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Showing posts from September, 2011

बेटी !

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जब उमंगो  के आंचल ने , चाहत की पोटली समेटी, तो आसमां से उतर कर , घर आई हमारे,हमारी बेटी। याद है  हमें भी वो वक्त, जब पल-पल बुने थे हमने, सलाइयों से किरमिच पर  कुछ  ख्वाब रंगीन,श्वेत-सलेटी। सब्र की मेंड क्या होती है, तब जाना,नजर आई जब, वह नन्ही-नवजात कोंपल, अंगोछे-तौलिये मे लपेटी। कम पडते शब्द बयां करने को , मन की वह मधुर अनुभूति, बिछोने से टुकुर-टुकुर, देखती थी जब  वो लेटी-लेटी। बडी होकर खुद का घर बसाने, घर पराये चली जायेगी , छोडकर यादें और चंद अपने  बचपन के खिलोनों से भरी पेटी।।

मानसिकता का सवाल !

बार-बार यह दोहराना तो शायद अनुचित होगा कि हमारा यह प्यारा देश भारत, अपनी सदियों पुरानी एक समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का साक्षी होने के बावजूद अनेकों घटिया किस्म की प्रजातियों से भी भरा पड़ा है! जिसमे से कुछेक ने तो इसे मात्र एक धर्मशाला से अधिक कभी समझा ही नहीं! और ऊपर से यह तर्क भी कि चूँकि हम इस धर्मशाला में ठहरे हुए है, अत: हमारा यह हक़ भी बनता है कि हम इसे लूटें भी ! इस देश की यह समृद्ध परम्परा रही थी कि वीर योद्धा न तो सूर्यास्त के बाद औरे न ही पीछे से अपने प्रतिद्वंदी पर हमला करते थे ! लेकिन इस देश से नैतिकता और मर्यादा को इन अकृतज्ञ लुटेरों के अकृतज्ञ परदादाओं और इनकी परदादियों की इज्जत लूटने वाले विदेशी आक्रमणकारी लूटेरों ने आठवी शताब्दी की शुरुआत में तभी ख़त्म कर दिया था, जब अनाचार के बल पर सूर्यास्त के बाद भी छुपकर हमला कर उन्होने इस देश पर कब्जा कर इसे लूटना शुरू किया था! उसके बाद तो जो गुलामी और नसों में गुलाम रक्त के संचार का दौर चला, वह आज तक भी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा! इस बीमारी ने इन्हें अन्दर तक इसकदर खोखला कर दिया है कि हम अच्छे और बुरे की पहचान ही भ...

तिरुमाला-गडवाल !

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इसे मैं अपना सौभाग्य ही कहूँगा कि जब कभी भी  मुझे दक्षिण भारत मुख्यत: आंध्र-प्रदेश घूमने का अवसर मिला, हर बार नई-नई बातों की जानकारी हासिल हुई! मूलरूप से उत्तराँचल के गढ़वाल का होने की वजह से यदा-कदा जब हैदराबाद, खासकर सिकंदराबाद के बाजारों  में जाना होता था तो कपडे की दुकानों पर अकसर एक खास जगह जाकर मेरी नजर रुक जाती, जहां लिखा होता था; 'तिरुमाला गडवाल हेंडलूम जरी साड़ियाँ' ! मैं अक्सर सोचा करता कि हमारे गढ़वाल में तो मैंने अपना पूरा बचपन गुजारा,  मगर कभी हैंडलूम की बनी गडवाल जरी साड़ी का नाम नहीं सुना, फिर यहाँ कहा से ये इस नाम की साडियां आ गई ? फिर खुद ही इस तरह अपने दिल को तसल्ली देता कि हो सकता है जिस तरह उत्तर भारत में लोग अपने पनीर को 'गढ़वाल पनीर' का  नाम देकर बेचते है, ठीक उसी तरह ये लोग भी शायद यहाँ अपनी साडियों को गडवाल जरी साड़ी का नाम देकर बेचते हों ! मगर आखिरकार जब वक्त आया तो मुझे तिरुमाला-गडवाल का रहस्य पता चल ही गया और यहाँ मैं संक्षेप में आज उसी पर थोडा प्रकाश डालने जा रहा हूँ !      तिरुपतिजी  महाराज हालांकि यूँ ...