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Showing posts from April, 2013
बेकाबू अफ़साने !
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तट की महीन रेत और लहरों के शीतल संस्पर्श पर लगने वाली वो सप्ताहिक प्रणय -हाट ! उस छोटे से मोहब्बत के बिसातखाने पर तुम्हारी परवशता, और बिना मोले-तोले ही आलिंगन का वो गर्मजोशी भरा भाव तुम पर उडेला जाना ! गुजरी सदी के उन अफसानो से कह दो कि वक्त-वेवक्त आकर, अब और न मेरे दिल के किवाडों पे दबिश दिया करें। छवि गूगल से साभार !
लघु कथा:-'पराधीन सपनेहु सुख नाही।'
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स्कूटर और उनकी पत्नी स्कूटी शहर के उत्तरी हिस्से में सरकारी आवास संस्था द्वारा निम्न आय वर्ग के लोगो के लिए ख़ासतौर पर निर्मित और बसाई गई एक कालोनी में पिछले एक दशक से रहते थे। उनकी कालोनी के ज्यादातर निवासी दिनभर दौड़-भागकर इधर से उधर बोझा ढ़ोने का काम करके अपनी रोजी चलाते थे। स्कूटर दम्पति समेत कालोनी के तमाम वाशिंदे यूं तो बहुत सुखी नहीं थे, किन्तु फिर भी दो जून को भरपेट मिल जाता था , बस यूं समझिये कि उसी में सुखी रहने की भरपूर कोशिश करते रहते थे। लेकिन पिछले एक साल से , जबसे उनके पड़ोस में उनके एक नए पड़ोसी, बाइक मियाँ और उनकी पत्नी लूना आकर रहने लगे थे, स्कूटर जी थोड़ा परेशान चल रहे थे। और उनकी परेशानी का सबब बने थे, खुद उनके ये नए छरहरे बदन, सुडौल कद-काठी एवं खुशमिजाज, दिल-फेंक बाइक मियाँ। जीवन की अधेड़ दहलीज पर पहुँच चुके तोंदू स्कूटर मियाँ को न जाने क्यों ऐसा लगता था कि उम्र में उनस...
ऐसे हमारे हाल कब थे !
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अधिक व्यस्तता की वजह से क्षमा सहित ये टुच्ची सी गजल प्रस्तुत है :) :- श्रीमती तुम्हारे सोचने को, ऐसे हमारे हाल कब थे, बच्चों तुम्हारे नोचने को, सर पे हमारे बाल कब थे। भाजी ही में चबाते रोटियां,ऐसी परेशां बात क्या थी, अरहर सवा सौ हुई तो हुई, मांगते हम दाल कब थे। अजब है बड़ी कशमकश, खुद ही उलझकर रह गई, तुझे फंसाने को ऐ जिन्दगी, हमने बुने जाल कब थे। मुश्किल किसी की आजमाइश, यकीं के लिहाज से, यूं भी इम्तहां लायक हमारे, चलन एवं चाल कब थे। मत कर भरोसा जिन्दगी का, बेवफा, खुदगर्ज है ये, ऐ दिल,उम्र की दहलीज पर, ऐसे बुरे ख़्याल कब थे। त्यागकर जो गाँव अपना,मुहब्बत न करते शहर से, जीवन में निवृति के यूं गिनते,साल दर साल कब थे। देखते क्यों भला हम,अपनी सोच के उसपार जाकर, बिछ जायेगी शतरंज ऐसी, जी के ये जंजाल कब थे। इंसानियत हुई मजबूर 'परचेत',ह...
क्या कुछ और गिरने की कोई गुंजाइश बाकी है ?
