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Showing posts from January, 2010

मिथ्या ही मान लो कि भगवान सब देखता है पर .. !

और यह रही मेरी पहली टिप्पणी अलग से मेरे ही पिछले लेख पर : आज जो हम लोग आम जीवन मे मानवीय मुल्यों का इतना ह्रास देख रहे है, उसकी एक खास वजह यह भी है कि हमारे धर्मो द्वारा निर्धारित जीवन के मुल्यों का कुछ स्वार्थी और तुच्छ लोगो द्वारा अपने क्षणिक स्वार्थो के लिये इनकी अनदेखी करना, इनका उपहास उडाना, खुद को इन मुल्यों से उपर बताना, इत्यादि । इसे मैं इस उदाहरण से समझाता हूं; मान लीजिये आपके आस-पास कहीं चोरी हो गई और आप पति-पत्नी घर पर बच्चो संग उसी विषय पर चर्चा कर रहे है, तो आपके चर्चा के दो नजरिये हो सकते है। एक यह कि चोरी करना बुरी बात है, और चोर को इसका फल जरूर मिलेगा । दूसरा नजरिया यह कि अरे भाई, उसको जरुरत थी तभी तो उसने चोरी की, अगर उसका भी पेट भरा हुआ हो तो भला वह चोरी करने ही क्यो जायेगा?( इस नजरिये को मानने वाले भी तभी तक उसे मान्यता देते है जब तक वह चोर दूसरों के घर मे चोरी कर रहा होता है ,उनके घर मे नही) आप इसमे से पहले नजरिये को धार्मिक अथवा आजकल की भाषा मे साम्प्रदायिक नजरिया कह सकते है और दूसरे नजरिये को सेक्युलर नजरिया, मगर साथ ही यह भी गहन विचार कीजिये कि आपकी इस चर्चा को ...

लो जी, दादा-नाना का गोत्र भी स्वीडन मे पेटेंट हो गया !

आज इस दुनियां मे मौजूद हर धर्म का उद्देश्य उसे मानने वाले अनुयायियों को उनके द्वारा जीवन को जीने के अपने एक खास नजरिये के प्रति प्रेरित और सजग करना होता है। हर धर्म की जहां अपनी कुछ खास विषेशतायें होती है,वही कुछ कमियां भी है। और अक्सर देखा गया है कि यहां, हमेशा ही किसी एक धर्म की दूसरे धर्म के अनुयायियों द्वारा तरह-तरह की आलोचना की जाती रही है। लेकिन शायद इस दुनिया मे हिन्दु धर्म ही एक मात्र ऐसा धर्म है जो कि न सिर्फ़ दुनियां का सबसे पुराना धर्म है अपितु इस धर्म को, इस धर्म के ही मानने वाले तथाकथित सेक्युलरों ने समय-समय पर प्रताडित किया है। जबकि देखा जाये तो अब तक इस धर्म की अनेक मान्यताओं को भले ही परोक्ष तौर पर ही सही, मगर दुनिया के अन्य हिस्सों मे मौजूद दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी मान्यता दी है। यह तो आप सभी जानते है कि पूर्व मे दुनियां भर के वैज्ञानिकों ने बहुत सी ऐसी चीजों की खोज की, अनेक ऐसी बातों को अपने अलग तौर पर प्रमाणिक सिद्ध किया, जिन्हे कि हिन्दु धर्म ग्रंथ और विद्वान आदिकाल मे ही जीवन-शैली मे सम्मिलित कर चुके थे। भले ही आज की पाश्चात्यपरस्त हमारी युवा शिक्षित पीढी बात-...

इक्कीसवीं सदी का हमारा शहरी युवा वर्ग !

