गिरेवाँ में झाँकिये
पुष्प-हार क्या मिलेगा, पदत्राण खाओगे, जैसा बोओगे, फसल वैसी ही तो पाओगे। जानता हूँ कि कहना,लिखना व्यर्थ है सब, कब तुम इंसान थे, जो अब बन जाओगे। उसी के तो काबिल थे,जो हासिल हो रहा, सच्चाई को कब तक, फरेब से छुपाओगे। सम्मुख वार का हौंसला तो तुममे है नहीं, मुल्क-फरोशों,पीठ पे ही खंजर चुभाओगे। हिम्मत जुटाओ, स्व-गिरेवां में झाँकने की, गीत दमन,मुफ़लिसी के,कब तक गाओगे। आज जितना भले दूर, यथार्थ से भागिये, आखिर में लौट के बुद्धू,घर को ही आओगे। देख कुत्सित कृत्य तुम्हारे,पूछता 'परचेत', कायरों,लहू मासूमों का कब तक बहाओगे।