कुछ कर !
बाजुओं में अपनी, तू बल जगा , किसान का वंशज है, हल लगा। फटकने न दे तन्द्रा पास अपने, आलस्य निज तन से पल भगा। किसान का वंशज है, हल लगा।। चिराग उपज का न कभी बुझे, पुकारती है खेत की माटी तुझे, अंकुरित आशा का वो बीज हो, जिसे दे न पाये कभी जल दगा। किसान का वंशज है, हल लगा।। समर्थ है शख्शियत,ये सिद्ध कर , परिश्रम से खुद को समृद्ध कर , तन नजर आये न मलीन झगा, सीस पे चमके सदा शीतल पगा , किसान का वंशज है, हल लगा।। जोत का ध्येय दिल में पाले रख, अन्न-कण श्रेष्ट को संभाले रख, कर बंजरों में भी वो प्रजननक्षम, बने जो तेरा खुद वसुधा तल सगा। किसान का वंशज है, हल लगा।।