Posts

Showing posts from August, 2025

प्रलय जारी

Image
चहुॅं ओर काली स्याह रात, मेघ गर्जना, झमाझम बरसात, जीने को मजबूर हैं इन्सान, पहाड़ों पर पहाड़ सी जिंदगी, फटते बादल, डरावना मंजर, कलयुग का यह जल प्रपात।

लघुकथा-पहाड़ी लूना !

पहाड़ी प्रदेश , प्राइमरी स्कूल था दिगोली, चौंरा। गांव से करीब  दो किलोमीटर दूर। अपने गांव से पहाड़ी पगडंडी पर पैदल चलते हुए जब तीसरी कक्षा का नन्हा सा छात्र पल्सर दिगोली गांव  होते हुए सुबह-सवेरे 'चौंरा' स्कूल को निकलता था तो अक्सर उसकी भेंट दिगोली गांव की लूना की मां, जोकि सुबह-सवेरे गाय-भैंस के गोबर का तसला सिर पर उठाए 'मौऴेकी मरास' की तरफ जा रही होती थी, से अक्सर हो जाया करती थी। राह में उसे देखकर लूना की मां उसे पुचकारते हुए गढ़वाली लहजे में कुछ यूं कहती, "अरे मेरा बच्चा, इस ठंड में ठंडी ओंस में चप्पलों में सुकूल जा रहा है।"...... यह लगभग रोजाने का ही क्रम था। गर्मी की छुट्टियां खत्म होने के बाद जुलाई के प्रथम सप्ताह में आज जब वह चौथे दर्जे में प्रवेश हेतु घर से निकला था तो बीच में फिर लूना की मां से मुलाकात हो गई। उसने चिरपरिचित अंदाज में फिर उसे पुचकारते हुए सम्बोधित किया, "बच्चा, आज मैं भी अपनी लूना को सुकूल में भर्ती करा रही हूं, कल से तू उसे भी अपने साथ लेते हुए सुकूल जाना। पल्सर ने भी हां में अपनी मुंडी हिला दी थी। तब से शुरू हुआ साथ-साथ  स्कूल ...

ज़श्न-ए-आजादी!

Image
 

साम्यवादी कीड़ा !

लगे है दिल्ली दानव सी, उन्हें जन्नत लगे कराची है, तवायफ बनकर लेखनी जिनकी, भरे दरवारों में नाची है। हैं साहित्य मनीषी या फिर  वो अपने हित के आदी हैं, चमचे हैं राज घरानों के जो निरा वैचारिक उन्मादी हैं। अभी सिर्फ एक दशक में ही  जिनको, मुल्क लगा दंगाई है, देश के अन्दर अभी के उनको विद्वेष, नफ़रत दी दिखलाई है। पहली बार दिखी है ताईद, मानों पहली बार बबाल हुए, पहली बार पिटा है मोमिन  ये पहली बार सवाल हुए। चाचा से मनमोहन तक मानो वतन में शांति अनूठी थी, अब जाकर ही खुली हैं इनकी  अबतक आंखें शायद फूटी थी। नहीं साध सका भद्र जिस दनुज को वो बनता खुद सव्यसाची है, लगे है दिल्ली दानव सी जिनको उन्हें जन्नत लगे कराची है।