रत्यक्ष तौर पर जाकर और टेलीवीजन पर देखा होगा कि किस तरह शाम के वक्त सीमा पर किवाड़ खोलते वक्त दोनों देशो के जवान नौटंकी करते है ! मेरा कहना यह है कि क्या वाकई इस नौटंकी की जरुरत है, खासकर भारत के लिए? हम भारतीयों में इतना अहम् कब आयेगा कि हम अपने को उस दो कौडी के पाकिस्तान से ऊपर समझने लगे? क्या ही अच्छा होता कि वह किवाड़ सदा के लिए ही बंद कर दिया जाता! और जब कभी-कभार खोलने की जरुरत पड़ती भी, तो गेट खोलते वक्त खोलने वाला जवान गले से जोर से खंगारने के बाद मुह में आये थूक को सीमा के उस तरफ थू करके थूक देता!...

भैया की नौटंकी और बहिना का केक !

आप लोग भी कल से सभी संचार माध्यमो के जरिये एक खबर काफ़ी जोर-शोर से पढ, सुन और देख रहे होगें कि भैया जी ने बहिना को बिना बताये ही अपने उत्तम प्रदेश की “सरप्राइज विजिट “ कर दी और नेपाल से सटे एक गांव मे एक दलित महिला के घर रुके । बताया जाता है कि एक बूढी दलित महिला ने भैया के इस अचानक आगमन पर खूब आंसू भी बहाये । समझ मे नही आता कि भैया जी ने इस तरह की नौटंकी कर कौन सी नई बात कर दी ? आपको याद होगा कि ऐसी ही नौटंकिया भैया जी ने मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल मे भी बहुत बार की थी, नतीजा क्या निकला ? हां, अगर कुछ अन्होनी हो जाये, तो दो-चार पुलिस अधिकारियो और सुरक्षा कर्मियो के लिये ये मुसीबत जरूर खडी कर सकते है । कोई इनसे पूछे कि ऐसी नौटंकिया करके ये जनाव किसे बेवकूफ़ बना रहे है ? जब केन्द्र की सत्ता इनके और इनकी माता जी के इर्द-गिर्द घूम रही है, फिर क्या ये उन दलित महिलाओ को वह दाल जो वे ८० से १०० रुपये कीलो खरीद रहे है, उसके पुराने भाव २५-३०रुपये प्रति कीलो की दर से मुहैया करा सकते है? क्या ये उनके अकाल और भुखमरी को यह जनाव दूर कर सकते है ? जिस पैसे को बहिना ने मूर्तिया बनाने पर युं ही ज...

गरीब-गुरबों की भाषा का दिवस !

बडी खुशी की बात है कि आज हमारा देश ’राष्ट्र भाषा हिन्दी दिवस’ इस खास दिन पर मना रहा है । मगर वास्तविक तौर पर इस राष्ट्र भाषा की स्थिति क्या है, यह बताने की जरुरत नही। तारीफ़ करनी होगी उन अंग्रेजो की, जिन्होने न सिर्फ़ दुनिया को गुलामी की जंजीरो मे जकडा, अपितु हर एक इन्सान पर गुलामियत की एक ऐसी अनोखी छाप भी छोड दी जो, अब शायद मिटाये ना मिटे। उनकी वह भाषा अब सभ्य और अमीर कहलाने वाले लोगो की भाषा बन चुकी है। हमारे इस भारत देश मे ही देख लीजिये कि हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी आज एक गरीब-गुरबे की भाषा बन कर रह गई है। भाषा ने दिमागी तौर पर भी इन्सान-इन्सान मे अमीर-गरीब का एक ऐसा खासा अन्तर खडा कर दिया है कि यहां आपके मुख से निकले शुरुआती शब्द आपकी पह्चान और समाज मे आपकी हैसियत का माप-दण्ड बन जाते है। इसे एक उदाहरण के तौर पर इस तरह से देख सकते है कि मान लीजिये, आप देश के किसी अजनवी शहर मे जाते है, और एक होटल मे कमरा पूछने हेतु उसके स्वागत कक्ष मे पहुचकर कमरे और किराये के बारे मे जानकारी लेते है। अगर आपने अपना सुरुआती परिचय हिन्दी मे देकर पूछताछ की तो आप पायेंगे कि आपके साथ उस होटल के कर्मचारियों का...