आज हमारे देश के शहरी इलाके ज्यों-ज्यों तथाकथित प्रगति की ओर अग्रसर है, त्यों-त्यों इन शहरी इलाकों के वाशिन्दे नित शाररिक तौर पर क्षीणता की गर्त मे डूबे जा रहे है। इसके लिये जिम्मेदार बहुत सारे प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण विध्यमान है, जिनमे से कुछ प्रमुख है, भोग और विलासिता की वस्तुए, मनोंरजन के साधन, शहर, कस्बे और मुहल्ले मे खेलने-कूदने के लिये उचित और प्रयाप्त जगहों का न होना, बच्चे का अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होना, माता-पिता की लापरवाही और सरकारों की इस ओर उदासीनता । और कम से कम मोदी नगर के एक स्कूल मे कल की यह घटना तो यही सिद्ध करती है कि हमारी युवा पीढी शारिरिक तौर पर कितनी कमजोर है। कल मोदी नगर के टी आर एम पब्लिक स्कूल के १८ वर्षीय बारह्वीं कक्षा के एक छात्र पवनेश पंवार की शारिरिक व्यायाम की परिक्षा के दौरान चक्कर आने से दुखद मृत्यु हो गई। घटना के बाद विधार्थी का परिवार, प्रशासन और खबरिया माध्यम जितना मर्जी हो-हल्ला मचायें, स्कूल प्रशासन को जिम्मेदार ठहरायें, लेकिन हकीकत यही है कि बाहर से लम्बे-चौडे, हष्ठ-पुष्ठ दिखने वाले ये आज के मदर डेयरी और चौकलेट पोषित युवा अन्दर से कितने...

भला मानुष !

भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका, सच कहने की ऐसी मुई आदत थी कि झूठ के जज्बातों में न बह सका। वह जो यथार्थ से यहां बहुत दूर था, वही सुनने को जमाने को मंजूर था, कृत्रिम वादे ही दिलों को भिगोते है, मुंए सच तो सारे ही कडवे होते है। सत्य,साथ तजने को रजामंद न था, जभी मिथ्या को न संग सह सका, भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका। सैलाब जब दिल के समंदर का बहा, बस, जुबाँ ने जो सच था वही कहा , फरेबियों के हाथों मैं जब-जब लुटा , तब मानस पटल पे ये तूफान उठा। उजड़ गया सब कुछ ही 'अंधड़' में, मगर कटु मेरा जमीर न ढह सका, भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका।  

जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !

हालत पर मेरी न दिल उनका पसीजा , न ही बेसब्र किया उनको व्यग्रकाल ने, संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर, जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   शरद में थी ठिठुरी वो यादों की गठरी , ग्रीष्म में जलाया उसे तपस ज्वाल ने, संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   उन्हें झुरमुटों में मन के छुपाये रखा , जो उगले उनके मुँह की लय-ताल ने , संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   मुग्ध हुआ था मैं कभी खुश्बुओ पर, मुझे भी परेशां किया था कली काल ने ,  संजोए रखे है तभी वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।  

पप्पू कांट डांस साला !

पता नहीं हम हिन्दुस्तानी कब सुधरेंगे , सुधरेंगे भी या नहीं, कोई नहीं जानता ! क्योंकि अगर हममे सुधरने की गुंजाईश होती तो सातवी सदी से दसवी-ग्यारहवी सदी तक , जब सिकंदर, मंगोलों-मुगलों ने हमारे देश पर आक्रमण किया और छद्म तरीके अपनाकर जैचंदो से मदद ली, इस देश में मौजूद तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को हारने के लिए, तो अगर हममे गैरत और अक्ल होती तो हमें तभी संभल जाना चाहिए था ! तब नहीं संभले थे तो जब बाबर ने आक्रमण किया तब संभल जाते, तब भी नहीं संभले थे तो जब सोलहवी- सत्रहवी सदी में ईस्ट-इंडिया कंपनी आई थी तभी संभल जाते! तब भी नहीं संभले थे तो १९४७ में जब देश का विभाजन हुआ, तभी संभल जाते! लेकिन नहीं, हमारे पास इतना सोचने के लिए वक्त कहाँ था? देश में जो ज्वलंत मुद्दे है , महंगाई , बेरोजगारी, दरिद्रता और सबसे ऊपर नेतावो और नौकरशाहों का नित बढ़ता भ्रष्टाचार, उसके बारे में हम लोग शायद एक साथ मिलकर इतना उछलते तो क्या पता हमारी बेशर्म सरकारों को कुछ शर्म आ जाती ! आज सड़क चलते आपकी-हमारी जान हर वक्त खतरे में है, माँ-बहनों की आबरू खतरे में है, लेकिन सरकार के पास हमें सुरक्षा देने के लिए प्रयाप्त साधन नहीं ...

