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Showing posts from August, 2012

बख्शीश का भूखा न हो जो, कोई ऐसा दरबान देना !

दस्तूर ही कुछ ऐसा  है कि हर महिला की ये दिली ख्वाईश होती है कि उसकी लडकी को उससे भी बढ़कर अच्छा पति मिले !  और साथ ही उसे यह भी पक्का भरोसा होता है कि उसके लड़के को उतनी अच्छी बीबी नहीं मिलेगी, जितनी कि उसके बाप को  मिली ! इसलिए ज्ञानी लोग कह गए है कि इस तरह मत चलो, मानो कि तुम दुनिया के बादशाह हो , इस तरह चलो मानो कि  तुम्हें इस बात की कोई परवाह ही नहीं कि दुनियां का बादशाह कौन है ! खैर, फिलहाल मेरी इस नज्म का लुत्फ़ उठाइये ; मांग रही भूमि अपने देश की, तुम मुझे यह दान देना,   अबके जो तुम दे सको तो, कोई रीढ़वाला प्रधान देना ! गांधी-सुभाष के इस देश में, ये क्लीबों की फ़ौज कैसी, शान-बान,आत्म-सम्मान हो, कोई ऐसा मर्दान देना !   सहारे चल नहीं सकती कौमियत,मूक-वधिर रोबोटों के, रिमोट मत अब और  तुम किसी के हाथ श्रीमान देना !     भूखे-अशक्तों की भीड़ को, नोच रहे हैं गिद्ध डालियों से,  अहमियत दे इंसानियत को, इक ऐंसा कदरदान देना !  रिपु लांघ हमारी मेंड़ को, आँगन ह...

विश्व बंधुत्व की एक मिशाल

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दैनिक हिन्दुस्तान से साभार ! वाह-वाह-वाह ... माशाल्लाह, इसे कहते है विश्व बंधुत्व की मिशाल.... ! इस नेक कार्य के लिए इन सरदार बूटासिंह जी को कोटिश धन्यवाद ! ये कही वो ही वाले बूटा सिंह जी तो नहीं है जो कभी देश के गृहमंत्री और फिर बिहार के राज्यपाल हुआ करते थे? खैर, ये सज्जन जो भी "बूटा सिंह " हो, मगर इन्हें साम्प्रदायिक सौहार्दता की यह मिशाल पेश करने के लिए नोबेल भले ही न मिले, स्व० इंदिरा गांधी अथवा राजीव गांधी वाले कोई पुरूस्कार तो मिलने ही चाहिए !  यह जानकार प्रसंता हुई कि इन बड़े दिल वाले बूटा सिंह जी की वजह से कम से कम हमें यह जानने का तो मौक़ा मिला कि जोशीमठ ( जिसे बद्रीनाथ और हेमकुंठ साहिब के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है ) पर इन तंग-दिल सनमों ने अपनी एक अच्छी खासी उपस्थिति दर्ज करा ली है ! मुझे उम्मीद है कि स्थानीय हिन्दुओं की कृपा से इन बूटा सिंह जी ने तो गुरुद्वारे के लिए काफी पहले ही जमीन हथिया ली होगी, अत:अब उन्हें चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके, बूटा सिंह जी के साथ मिलकर वहाँ किसी मंदिर अथवा इसी गुरुद्वारे के आस-पास एक मस्जिद के लिए भी जगह ढूढकर उसे ब...

कार्टून कुछ बोलता है- FDI की पहली किश्त !

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नेक सलाह दे रहा हूँ......... !

यदि आप प्रोपर्टी में इन्वेस्टमेंट की सोच रहे है, और आगे चलकर आपका मकसद कोई अपना धंधा करने अथवा प्राइवेट सैक्टर में नौकरी करने का है तो बिना किसी लाग-लपेट, बिना किसी स्वार्थ के फ्री में यह नेक सलाह दूंगा कि गुजरात के किसी इंडस्ट्रियल हब के आस-पास एक जमीन का टुकडा खरीद लीजिये, फायदे में रहोगे ! क्योंकि जहां तक बाकी देश , खासकर जिन राज्यों में तथाकथित स्यूडो-सेक्युलरिज की पूजा होती है, वहाँ का सवाल है , हमारे ये मार्गदर्शक सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण भी कर पाए तो वही काफी है ! आज एक खबर/आलेख पर नजर गई, (आप भी यहाँ नजर फरमा सकते है) तो याद आया कि क्यों मारुती-सुजूकी के भी गुजरात सिफ्ट होने के कयास लगाए जा रहे थे ! क्यों टाटा ने सिंगूर से अपना प्लांट गुजरात सिफ्ट किया ! और अब उत्तर प्रदेश के व्यावसायिक घराने भी उसी कतार में खड़े है, और हों भी क्यों नहीं, हर कोई अपना फायदा देखता है ! ये राजनैतिक दल जो तमाम देश की ऐसी-तैसी करने में जुटे है, ये किसका फायदा देखकर यह सब कर रहे है ? विकास पुरुष मोदी अपने राज्य को सुदृढ़ बना रहे है, और कल ये सेक्युलरिज्म के चैम्पियन उनको दोष भी देंगे कि ...