मेरा पोता ! बडा होकर नेता बनेगा !!

रविवार का दिन, काफ़ी दिनो बाद जाके आसमान साफ़ हुआ । सुबह की भीनी-भीनी धूप और मुहल्ले के पार्क मे एक बेंच पर बैठे मिश्रा जी मिल गये । अपनी रिटायर्ड जिन्दगी की अपने नाती-पोतो के संग सुबह की सैर का मजा ही कुछ और होता है ! बच्चे खेलने मे व्यस्त थे, और मिश्रा जी लगे आज की राजनीति का दुख्डा रोने । देश मंदी की मार झेल रहा है, ये कहते है कि इनके पास साधनों की कमी है। एक तरफ़ हमारे जवान-जवान सैनिक पुराने पड चुके हथियारो से ही दुश्मन से लोहा लेने को मजबूर है, पाकिस्तानी सीमा पर आतकंवादियों से जुझने के लिये उनके पास अन्धेरे मे देख सकने वाले उपकरणों की भारी कमी है । दूसरी तरफ़ अगर किसी नेता का हैलीकौप्टर कहीं गुम हो जाये तो उसे ढूढने हेतु इनके पास सारे उपकरण उपलब्ध है । तीन दशको से पूर्व खरीदे गये लडाकू जहाजो को भी आज हमारे सैनिको को कफ़न सिर पर बाध कर उडाना पड रहा है । ये कहते है कि नये लडाकू जहाज खरीदने के लिये इनके पास धन उप्लब्ध नही है, दूसरी तरफ़ इनके मन्त्री एक-एक लाख रुपये रोज के किराये के कमरों मे महिनो से रह रहे है । जिन भूखे-नंगो ने कभी अपने घर मे पूरे पांव पसार कर सोने के लिये बिस्तर नही पाया...

अपराध से बडा गुनाह है अपराधी का बचाव !

अभी हाल ही मे दिल्ली मे आयोजित सी बी आई के अधिवेशन मे हमारे माननीय प्रधान मंत्री ने एक बहुत ऊंची बात कही थी कि जांच ऐजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई बडी मछली बचकर न निकले। लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयां कर रही है । पंढेर का हत्या के मामले मे उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय से साफ़ बच निकलना, एवम आरुषी हत्या कांड की उलझती गुत्थी, कश्मीर मे सोपियन कांड के अभियुक्तो की जमानत, इत्यादि-इत्यादि, इसी कडी का एक हिस्सा है । इस देश मे हर कोई अपनी मजबूरी जताने मे उस्ताद है। सरकार कानूनो का हवाला देकर अपनी मजबूरी जताती है, सुरक्षा और जांच से जुडी ऐजेंसिया राजनैतिक हस्त:क्षेप की बात करते है तो अन्धी न्याय व्यवस्था, अप्रयाप्त सबूतो का रोना रोकर अपने दामन को पाक-साफ़ दिखाने मे कोई कसर बाकी नही छोडती । सवाल यह नही कि किसकी क्या मजबूरी है, सवाल यह है कि क्या पीडित को इसी तरह का न्याय इस देश मे मिलेगा ? यहा अगर कुछ भी हो जाये, हमारी ये सरकारें तो बस, लोगो की आखों मे धूल झोंकने हेतु तुरंत जांच ऐजेंसियो का गठन कर देती है । लेकिन उन जांचो का परिणाम क्या निकलता है, यह हम सभी लोग बखूबी जानते है । खूब...

दादा भाई बनने की राह !