सभी मित्रो को गणतंत्र-दिवस की मंगलमय कामना !

हर नागरिक का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने देश और उसके संविधान का सम्मान करे ! लेकिन यह कितनी अजीब बात है कि जिस संविधान निर्माता को अपना आदर्श बताकर कुछ लोग, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को प्राप्त करने के ख्वाब देखते है, वही लोग उसी संविधान निर्माता द्वारा बनाए गए संविधान को आज अपने ठेंगे पर रखे है! खैर, सभी मित्रो को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना !

बुर्के में ही रहना है तो बेहतर है वोट मत दो - सुप्रीम कोर्ट

आइये, आज हम सब मिलकर अपने सर्वोच्च न्यायालय की इस बात के लिए जम कर तारीफ़ करे कि उन्होंने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया ! और आगे संकल्प ले कि इन पाषाण युगीन मानसिकता के लोगो को इसी तरह के सबक सिखा कर देश की मुख्य धारा में लाने के प्रयत्न करेंगे ! इन्हें जिस देश में ये रहते है, उस देश के कायदे कानूनों को मानना और उनका अनुसरण करना होगा ! कितनी हास्यास्पद बात है कि एक तरफ तो ये पाषाण युगीन मानसिकता के लोग अपने को गरीब, महंगाई का मारा हुआ, बहुसंख्यको द्वारा दबाया हुआ, कुचला हुआ और न जाने क्या क्या बताता है, और दूसरी तरफ इस तरह के कानूनी दावपेंच और देश के संविधान का मखौल उड़ाने के लिए इसके पास भरपूर पैसा और वक्त है! इस देश को अगर एकजुट रखना है तो फ्रांस की तर्ज पर कुछ ठोस कदम उठाने की आज सख्त जरुरत है ! आइये देखे कि क्या था यह विवाद और क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने ; सुप्रीम कोर्ट ने कड़े तैवर अपनाते हुए कहा है कि जो मुस्लिम महिलाएँ मतदाता पहचान पत्र के लिए फोटो नही खिंचवाना चाहती या फिर बुर्के में फोटो खिंचवाना चाहती है वह बेहतर है कि वोट ही ना दे! तमिलनाडु के याचिकाकर्ता एम आजम खान ने अपील की थी कि मु...

एक देश के अन्दर, कई देश हैं !

बिके हुए न अगर यहाँ    , खादी, सफ़ेद- उजले परिवेश होते, तो आज भला क्यों  फिर, एक ही देश के अन्दर कई देश  होते।   सभ्यता-संस्कृति न सिकुड़ती , दूर-दराज  के गाँव-द्वारे तक, देश-प्रेम भावना न सिमटती, 'विविधता में एकता' के नारे तक।   कुटिल राजनीति के    भेद-भाव     , न देते नित नये ठेस होते,  और क्यों भला फिर आज , एक ही देश के अन्दर कई देश  होते।  रग-रग में पसरा  न , लम्बी गुलामियत का खून  होता , और न ही देश -गद्दारी का, जयचन्दो    के सिर चढ़ा जूनून होता।   मेहनत से संजो के रखे हमने  , न ही अंग्रेज- मुग़लो  के अवशेष होते, तो  क्यों भला फिर आज , एक ही देश के अन्दर कई देश  होते। 

कॉमन

अब समझा   कि  क्यों , नर-पिचाश   इंसानो  को   खुद  ऊपर उठाने के लिए इतना  "Mad" है ? क्योंकि दोनों  का   अपना -अपना Hydra* - "Bad" है। Hydra=क्रेन Hyderabad

एक ख्याल ;

कितनी अजीब सी बात है कि एक तरफ जो इंसान भगवान् के अस्तित्व को सिरे से नकारता है, और उसकी शरण स्वीकार नहीं करता, दूसरी तरफ अमूमन वही इंसान अपने स्वार्थ के लिए दूसरे इंसान की गुलामी करने से जरा भी परहेज नहीं करता ! -पी.सी. गोदियाल

आज का जोक- ए.टी.एम् मशीन !

