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Showing posts from April, 2020

लॉकडाउन को-रोना की घरेलू हिंसा।

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गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे है, तमाशाई बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे क्यों रूठे है।  डरी सी सूरत बता रही,बिखरे महीन कांच के टुकडो की, कुपित सुरीले कंठ से कहीं  कुछ, कड़क अल्फाज फूटे है।  ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन, इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है।  पटकी जा रही हर चीज, जो पड़ जाए कर-कमल उनके,   वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे है।  तनिक शुश्रुषा की कमी  'परचेत' , मनुहार मिलाना  भूल गए, फकत इतने भरसे बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे है। 

सुरा-पतझड!

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अति सम्मोहित ख्वाब कैफियत तलब करने आज भी गए थे वहां, उस जगह, जहां कलतक रंगविरंगे कुसुम लेकर वसंत आया करता था । कुछ ख़याल यह देखकर अतिविस्मित थे कि  उन्मत्त  दरख्त की ख्वाईशें, उम्मीद की टहनियों से झर-झर उद्वत हुए जा रही थी। क्या पतझड़ फिर से  दस्तक दे गया है?   या फिर, वसंत के पुलकित एहसास ही क्षण-भंगूर थे?  आशंकित मन के सवालों का जबाब क्या होगा, नहीं मालूम !!

दिल का हाल सुने पैंसे वाला.....

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सभी ब्लॉगर एंव मेरे ब्लॉग के पाठक मित्रों, जिस दिन से जुकरु भाई और मुकरू भाई ने चवालीस हजार करोड़ की डील की, उसी दिन से सोच रहा था कि एक छोटी सी पोस्ट आप लोगों की जानकारी के लिए भी डालूं। जब आप लोगों ने भी इतनी बडी डील के बारे मे सुना होगा तो एक बारी आपके मस्तिष्क मे भी ये सवाल जरूर उठा होगा कि मुकरू के प्रोडक्ट्स मे जुकरु भाई को ऐसा क्या दिखा होगा जो इतनी बडी डील कर डाली? कुछ ने तो यह भी सोचा होगा कि बडा भोला है, जुकरु तो। मगर, नहीं,  दोनों ही मे से कोई भी इतना मासूम नहीं है। मुकरू भाई ने पहले सस्ते-सस्ते मे लुभाकर जो बडी जिओ फौज बनाई उसका मकसद उस भाई ने अब हासिल कर लिया है। आप सोचते होंगे कि आप जो कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, जुकरु भाई को सिर्फ उसी की थोडी बहुत भनक मिल पाती होगी। मगर हकीकत मे ऐसा है नही। उसे यह भी मालूम रहता है कि आपने दिन मे कितनी बार अपनी बीवी/प्रेमिका अथवा पति/ प्रेमी को आई लव यू कहा।😜😂 सो, आप लोग जो भी सोशल मीडिया के आदी बन चुके हैं,आगे से सजग रहेंं। बस यही कहना था। हां, एक बात और , यह सब पिछले साल जुलाई से चल रहा था, इस फरवरी से नहीं जैसा कि न...

निकृष्ट चीनी माल !

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क्या सितम ढाये तूने, ऐ कमबख़्त कोरोना, जग मे जिधर नजर जाए, है बस, तेरा ही रोना। कभी-कभी यूं लगता है, जिन्दगी बौरा गई है, जीवन की हार्ड-डिस्क मे कहीं नमी आ गई है। ख़्वाबों की प्रोग्रामिंग  भृकुटियाँ तन रहीं हैं, हसरतों की टेम्पररी फाइलें  भी उसमे, बहुत बन रही है। समझ नही पा रहा, रक्खूं, या फिर डिलीट मार दूंं, 'हैंग' ऑप्शन भी बंद है,  जो लॉकडाउन का गुस्सा उतार दूं। है अपरिमित कशमकश,  कमबख़्त, 'जीवन फ़ोर्मैटिंग' भी तो  इत्ती आसां नही रही !!

कलम !

