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Showing posts from August, 2011

विश्व मच्छर दिवस (वर्ल्ड मोंसक्विटो डे ) !

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वैसे तो इस निकृष्ट, मलीन और दूसरों का खून चूसने वाले प्राणि को कौन नहीं जानता और कौन इससे आज दुखी नहीं है, मगर शायद ही बहुत कम लोग जानते होंगे कि साल में एक दिवस इस दुष्ट प्राणि के नाम पर भी मनाया जाता है, और वह दिवस है, २० अगस्त ! आइये इस विश्व मच्छर दिवस पर एक पल के लिए, किसी अन्य जीव से अधिक मानवीय पीड़ा का कारण बनने वाले इस कलंकित रोगवाहक प्राणि के बारे में थोड़ा मनन करें ! सन १८९७ में लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. रोनाल्ड रॉस द्वारा इसका श्रीगणेश किया गया था, और न्यू जर्सी स्थित अलाभकारी संस्था अमेरिकी मच्छर कंट्रोल एसोसिएशन ने मलेरिया के संचरण की खोज का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया! इस उपलब्धि की बदौलत उन्हें सन 1902 में चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था ! हालांकि हमारे अन्ना की ही भांति उनका भी प्रारम्भिक उद्देश्य इस दोयम दर्जे के भ्रष्ट और अराजक प्राणि की कारगुजारियों से उत्पन्न होने वाले सामाजिक विकारों और जन-धन के नुक्शान के बारे में जनता को जागरूक करना और इनके द्वारा फैलाए जाने वाली नैतिकपतनलेरिया,डेंगू और चरित्रगुनिया जै...

कार्टून कुछ बोलता है-हसनअली को बेल, अन्ना को जेल !

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                                                                                                  गोदियाल    सौ जोड़ो तो हजार बनता है, हजार जोड़ो तो बनता है हजारे, अन्ना आप ये न समझना आप अकेले हो, हम साथ है तुम्हारे !!

आजादी का अत्यानंद !

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पता नहीं क्यों, मगर मुझे बचपन से ही अपना वो तथाकथित गौरवशाली मद्ययुगीन इतिहास पढने में कभी भी ख़ास रुचि नहीं रही ! किन्तु हाँ, आज भी मुझे अपने विद्यार्थी जीवन की वह बात खूब याद है, जब एक ख़ास अवसर पर मैं अपने पाठ्यक्रम में मौजूद इतिहास की किताब के पन्ने पलटना नहीं भूलता था, और साल में वह एक ख़ास अवसर होता था, पंद्रह अगस्त अथवा २६ जनवरी की तैयारी ! इतिहास के पन्ने पलटने पर जब मुझे ज्ञात होता कि आजादी को हासिल करने के पीछे जो प्रमुख कारण रहे थे, वे थे भेदभाव, शोषण और क्रूरता, जिन्होंने मुस्लिम शासकों के खिलाफ अंग्रेजो को विविधता और जयचंदों से भरे इस देश में लोगों का समर्थन दिलवाया और अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन का बिगुल फूका ! और जब मेरा शरारती और विद्रोही बालमन इन कारकों पर मनन करने बैठता तो सहपाठियों के बीच होते हुए भी मैं खुद को असहज सा महसूस करने लगता था! विचलित मन तब और असहज हो उठता, जब मैं देखता कि नौकरी-पेशा घर-परिवार के बड़े लोग तो स्वतंत्रता अथवा गणतंत्र दिवस की सरकारी छुट्टी होने की वजह से सुबह के ८-९ बजे तक तनकर सो रहे होते और हम बेचारे नन्हे नौनिहालों को स्कूल-प्...

कार्टून कुछ बोलता है - टुच्चेपन की हद !

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