हम हिन्दुस्तानियों के लिए शायद यह खबर बहुत मामूली सी थी , इसलिए किसी ने इसे तबज्जो देना तो दूर, इस पर गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा ! और खबर यह थी कि देश की राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा में अपने देश के कुछ भूखे-नंगे, आई-सी-आई-सी-आई बैंक की ए.टी.एम् मशीन ही ले उड़े, जिसके अन्दर बताया जाता है कि ३२ लाख का कैश था ! हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा..... हैं न जोक मजेदार ! मुझे हंसी उन भूखे-नंगो पर नहीं, वरन बहनजी और मौन सिंह जी के सुशासन पर आ रही है ! मेरा भारत महान !

हमारे खबरिया चैनल !

आपको भी नही लगता कि ये हमारे खबरिया चैनल दिशाहीनता का शिकार हो गए है! समाचार देने से पहले ये यह नहीं सोचते कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पडेगा ! आजकल जिस तरह से ये महाराष्ट्रा और देश के अन्य हिस्सों में कुछ छात्र-छात्रों द्वारा की गयी आत्महत्या की खबरों को बार-बार और बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे है, उसके लिए पढाई के बोझ को टारगेट बना रहे है, वह न सिर्फ निंदनीय है अपितु उससे युवा वर्ग के मस्तिष्क पर एक गहरा दुष्प्रभाव पड़ रहा है! और ऐसा लगता है कि ऐसी खबरे बार-बार, बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने से, उन्हें इसके लिए मानो उकसाया जा रहा हो! अत जनहित में लोगो से यही निवेदन करूंगा कि बच्चो के समक्ष खबरिया चैनलों को देखने से बचे !समाचारों का क्या स्तर होना चाहिए, उसके प्रचार से पहले यह जानना कि देश और जनता पर उसके क्या प्रभाव पड़ सकते है उसका आंकलन करने की किसी के पास भी कोई फुरसत नहीं है ! क्या यही चौथे खम्बे की स्वतंत्रता के मायने है ?इसके लिए सरकार कोई उपाय करेगी, मुझे तो नहीं लगता है !

झोई-भात !

पिंटी और कृतिका की शादी को हुए अब तकरीबन तीन साल बीत चुके थे। उनके एक सालभर का बेटा भी था। दोनों के अगाध प्रेम, आपसी समझ-विश्वास और तालमेल का ही नतीजा था कि इन तीन सालो में एक बार भी दोनों में कभी ज़रा सी भी आपसी कहासुनी नहीं हुई थी। यूं तो दोनों ही ठंडे दीमाग वाले और बहुत सी चीजो में एक जैसी पसंद रखने वाले थे, और इस बात पर पिंटी बार-बार वह मुहावरा दुहराता भी रहता था कि 'राम मिलाये जोड़ी,एक अन्धा एक कोढ़ी', मगर दोनों के स्वाभाव में इतनी समानता होने के बावजूद भी दोनों ने ही एक-दूसरे से पहले ही यह स्पष्ट कर रखा था कि अगर कभी दोनों में से कोई एक भी गुस्से में हो तो दूसरा जुबान नहीं खोलेगा। बस, यही उनके सफल वैवाहिक जीवन का मूल-मन्त्र था । पिंटी को छोटी-छोटी बातो को भूलने की एक बीमारी सी थी । कभी ऑफिस जाने से पहले शेव करना भूल जाता तो कभी दन्त-मंजन करना । और हद तो तब हो जाती, जब कृतिका का उसके ऑफिस के लिए सजाया हुआ लंच बॉक्स वह टेबल पर ही भूल जाता । आज मकर संक्रांति और पोंगल की छुट्टी थी, मगर वह यह भी भूल गया और रोज की भांति सुबह-सबेरे बाथरूम में घुसकर नहा धो लिया, और जब बाथरूम से बाह...

अगर संविधान में ऐसा प्रावधान हो जाए तो....?

