बेटी !
जब उमंगो के आंचल ने , चाहत की पोटली समेटी, तो आसमां से उतर कर , घर आई हमारे,हमारी बेटी। याद है हमें भी वो वक्त, जब पल-पल बुने थे हमने, सलाइयों से किरमिच पर कुछ ख्वाब रंगीन,श्वेत-सलेटी। सब्र की मेंड क्या होती है, तब जाना,नजर आई जब, वह नन्ही-नवजात कोंपल, अंगोछे-तौलिये मे लपेटी। कम पडते शब्द बयां करने को , मन की वह मधुर अनुभूति, बिछोने से टुकुर-टुकुर, देखती थी जब वो लेटी-लेटी। बडी होकर खुद का घर बसाने, घर पराये चली जायेगी , छोडकर यादें और चंद अपने बचपन के खिलोनों से भरी पेटी।।