लॉकडाउन को-रोना की घरेलू हिंसा।
गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे है, तमाशाई बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे क्यों रूठे है। डरी सी सूरत बता रही,बिखरे महीन कांच के टुकडो की, कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे है। ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन, इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है। पटकी जा रही हर चीज, जो पड़ जाए कर-कमल उनके, वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे है। तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत' , मनुहार मिलाना भूल गए, फकत इतने भरसे बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे है।