इस महान लोकतंत्र के सभी जागरूक मतदाता यह तो जानते ही होंगे कि अपने मत का प्रयोग कर, हम लोग इस देश की सत्ता का हकदार और अपना भाग्य विधाता चुनते है ! जो चुनकर जाता है वह जनता का प्रतिनिधि, जनता की आवाज , जनता का सेवक और पता नहीं क्या-क्या होता है! लेकिन अगर जनता का नुमाइंदा रहने के दौरान या फिर चुने जाने से पहले किसी आपराधिक मामले जैसे कि ह्त्या, लूट, चोरी, भ्रष्टाचार इत्यादि मामलो में, किसी न्यायलय द्वारा उसे दोषी करार दिया जाता है, और फांसी की सजा सुनाई जाती है, तो चूँकि वह किसी ख़ास इलाके की जनता द्वारा अपना प्रतिनिधि चुना गया है, अत: जो सजा उसे मिली हो, वह उन मतदाताओं को भी दी जाए जिन्होंने उसे वोट देकर जिताया, क्योंकि वह तो हर वक्त यही कह रहा होता है कि वह इस देश की जनता का प्रतिनिधि है!जब प्रतिनिधि की आवाज को जनता की आवाज तथा प्रतिनिधि की मांग जनता की मांग मानी जाती है तो प्रतिनिधि के कृत्य जनता के कृत्य क्यों नहीं माने जा सकते ? उन मतदाताओं की पहचान करने के लिए जिन्होंने उसे वोट दिया, मतदान मशीनों पर कम्प्युटरीकृत तरीके से वोटरों की पहचान सुरक्षित रखी जा सकती है! तब कितना मजा आयेग...

आपके दिमाग की प्रोग्रामिंग ही गड़बड़ हो तो ...?

आप में से बहुत से लोग इस बारे में पहले से ही जानते होंगे, मगर जो इस बारे में सचमुच में नहीं जानते, उनसे मेरा आग्रह है कि यह करके देखिये आपको पता चल जाएगा ; अभी आप टेबल के समीप कुर्सी पर बैठ अपने कंप्यूटर पर चटर-पटर कर रहे हैं न ? अब ज़रा अपनी कुर्सी को बैठे-बैठे टेबल से थोड़ा दूर खिसकाइए ! कुर्सी अथवा स्टूल पर बैठे-बैठे अपने दाहिने पैर को थोड़ा ऊपर हवा में उठाइये, अब उसे घड़ी की दिशा में गोल-गोल घुमाइए (CLOCKWISE CIRCLES) ! ऐसा करते रहिये और साथ ही दाहिने हाथ की उंगली से हवा में बार बार सिक्स(6) बनाइये ! अब देखिये कि आपका दिमाग आपके घड़ी की दिशा में गोल-गोल घूमते पैर के निर्देशों को सही तरीके से FOLLOW कर रहा है अथवा नहीं ! आप ज़रा यह करके तो देखिये, पता चल जाएगा...............हैं न प्रोग्राम्मिंग में गड़बड़ी ? :) )

क्या ख़ाक गंभीर लेखन-चिंतन करे ?

रातोरात अमीर बन जाने के लिए "मधु कोड़ा" प्रजाति के तमाम सफ़ेद पोश देश को बेच डालने की फिराक में है! आरक्षण और डोनेशन की कृपा से पैदा हुए इंजिनीयर ऐसे ढांचागत निर्माण खड़े कर रहे है जो बनने से पहले ही टूट जा रहे है! सड़के है नहीं और देश में नित नयी कार के मॉडल आ रहे है, घर में खाने को भले ही आटा न हो, सड़क पर चलने की जगह न मिले, लेकिन लोग घर बाहर लोन लेकर कार जरूर खडी कर रहे है! हर तरफ कुशासन, अराजकता, बेरोजगारी, महंगाई , भुखमरी, भ्रष्टाचार और ऊपर से घटती कृषी योग्य भूमि और तेजी से फैलता कंक्रीट के जंगलो का सैलाब ! किसी की कोई जबाबदेही नहीं, सब कुछ छिन्न-भिन्न! कृषि  योग्य भूमि और खाद्यान उत्पादन निरंतर घट रहा है, बढ़ती जनसंख्या जब महंगाई से त्रस्त होकर अपनी आवाज उठाने की कोशिश करती है तो बार-बार १०% विकास दर का झुनझुना देश के प्रधानमंत्री जी लोगो के कानो में बजा डालते है ! मगर देश की यह दुर्दशा क्यों हो रही है कोई देखने वाला नहीं ! अपने देश में कारखानों को बिजली नहीं मिलती, इसलिए देश नित विदेशी सामान पर निर्भर होता जा रहा है! जहाँ देश में खाद्यान्न "आत्म निर्भरता" का श्...