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मुंबई के थाणे की घटना, अपने आस-पास रोज घटित होती घटनाएं, और एक यह घटना जिससे सम्बंधित खबर मैं नीचे चस्पा कर रहा हूँ। मान लीजिये कि पेट के खातिर ही सही, मगर वह अभागा बन्दूक काँधे उठाये सरहद की रखवाली करते अपना सर कलम करवा गया, ताकि सरहद पार से कोई दुश्मन, उसके देश, उसके समाज, उसके कुटुंब और उसके परिवार को कोई नुकशान न पहुंचाए। उसे क्या मालूम था कि कुटिल शत्रुओं की पूरी फ़ौज तो उसके अपने घर के आस-पास ही मौजूद है। शहीद हेमराज का मासूम और भोला परिवार "शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती ने पुलिस को बताया कि शुक्रवार सुबह एक फौजी वर्दीधारी युवक उनके गांव आया था। उसने बताया कि उसका नाम अमित है और वह आर्मी हेडक्वॉर्टर से आया है। उसने धर्मवती से कहा कि अभी तक बच्ची के नाम एफडी नहीं बनवाई गई और इससे टैक्स भरना पडे़गा। उसने बैंक में जमा पैसे की एफडी कराने और बाकी पैसों को दूसरे बैंक में जमा कराने की सलाह दी। धर्मवती और परिवार के बाकी लोग अमित के झांसे में आ गए। धर्मवती ने बताया कि इसके बाद वह अमित, चचिया ससुर गजे...
वो आवाज भी बदलेंगे और अंदाज भी !
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चोरी का माल खाके, हुए बदमिजाज भी, वो जो बेईमान भी है और दगाबाज भी। मिला माल लुच्चे-लफंगों को मुफ्त का, घर-लॉकर भी भर दिए, मेज दराज भी। इख्तियार की मद में,वो ग्रीवा की ऐंठन, रोग-ग्रस्त चले आ रहे, है वो आज भी। तनिक जो तरफदार उनके सुधर जाएँ, वो आवाज भी बदलेंगे और अंदाज भी। उतरेगा सुरूर उनके माथे से 'परचेत' तबियत शिथिल होगी, नासाज भी। इख्तियार=सत्ता
लुत्फ़ उठाओ प्रेम-रस का।
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अंत कर दो द्वेष, भेद और नफ़रत के तमस का, लुत्फ़ थोड़ा सा उठा के, देखिये तो प्रेम-रस का। हो प्रीत अर्पण में सराबोर, यह सृष्टि कण-कण, पाले न कोई मन ज़रा,एक कतरा भी हबस का। पुष्प देखो,बाँटे सुगंध, रहकर चुभन में शूल की, देता पैगामें-मुहब्बत, आप व्यंजक है हरष का। है यहाँ हर किसी का, दिल बेसबब उलझा हुआ, तोड़ खुद ढूढना है, जिन्दगी की कशमकश का। जब है नहीं कोई अविनाशी यहाँ, फिर डाह कैसी, पल की खुद को खबर नहीं,सामान सौ बरस का। करके पथ-प्रशस्त हो गई, चाँद, तारों में पहुँच, क्या नहीं इस जहां में,आदमी के अपने बस का। प्रज्ञता नहीं है 'परचेत', दुर्बल समझना शत्रु को, भेद बेहतर जानता है, रिपु हमारी नस-नस का। छवि गूगल से साभार !
मर्जी धोबन माई की ! (लघु व्यंग्य)
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मेरा पुत्तर बहुत होनहार है, और होगा भी क्यों नही, आखिर मेरा पुत्तर जो है। जैसे एक फ़ौजी का बेटा अक्सर फ़ौजी ही बनता है, पुलिस वाले का पुलिस वाला और आजकल तो जो लेटेस्ट ट्रेन्ड चल पडा है कि एक एमपी और एमएलए का बेटा भी एमपी और एमएलए ही बन जाता है। साथ में ऊपर से आश्चर्जनक बातयह भी कि आगे चलकर यदि वह भी मंत्री बन जाए तो बाप ही के नक़्शे कदमो पर चलकर बाप से बड़ा घोटालेबाज भी बन जाता है। तो नेचुरल सी बात है कि एक होनहार बाप का पुत्तर ही तो होनहार होगा, जैसे मेरा है। अब कल ही की बात है, शाम को दफ्तर से थका-हारा घर पहुंचा ही था कि उसने मुझसे ऐसा धाँसू सवाल पूछा कि थोड़ी देर के लिए तो मैं खुद भी चक्कर खा गया। कहने लगा, अच्छा पापा ये बताओ कि जो इन्सान कैरेक्टर का ढीला होता है, उसके आगे "बे" अक्षर इस्तेमाल किया जाता है। मसलन 'बे'इज्जत, 'बे'कार, 'बे'शर्म, 'बे'गैरत, 'बे'ईमान.......... वह अपनी ब्रेक-फेल जुबान से कुछ और शब्द निकाले इससे पहले...