भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !
देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले और इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी दलाल श्री दीना नाथ बत्रा जी की किताब पर काफी हायतौबा मचाये हुए हैं। वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला एक पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी दर्शाता है कि स्वदेशी को फेंक देना चाहिए और अगर कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात कर लेना चाहिए। वाह ! जिस प्रखरता से आज ये कुछ मौकापरस्त दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है, मैं समझता हूँ कि इन मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति लगाव और सम्मान होता तो यही प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण...