चहुॅं ओर काली स्याह रात,
मेघ गर्जना, झमाझम बरसात,
जीने को मजबूर हैं इन्सान,
पहाड़ों पर पहाड़ सी जिंदगी,
फटते बादल, डरावना मंजर,
कलयुग का यह जल प्रपात।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं, और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता, कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं, और कितना चल पाऊंगा...
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