अन्ना-रामदेव गो बैक !

मेरे मोहल्ले की गली का टी पॉइंट......... एक ऐसा पॉइंट जो अपने में खूबसूरती से द्विअर्थ समेटे है ! एक तो यह कि गली  वहाँ  से  लेफ्ट और राईट दो दिशाओं में निकल पड़ती है और पहला साधारण अर्थ तो यही है कि इस टी पॉइंट से गली दायें-बाएं दो भागो में विभक्त हो जाती है ! किन्तु जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, वह है इस टी पॉइंट पर रामभरोसे जी की चाय की दूकान का होना, जो 'रामभरोसे टी पॉइंट' के नाम से मशहूर है, इस पूरे  इलाके में ! इसकी भी दो खासियते है, एक तो यह कि यहाँ की चाय मोहल्ले की तमाम पाक और कुकरी प्रबंधन में निपुण और सर्टिफिकेट कोर्स हासिल घरवालियों की चाय को मात देती है, और दूसरी यह कि इस खोखे के प्रोप्राइटर मिंया रामभरोसे अपने को किसी खबरिया चैनल के कर्णव् और यहाँ आने वाले तमाम चायनवाज निठल्ले और खूसट, बूढ़े और जवान अपने को किसी लोंग्रेसी प्रवक्ता से कम नहीं समझते! और समझे भी क्यों नहीं, इन्हें हर पर्दा चाहे हो रेशम का हो या मलमल का, अन्ना के खद्दर का हो या फिर बाबा रामदेव के भगवे का , उन्हें इसे "फाश" करने की महारत जो  हासिल है, बस ! ...

फ़साने निकल आते है....

छुपाकर हासिल होगा न कुछ भी, दास्ताँ को जमाने से, फ़साने कई-कई निकल आते है, अक्सर इक फ़साने से। जिक्र आएगा भरी महफ़िल, जुबां पर जब भी तुम्हारा, लफ्ज़ रोके न रुक पाएंगे मुहब्बत की दास्तां सुनाने से। पलकों के उठते-गिरते ही, नयन बयाँ कर देते है सब, निहारो हमें दिल खोलकर, फायदा क्या नजर चुराने से। फितना-ए-अक्ल भले ही,  दिखाने के काबिल न रही, किन्तु तुम्हें पाकर ही जाकर लगेगी, कहीं ठिकाने से। कदम जिन्हें हम 'परचेत',रखते थे बालिस्तों से नापकर, तुम्हें देखकर यूं लड़खड़ाते है,निकले हों ज्यूँ मयखाने से।

कार्टून कुछ बोलता है- एकदम नई मोबाइल घोटाला डिश

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कार्टून कुछ बोलता है- भयमुक्त प्रदेश का वादा !

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असम - ऑक क्रीक त्रासदी के बहाने !

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इतिहास गवाह है, और इसमें कोई दो राय भी नहीं कि इस समूची धरा पर संकीर्ण स्वार्थवाद, क्षेत्रवाद, रंगभेद, जातिवाद, और धार्मिक कट्टरवाद ने जब-जब  उसे मौक़ा मिला, मानवता का निर्ममता से खून बहाया! लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि इस खून-खराबे की सिर्फ इतनी ही ज्ञांत वजहें नहीं है! कई बार इससे थोड़ा भिन्न वजहें भी होती है,   जो इस तरह के खून खराबे को जन्म देती हैं, और  उसमे से एक  वजह है, अस्तित्व की लड़ाई !  हालांकि यह जुनून और इंसानी पागलपन भी   रंगभेद, जातिवाद, और धार्मिक कट्टरवाद से ख़ास भिन्न नहीं होता है किन्तु, हम यह भी अनदेखा नहीं कर सकते कि    आंतरिक शान्ति की दशा से अलग, एक सभ्य समाज से सम्बद्ध होते हुए भी युद्ध के मैदान में एक सैनिक की मानसिकता होती है, दुश्मन को मारो अन्यथा वह तुम्हें मार डालेगा!  गत रविवार को अमेरिका के  विस्कोन्सिन स्थित  मिल्वाउकी के उपनगरीय इलाके  ऑक   क्रीक में स्थित गुरूद्वारे में  सिख समुदाय को निशाना बनाकर जो  गोलीबारी की गई, हालांकि अभी उसके निष्कर्ष...

कार्टून कुछ बोलता है- बिजली मैडम की सफाई !

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