समझदार पत्नी !

एक बार एक पहाडी गाँव के नए-नए बने एक गरीब प्रधान जी के घर पर मेहमान को कुछ देर ठहरने का सौभाग्य मिला तो उनकी धर्म- पत्नी की बुद्धिमता की प्रशंसा किये बगैर नहीं रह सका ! आइये आपको भी सुनाते है ! प्रधान जी को चावल का गरम-गरम मांड पीने का शौक था! उनकी धर्मपत्नी ने चावल अभी चूल्हे में रखे ही थे कि हम यानी मेहमान टपक गए ! बाहर प्रधान जी मेहमानों के साथ गपो में व्यस्त थे ! उनकी पत्नी ने उबलते चावलों में से मांड निकाल कर एक गिलास में उनके लिए रख दिया था! लेकिन अब प्रश्न प्रधान जी की नाक का था कि कहीं मेहमानों के सामने मांड उन्हें पीने को देकर नाक न कट जाए ! लेकिन मांड भी ठंडा हो रहा था, ठन्डे मांड से प्रधान जी भी उस पर गुस्सा कर देंगे! अब क्या करे? अत: कुछ देर इन्तजार करने के बाद अन्दर किचन से उसने जोर से गाने के से अंदाज में बोला " धान सिंह का बेटा मांड सिंह , पीना है तो आओ नहीं तो शीतलपुर को जाता है" ! बस प्रधान जी समझ गए, और "आप बैठिये मैं अभी आया" कहकर मांड पीने चले गए !

बिल्डिंग रिलेशनशिप्स !

आज भोर पर जब  मैं घर से बाहर आया , तो देखा कि  चहु ओर घना कुहरा  है छाया ! तभी मुझे नजर आया   गली में सामने से पड़ोसी मिश्रा जी  इधर से उधर आ रहे थे, अपनी बिल्डिंग  से पड़ोसन की बिल्डिंग  को  लाल धागे से  बार-बार बांधे जा रहे थे ! कौतुहलबश  मैंने भी हिला दिए अपने लिप्स ! जबाब में वे बोले कि  उनके राशिफल में लिखा है; "दिस इज अ गुड डे फॉर बिल्डिंग रिलेशनशिप्स" !!.

मिक्स्ड राशिफल !

लेखन का कतई मूड तो नहीं था, किन्तु कल के अपने ब्लॉग पर दिए एक सुझाव पर प्राप्त टिप्पणियों से यह जानकर प्रसन्नता हुई कि हमारे अधिकाँश शीर्षस्थ ब्लॉगर मित्रो ने आंग्लभाषा को हिन्दी भाषा के एक पूरक के रूप में अपनी मान्यता दे दी है ! अत: मुझे भी एक खुरापात सूझ गई ! लीजिये अब आप ही झेलिये ; आज अखबार में खुद का राशि भविष्यफल पढ़कर,  खून बढ़ गया एक औंस ! चूँकि लिखा था,  "देयर इज अ पोसिबिलिटी ऑफ़ गेटिंग अ पोजेटिव रेस्पोंस...... !!" भविष्यफल को पढ़ते-पढ़ते  अचानक अति उत्साहित हो गया था मै भी ! मुझे ख़याल नहीं रहा कि  माय वाइफ इज आल्सो सिटिंग इन फ्रंट आफ मी....!! तब ऊँचे स्वर में पढ़े गए भविष्यफल को सुनकर,  तन गए उसके आइ ब्रू ! जब सुना उसने कि,  अ पेंडिंग रिलेसनशिप डील विद यौर गर्ल फ्रेंड कुड कम थ्रू...!! मगर आखिर में यह सुनकर,  हंस पडी मुझ पर जोर से सामने बैठी स्त्रीलिंग ! जब आगे लिखा पढ़ा मैने,  "मिक्सिंग गर्ल फ्रेंड विद फेमली टाइम विल स्पोयेल ऐवरीथिंग.....!!"

