बख्शीश का भूखा न हो जो, कोई ऐसा दरबान देना !
दस्तूर ही कुछ ऐसा है कि हर महिला की ये दिली ख्वाईश होती है कि उसकी लडकी को उससे भी बढ़कर अच्छा पति मिले ! और साथ ही उसे यह भी पक्का भरोसा होता है कि उसके लड़के को उतनी अच्छी बीबी नहीं मिलेगी, जितनी कि उसके बाप को मिली ! इसलिए ज्ञानी लोग कह गए है कि इस तरह मत चलो, मानो कि तुम दुनिया के बादशाह हो , इस तरह चलो मानो कि तुम्हें इस बात की कोई परवाह ही नहीं कि दुनियां का बादशाह कौन है ! खैर, फिलहाल मेरी इस नज्म का लुत्फ़ उठाइये ; मांग रही भूमि अपने देश की, तुम मुझे यह दान देना, अबके जो तुम दे सको तो, कोई रीढ़वाला प्रधान देना ! गांधी-सुभाष के इस देश में, ये क्लीबों की फ़ौज कैसी, शान-बान,आत्म-सम्मान हो, कोई ऐसा मर्दान देना ! सहारे चल नहीं सकती कौमियत,मूक-वधिर रोबोटों के, रिमोट मत अब और तुम किसी के हाथ श्रीमान देना ! भूखे-अशक्तों की भीड़ को, नोच रहे हैं गिद्ध डालियों से, अहमियत दे इंसानियत को, इक ऐंसा कदरदान देना ! रिपु लांघ हमारी मेंड़ को, आँगन ह...