Tuesday, May 26, 2026

एहसास

अब छोड देंगे वो भी पीछा करना,

हमारी परछाइयों का,

उनको भी रास आने लग गया है,

आलम ये तन्हाइयों का।

इक शुष्क दरिया समझते थे हमें 

'परचेत', जो समंदर की चाह वाले,

उनको भी अब अंदाजा हो गया हैं,

हमारे दिल की गहराइयों का।


1 Comments:

Blogger सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर

Sunday, 31 May, 2026  

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