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Showing posts from June, 2026

रे मन !

मानसून का जोर, मूसलाधार बारिश, आंधी और तूफान बहुत हैं, पकडी है जो राह तूने  जिस डगर चला रहा है तू  अपनी कश्ती,  याद रखना,  उस डगर मे उफ़ान बहुत हैं।

परामर्श !

  हो वर्चस्व की यदि अंंतहीन जंग, उसे मरते दम तक कभी न हारो, भद्र-प्रतिद्वंद्वी, बर्ताव हो निश्छल, हो शत्रु कपटी, उसे होश से मारो। मरुधर जो उगले, नफरत का लावा, तीव्र-प्रबल धार जल कोष से मारो। निष्क्रिय होकर बोले, शटुतित धावा, लक्ष्यसिद्ध शस्त्र साध, जोश  से मारो।। विघ्न उपजाना ही तरल धर्म है रिपु का, उसका हल निकाल, उसे ठोस से मारो। जो फर्क न समझे, मनुष्यत्व का, ऐसे अक्ल के मारे को 'परचेत', रोष से मारो।।

एक पुष्प की अभिलाषा।

  मुझे चाहिए इक ऐसा दूल्हा, घर मे फूक सके जो चूल्हा, करे जो मन, कभी झूलन को झूला, दर्द करे ना कोई उसका पिंडली, एंडी और कूल्हा, मुझे चाहिए इक ऐसा दूल्हा, घर मे फूक सके जो चूल्हा।

कश्मकश

खुबसूरत सपने हमने भी सजाए थे, क्योंकि हम भी कभी फितरत वाले थे, पूरे न हुए वो अलग बात है, 'परचेत', मगर ख्वाब तो हमनें भी बहुत पाले थे।

आरज़ू

मंजूर तेरी हर ख्वाहिश, भले ही तू मेरे पास मत रहना, बस, इतनी सी आरज़ू है , अकेले तू उदास मत रहना।

शुन्य

उसका स्वरूप  हरदम सराहता हूं, जिस रोशनी को  दिल से चाहता हूं, आश लगाए रहता हूं  कि रोशनी कभी तो  मेरे घर आएगी,  अतिशय प्रेममय होकर आलिंगनबद्ध हो जाएगी। सुबह-सवेरे उठकर खोल देता हूं घरके सारे किवाड़, परदे, उम्मीद का बस, इतना सहारा, मेहनत कभी तो रंग लाएगी।।

बदलता मौसम

  जज़्बात अब हदों से आगे बढ़ने लगे हैं, अल्फ़ाज़, खामोशियों से झगड़ने लगे हैं, हर चीज तय दायरे पार करने लगी है, अंदाज मे खुमारी 'परचेत',  मदहोशियों के रंग चढ़ने लगे हैं।

समाप्त होता अध्याय ....

बिन पिए और बिना कुछ कहे, आज वो चुपचाप सो गया है, लगता है जिंदगी का खज़ाना 'परचेत', अब खत्म हो गया है।

ख़्याल !

दिल मे न गिला रखते, जुबां पर न  सिकवा आता, गर दृष्टा ही सही होती, दृष्टिकोण ही बदल जाता, सब्र से उठा लेते, उनकी हर इक  तशद्दुद ' परचेत', कमबख़्त ऐ वक्त, तू जो अगर वक्त पर आ जाता। तशद्दुद=ज़ुल्म