ब्लॉग,ब्लॉगर, ब्लॉगरी.... ?????

अंग्रेजो की हम हिन्दुस्तानियों पर यही तो थी सबसे बड़ी और अमिट छाप, जिसे हम अपने ऊपर से विम्बार और निरमा से रगड़-रगड़ कर धोने के बावजूद भी नहीं मिटा सके ! जब-तब इन्ही की शब्दावली के जाल में हम इसकदर उलझ जाते है कि 'ब्लॉगर' शब्द स्त्रीलिंग है अथवा पुल्लिंग, इसी बात पर एक दूसरे को धो डालने की धमकी तक दे देते है! खैर, अफ़सोस इन मेरे जैसे नौसेखिये साहित्यकारों पर नहीं होता, अफ़सोस होता है उन अपने अनुभवी साहित्यकारों पर, उनके द्वारा बनायी गई 'अंतरजाल- मुकामों' पर, जिन्हें वे ब्लॉग के हिन्दी अर्थो में एक सही नाम भी नहीं दे पाए ! मै समझता हूँ कि ब्लॉग का सही हिन्दी रूपांतरण है "अन्तर्द्वन्द्व" ! ब्लॉग पर कोई भी लेखक अथवा रचनाकार जो अपने मन-मस्तिष्क के उदगारों अथवा उचावो को बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करता है! वह उसका "अन्तर्द्वन्द्व" (ब्लॉग) है ! इस अंतर्द्वंद्व को बाहर निकाल, अपनी लेखनी से जो उसे लेखबद्ध करता है उसे "अन्तर्द्वन्द्वकार" और जो कुछ लेखबद्ध हुआ उसे "अंतर्द्वन्द्विता " कहा जाना ही उचित होगा ! तो आइये, मैं आप सभी अंतर्द्वन्द...

पापों को धोने की ठान ही ली है तो ज़रा सावधानी से !

आज हरिद्वार कुम्भ के बाबत एक लम्बी-चौड़ी पोस्ट लिखी थी, लेकिन वह Google Transliteration की भेंट चढ़ गई ! अब दोबारा लिखने का मूड नहीं ! बस पाठको से संक्षेप में इतना ही कहूंगा कि १३ जनवरी से शुरू हो रहे कुम्भ में जाने का प्लान अगर आप बना रहे है तो कृपया; १. रेल से यात्रा को प्राथमिकता दे ! २.सड़क मार्ग का उपयोग करना जरूरी हो तो सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करे ! ३. रात के समय सड़क मार्ग से यात्रा से परहेज करे ! ४. यदि अपना वाहन ले जाना मजबूरी हो तो सिर्फ दिन में ही चले ! ५. बच्चे साथ में हो तो खाने -पीने का प्रयाप्त इंतजाम अपने पास रखे ! ६.अधिक सामान न ले जाये, क्योंकि वाहनों को हरिद्वार के बाहर ही रोका जा सकता है , लेकिन ऊनी वस्त्र अवश्य साथ रखे ! ७. सफ़र में देर हो जाए तो हरिद्वार से पहले जो भी शहर या कस्बे पड़ते है, रात वहाँ गुजारे, क्योंकि हरिद्वार में होटलों की किल्लत रहेगी ! मेरठ बाईपास से मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे तक सड़क चौडीकरण का काम पिछले सात सालो से केंद्र सरकार, उत्तरप्रदेश सरकार और एनएचएआई की मेहरबानी से निर्माणाधीन है,(ज्यों की त्यों ) और सड़क बहुत खतरनाक है ! कहाँ घंटो जाम में...