परामर्श !

 हो वर्चस्व की यदि अंंतहीन जंग,

उसे मरते दम तक कभी न हारो,

भद्र-प्रतिद्वंद्वी, बर्ताव हो निश्छल,

हो शत्रु कपटी, उसे होश से मारो।


मरुधर जो उगले, नफरत का लावा,

तीव्र-प्रबल धार जल कोष से मारो।

निष्क्रिय होकर बोले, शटुतित धावा,

लक्ष्यसिद्ध शस्त्र साध, जोश  से मारो।।


विघ्न उपजाना ही तरल धर्म है रिपु का,

उसका हल निकाल, उसे ठोस से मारो।

जो फर्क न समझे, मनुष्यत्व का,

ऐसे अक्ल के मारे को 'परचेत', रोष से मारो।।



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