यूँ ही विचार मग्न था कि अपने एक गुरूजी याद आ गए ! कालेज के दिनों की बात है, हमारी क्लास में कोई भी छात्रा नहीं थी! हमारे एक मराठी गुरूजी थे, डॉक्टर जोशी, बहुत ही मिलनसार किस्म के इन्सान, एक ऐसा इंसान जो बहुत से गुरुओ के बीच कैम्पस में अपनी एक अलग छबि बनाने में कामयाब थे ! हमारी क्लास के किसी विद्यार्थी को कैम्पस ग्राउंड में किसी छात्रा के साथ घूमते देख लेते तो क्लास में आकर पूछते , "क्यों बेटा, दादा भाई नारोजी बनने की राह पर हो क्या" ? शुरू में तो हमने गुरूजी का यह डायलोग हल्के में ही लिया, मगर जब थोडा समझदार हुए तो अड़ गए कि पहले अपने इस डायलोग का राज बतावो फिर हम तबियत से क्लास में पढेंगे ! मजबूर होकर, न चाहते हुए भी उन्हें अपने डायलोग का राज खोलना पडा था! पूरी क्लास वह गूढ़ राज सुनने के लिए सांस रोके बैठी थी! वे बोले, 'दादा' का मतलब तो आप लोग जानते ही हो, यानी 'बड़ा भाई' ! भाई का मतलब भाई, और मराठी में पति को 'नौरो' बोलते है! तो इसका मतलब यह हुआ कि कहीं घूमते हुए जब कोई लडकी को उसके जानने वाला कोई मिल जाए तो वो कहती है " ये मेरे दादा है " , ...

लघुकथा- कमीना शेर !

अभी शादी हुए मात्र चार ही साल तो हुए थे! बहुत खुश रहती थी ऋचा अपने उस भरे पूरे परिवार के साथ ! पति के साथ ही उसी दफ्तर में नौकरी करती थी! बेटा जब तीन महीने का था, दोनों बेफिक्र हो उसे उसके दादा- दादी के पास छोड़ उसी बाइक में सवार हो ऑफिस आते-जाते, जो ऋचा को उसके मामा ने शादी पर उपहार में दी थी! ऋचा के जेठ-जेठानी भी दोनों बैक मैं नौकरी करते थे, घर में हर तरफ खुशहाली थी! मगर अचानक एक दिन न जाने उनकी खुशहाली को किसकी नजर लग गई ! ऋचा फिर एक बार उम्मीद से थी, और तबियत ढीली होने की वजह से उस दिन छुट्टी कर गई थी ! दीपक सुबह अकेले ही ऑफिस गया था! और शाम को लौटते वक्त ब्लू लाइन बस रूपी काल का ग्रास बन गया! अशक्त ऋचा बहुत तड़पी! बार-बार सिर पीटकर किस्मत को यही कोसती रही कि मैं क्यों नहीं आज दीपक संग दफ्तर गई ! खैर, समय बलवान होता है, और उसके समक्ष सभी को झुकना पड़ता है! कुछ दिनों के रोने पीटने के बाद घर के हालात कुछ सामान्य तो हुए, मगर अमूमन जैसा कि देखने में आता है, हवाए अब बदली-बदली सी थी!सास-ससुर और घर के अन्य सदस्यों का बर्ताव एकदम अलग था, ऋचा के साथ ! तंग आकार ऋचा उस घर को सदा के लिए छोड़, पित...

हमारे बस का है क्या ?

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शुरुआत एक जोक से करता हूँ; हो सकता है यह मशहूर जोक आपने पहले कई बार सुना हो, चलो एक बार और सुन लीजिये ! हुआ यूं कि वाशिंगटन डी.सी. की 'बाउंड्री वाल' टूट गई ! टेंडर निकला, कोटेसन मगाए गए ! जैसा कि आजकल यूरोप और अम्रेरिकी महादीप में एक गलतफमी पसरी पडी है कि भारत और चीन इस दुनिया की नई आर्थिक शक्तियाँ बन कर तेजी से उभर रही है, तो गलतफमी का नाजायज फायदा उठाने में इन तथाकथित दोनों नई आर्थिक शक्तियों के लोग भी माहिर है! दोनों फटाफट पहुचे टेंडर भरने ! सीनियरटी के हिसाब से पहले चीन वाले ने भरा ७०० डालर, टेंडरिंग अथॉरिटी ने पूछा ७०० डॉलर कैसे ? चीनी बोला, ३०० डॉलर का मटीरिअल, ३०० डॉलर का लेबर, और १०० डालर मेरा प्रोफिट ! और अब इंडिया वाले ने अपना टेंडर कोटेसन सबमिट किया! उसने भरा २७०० डॉलर ! टेंडरिंग अथॉरिटी ने पूछा २७०० डॉलर कैसे? वह बोला, यार, १००० डालर तेरे, हजार मेरे, और काम ७०० डॉलर में इस चीनी से करवा लेंगे, "मेड इन चाइना" !!!!! :-))) ये तो महज एक जोक था, मगर अफ़सोस कि हकीकत भी इससे बहुत भिन्न नहीं है ! हम जितनी मर्जी डींगे हांक ले, लेकिन अन्ततोगत्वा प्रश्न वही बना रहता है...