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लॉकडाउन के मध्य बिस्तर पर लेटे-लेटे ख्यालों की उडान हिंदी ब्लॉग जगत के स्वर्णिम युग मे जा पहुंची और अचानक 'कलम' का हर वक्त जीवन्त एक सिपाही याद आ गया। नाम था 'चंद्रमौलेश्वर प्रसाद'। सौम्य जीवन और कठिन समय मे भी हास्य-विनोद उनकी महानतम खूबियों मे से एक थी। उनके बारे मे मैं यहां कुछ ज्यादा लिखूं , शायद यह अतिप्रतिक्रिया कही जाएगी। बस, यही कहूँगा कि उनकी दिवंगत आत्मा से अनुमति लेकर आपके लिए उनकी कलम का एक अदना सा पैरा यहां आपके समक्ष उन्हें श्रद्धांंजली स्वरूप पेश कर रहा हूँ और भगवान से यही प्रार्थना कि वो इसवक्त जहाँ भी हों, उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे।🙏 एक खयाल बड़ा सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का वह दोहा था- बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर पथिक को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥ यह सही है कि बड़ा होने का मतलब होता है नम्र और विनय से भरा व्यक्ति जो उस पेड की तरह होता है जिस पर फल लदे हैं जिसके कारण वह झुक गया है।  बड़ा होना भी तीन प्रकार...

इस रात की सुबह... कब ?

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       लॉकडाउन ऐक्सटेंशन ! चित्र गुगल से साभार। अपनी एक पुरानी रचना की "तोड"मोड" प्रस्तुति:  क्यों हो रहा है तू इसकदर, खफा़ जिन्दगी से,  यार,करके तो देख थोड़ी सी, वफ़ा जिन्दगी से। अंदर ही रह बाहर मत जा, कोरोना के दर पे, थोडी सी मोहब्बत फरमा, इक दफा़ जिन्दगी से।    यूं बिगड़ने न दे दस्तूर, तू  जमाने का जालिम, अच्छा नहीं हर वक्त खोजना, नफ़ा जिन्दगी से।   छुपा के रख हरेक राज, अपनी बेतकल्लुफी का, करके मिलेगा भी क्या तुझको, जफा़ जिन्दगी से।    ये ऐतबार तेरा  बनने न पाये, बे ऐतबारी का  सबब, जिंदा है,जोड़े रख 'परचेत',फलसफा़ जिन्दगी से।    

सच को सच न कह पाने की असमर्थता ।

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दोस्तों, जैसा कि आपने भी नोट किया होगा, सोशल मीडिया और खबरिया  चैनलों और ट्वीट्स पर यहां चस्पा तस्वीर तारीफों के पुलों के साथ सुबह से वायरल हो रही है। कोई संदेह नहीं कि महिला का दुस्साहस थोडी देर के लिए उसके प्रति दिल मे सम्मान उत्पन्न करता है। किंतु, साथ ही बहुत से सवाल भी खडे करता है और जो शायद अब तक देश मे मौजूद बहुत सी सिकुलर जोंकें और प्रेश्या खडे कर भी चुके होते, अगर महिला एक समुदाय विशेष से ताल्लुक न रखती होती तो। बच्चे अगर मुसीबत मे हों तो हर मां ऐसा ही साहस कह लो या फिर दुस्साहस, रखती है। सिर्फ़ देश, काल और परिस्थितियों को भी एक समझदार मां को ध्यान मे रखना पडता है। फिर ऐसा महिमामंडन क्यों? और हर कोई इन सवालों को क्यों नजरअंदाज कर रहा है:- 1) महिला ने यह कहा, उसने पुलिस की अनुमति ली थी। बहुत बढिया, मगर , क्या इतने लम्बे सफर मे बिना हेलमेट की ड्राइव की हमारा कानून अनुमति देता है? 2) जैसा कि चित्र से पता चल रहा है , महिला के बेटे ने भी हेलमेट नहीं पहना हुआ था और ना ही मास्क। 3) आजकल कोरोना के चलते सोशल डिस्टेंसिंग की बडी चर्चा है, क्या यहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन...

लॉकडाउन।

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COVIDown

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जहां वाले !

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जहां वाले,यहीं कुछ कमी रह गई, यहीं हो गई शायद चूक.तुझसे, न मैं कुछ कमाने लायक और न ही मेरा कोई रस़ूख तुझसे। जब पापी पेट दे ही दिया था तो भरपेट तो देता,ऐ बेरहम मिटाई क्यों न गई, ये भूख तुझसे।। फोटो अक्षयपात्रा से साभार।