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ए दुनियांदारी है कि होती नहीं टस से मस , जिधर झांको निन्यानबे का ही फेर है, बस, तीन सौ पैंसठ दिन यूं ही चलती है जिन्दगी, आज बडा दिन है, छोड़ दो सारी कशमकश। मैंरी क्रिसमस !!

दिल्ली/एनसीआर, क्या चिकित्सा मर्ज का मूल मेदांता सरीखे अस्पताल नहीं ?

  चूँकि दिल्ली के मैक्स और हरियाणा  के  फोर्टिस अस्पताल का मुद्दा गरम है, इसलिए इस प्रसंग को उठाना जायज समझता हूँ। पिछले कुछ दशकों से अधिक मुनाफे की लालसा में देश के हर कोने में  निजी चिकित्सकों और चिकित्सालयों का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार जग-जाहिर हो चुका है। हालांकि यह बात १००% सत्य भी नहीं है क्योंकि  मैं ऐसे बहुत से निजी चिकित्सकों को भी जानता हूँ, जो न्यूनतम लागत पर नि:स्वार्थ भाव से आज भी जनता की सेवा कर रहे है।    जहां तक दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों की चिकित्सासंहिता की बात है, मुख्य बात पर आने से पहले आपको याद दिलाना चाहूंगा कि नब्बे के दशक मे  दिल्ली की, खासकर बाहरी दिल्ली, फरीदाबाद, गुडगांव, नोएडा और  गाजियाबाद में हर कस्बे में एक नर्सिंगहोम होता था।   जहां तब चिकित्सा व्यापार एक असंगठित क्षेत्र था, वहीँ  छोटे स्तर पर ही सही, किन्तु बाई-पास सर्जरी और अन्य बड़े ऑपरेशनों तक की सुविधा इन नर्सिंगहोमों में उपलब्ध होती थी।  नब्बे के दशक में ही दिल्ली के मथुरा रोड पर निजी क्षे...

अवंत शैशव !

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यकायक ख़याल आते हैं मन में अनेक,  मोबाईल फोन से चिपका आज का तारुण्य देख,  बस,सोशल मीडिया पे बेसुद, बेखबर,  आगे, पीछे कुछ आता न उसको नजर,  उसे देख मन में आते है तुलनात्मक भाव,  कौन सही, मेरा शैशव या फिर उसका लगाव ?   लड़कपन में हम तो  कुछ इसतरह  वक्त अपना जाया करते थे, हर दिन अपना, दोस्तों संग,  घर से बाहर ही बिताया करते थे, कभी गुलशन की अटखेलियां, कभी  माली से शरारत,  तो कभी दबे पाँव गुल से लिपटी हुई  तितली को पकड़ने जाया करते थे।

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

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मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना ! (New concept of 'seating arrangement' in Metro coaches ! ) जैसा कि आप सभी जानते हैं कि बड़े शहरों में आज जहां आवागमन समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है, वहीँ, मैट्रो इस समस्या के समाधान में एक अहम् भूमिका अदा कर रही है।  एक अध्ययन के मुताविक तकरीबन ३० लाख लोग प्रतिदिन देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर में अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए  मैट्रो का इस्तेमाल करते है। यही वजह है कि आज देश का हर राज्य , हर बड़ा शहर इस 'व्यापक द्रुत परिवहन प्रणाली' Mass Rapid Transport System (MRTS) की ओर अग्रसर होता चला जा रहा है। मेरे लिए  यह एक संयोग ही है कि किन्ही अपरिहार्य कारणों से  मैं भी पिछले करीब ६ महीने से नियमित रूप से सुबह और शाम इस सुविधा का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ। इन पांच-छः महीनो में मैट्रो में सफर के अपने भी काफी खट्टे-मीठे अनुभव रहे है। मैं निसंकोच कह सकता हूँ कि अभी तक मैट्रो संस्था, उससे जुड़े कर्मचारी, और सीआरपीऍफ़ के जवान अपने कर्तव्य का निर्वहन बखूबी कर रहे हैं। हालांकि, डिब्बे की आतंरिक संरचना...

ब्लॉगिंग दिवस !

जब मालूम हुआ तो कुछ ऐसे करवट बदली, जिंदगी उबाऊ ने, शुरू किया नश्वर में स्वर भरना, सभी ब्लॉगर बहिण, भाऊ ने,  निष्क्रिय,सक्रिय सब प्रयास करते, रसहीन ब्लॉग में रस भरने की,       १ जुलाई, ब्लॉगिंग दिवस घोषित किया है, रामपुरिया ताऊ ने। :-)

वाह रे दुनिया ; लड़के का 'उपनाम' अल्लाह हो सकता है मगर लड़की का नहीं !

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  एक वक्त था जब अमेरिका को  दुनिया का  सबसे सभ्य और उन्नत देश माना जाता था।  शायद, वह भी इंसानी सोच और कृत्यों का ही परिणाम था, और आज वही अमेरिकी देश है जिसके जॉर्जिया प्रांत के  सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने एक अविवाहित दंपत्ति, एलिजावेथ हैण्डी और विलाल असीम वाक की बाइस महीने की पुत्री को जन्म प्रमाण पत्र जारी करने से इस बिनाह पर मना कर दिया कि आप बेटी  का  'उपनाम' (Surname) 'अल्लाह' नहीं रख सकते।                                Source:  BBC News  मजेदार बात यह है कि इसी अविवाहित दम्पति का एक जवान बेटा भी है जिसका नाम है ; "मास्टरफुल  मोसीरह  अली  अल्लाह". जहां तक मैं समझ सकता हूँ , ऐसा तो हुआ नहीं होगा कि इनके इस बेटे को भी अथॉरिटी ने जन्म प्रमाण पत्र न दिया हो।  :-)  वक्त के साथ तथाकथित सभ्य दुनियां में भी शायद निष्पक्षता और तटस्थता के मायने भी बदल गए , लगता है।   

कार्टून कुछ बोलता है .....मजबूत लोकतंत्र के मायने ....

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