बेदर्दी तू तो अंबर से है !

रैन गगन से जब-जब , निर्मोही घन बरसे है, विरहा का व्याकुल मन, पिया मिलन को तरसे है। सूखा जगत तनिक रहे भी तो क्या नीरद, तू न जाने दुख विरहा का, बेदर्दी, तू अंबर से है। विराग दंश सहते जब तेरा मन भर आता है , गरज-घुमडके नयन नीर , यत्र-तत्र बिखरा जाता है। देख उसे  थामे जो अंसुअन, ममत्व निभाती घर से है, तू न जाने दुख विरहा का, बेदर्दी, तू अंबर से है। 

मुझे पालने वाले सब मर गए !

बस यूँ ही परछाइयों में से इंसान ढूंढ लाने को दिल करता है, पत्थर फ़ेंक कोई शीशे का मकान तोड़ जाने को दिल करता है ! सन्नाटों की चादर ओढे, कब्रों में सोये है जो मुदत्तो से बेफिक्र, कभी-कभी न जाने क्यों फिर से उन्हें जगाने को दिल करता है ! आज कुछ भडांस निकालने का दिल कर रहा है ! कहाँ से शुरू करू ? चलो पहले मूर्ख लोगो से ही शुरुआत की जाए ! एक खबर पढ़ रहा था कि अपने मुख्यमंत्री के गम में १२२ से अधिक लोग आंध्रा में मर गए ! निहायत बेवकूफ लोग है ! जिन्हें अपने जीवन की ही कीमत मालूम नहीं, उनसे सहानुभूति जताना भी मुर्खता है ! इन्हें कौन समझाए कि यहाँ हर कोई अपने कर्मो की गति मरता है, आखिर इतने सारे सत्यम और मेटास के निवेशको की 'हाय' का असर कही तो होगा! बस कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते है! फसलो को नुकशान की वजह से किसानो द्बारा आत्महत्या तो सिर्फ एक उम्दा बहाना मात्र है, इन्हें तो बस आत्महत्या करनी है ! क्या पता जानबूझकर फसल को इस तरह बोते होंगे कि वो ठीक से उगे ही ना, और इन्हें मौका मिल जाए ! साथ ही एक सलाह अपने नेताओ को भी दूंगा कि Hire a good chopper pilot otherwise an incompetent pilot can...

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है; कि एक निर्दोष अपने इस भारत देश में, बेवजह दस साल जेल में गुजार जाता है ! आगे इस बेशर्मी का आलम यह है कि, बदले में भरपाई सिर्फ सौ हजार पाता है ! और दोषी जो अरबो खा जाए चारे संग, वह नाम अपना सत्ता में शुमार पाता है ! कल शायद आपने भी इस खबर पर गौर किया होगा; MUMBAI: In an important judgment, the Bombay high court on Tuesday ordered the Maharashtra government to pay Rs 1 lakh as compensation to a 40-year-old man who languished in prison for over 10 years for a crime he did not commit. Malegaon resident Bapu Mali was in jail for five years as an undertrial, battling rape and murder charges. Even after being acquitted by the trial court, Mali had to spend five more years in prison as he could not shell out the bail amount when his case went into appeal. "This is a sorry state of affairs,'' a division bench of Justice Bilal Nazki and Justice A R Joshi said, while upholding the trial court order acquitting Mali. "Not only the prosecuting age...