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Showing posts from October, 2009

अब चित्रकार द्बारा भयादोहन ( ब्लैक मेलिंग ) !

पता नहीं, इस देश में इन तथाकथित अल्पसंख्यको की भयादोहन की मानसिकता कब सुधरेगी ! पता चला है कि एक खबरिया टीवी चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में, कानून से बचकर भागते हुए पिछले चार सालों से विदेश में रह रहे वरिष्ट चित्रकार ९४ वर्षीय श्री मकबूल फिदा हुसैन ने इस शर्त पर तत्काल देश लौटने की इच्छा जाहिर की है कि यदि सरकार उन्हें संरक्षण और सुरक्षा मुहैया कराये तो वो तुंरत ही स्वदेश आने को बेताव है, और आकर तुंरत चिदम्बरम साहब का आदाब भी करेंगे ! जहाँ तक कला की बात है, मैं चित्रकारी के विषय में बहुत ज्यादा ज्ञान तो नहीं रखता, मगर जितना कुछ रखता हूँ उसके आधार पर कह सकता हूँ कि निसंदेह हुसैन साहब एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार है, चाहे वो जिस आधार पर भी बने हो! चूँकि आज स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि है, इसलिए मुझे याद आ रहा है कि एक जमाना था, जब ये हुसैन साहब स्वर्गीय गांधी को खुश करने हेतु और खुद को प्रकाश में लाने हेतु उनकी भिन्न-भिन्न दुर्गा रूपी तस्वीरे बनाया करते थे, और जब थोडा सा प्रसिद्धि पा ली, तो इन्होने दुर्गा को किस रूप में पेंट किया, किसी को बताने की जरुरत मैं ...

तेल का खेल !

एक झटके में करीब पांच सौ करोड़ की भैंस गई पानी में, जिनको जीवन की हानि हुई वह अलग ! जब हादसा हो जाता है अधिकारीगण तब पूछते है कि अब क्या करना है ? मंत्री जी झट से जांच कमेटी बिठा देते है, अपने कंधे का भार उतारने के लिए ! और बस, हो गई इनके कर्तव्य की इत्श्री ! जांच करने वाले भी दो-चार करोड़ का बिल बिठा देंगे, सो अलग ! २०२० तक एक विकसित राष्ट्र बनने को छटपटा रहे इस देश के नेता और अफसरगण इतनी भी सम्बेदंशीलता नहीं रखते कि यह सोच पाए कि आपातकाल के लिए हमारे पास क्या प्रावधान है ? आज दुनिया तरक्की कर कहाँ से कहाँ पहुँच गई, विकसित देशों में रोबोट सैनिक युद्घ लड़ने को तैयार हो रहे है, और हमारे इस देश के ये कर्णधार इतनी सामान्य सी व्यवस्था नहीं कर पाते कि जहां पर इस तरह के भण्डारण की व्यवस्था की गई है वहाँ पर पहले तो ऐसी घटना ही न हो, अगर पूरी सजगता बरती जाए, लेकिन, यहाँ तो सब चलता है, हर कोई ड्यूटी के वक्त पर भी सो रहा होता है, या फिर पैसा कमाने का वैकल्पिक जुगाड़ तलाशने में लगा रहता है! बहुत सामान्य से बात है कि जहां पर इस तरह के संवेदनशील भण्डारण की व्यवस्था है उससे कुछ दूर हटकर जमीन के अन्दर...

वो कुर्ता-पजामा !

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पिछली होली के बाद के एक कवि सम्मलेन की यादे; कवि महोदय जगह-जगह पर सुई धागे से भद्दे ढंग से तुल्पे, सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहने, चेहरे पर काफी खिन्नता लिए, गुस्से में मंच पर आये, और माथे का पसीना फोंझते हुए माइक थाम कर कविता गायन करने लगे; फाड़ दिया.... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालों ने ...... "अरे कविवर, क्या फाडा ? आगे भी बढो, आप तो यही पर अटक गए", दर्शक दीर्घा से एक आवाज आई तो कविवर आगे बढे ; याद है, जब तुम पिछली बार, मायके से आयी थी, वह गिफ्ट मेरे लिए लाई थी, सुन्दर, सफ़ेद चटकीला था. न ज्यादा टाइट था, और न ही ढीला था, मगर इस होली पर उसे, जो दिया था तुम्हारे मायके वालो ने ! मुझपर रंग मलने के बहाने, फाड़ दिया..... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालो ने !! कितना निखरता था, मेरे गठीले बदन पर, और तुम कहती थी , जब आप उसे पहन कर, किसी कवि सम्मलेन में जाते हो, सच में, तुम मंच पर, और कवियों से, एकदम अलग नजर आते हो, मगर इस होली पर, गली-मोहल्ले, ठेके  के दलालों ने! मुझपर रंग मलने के बहाने, फाड़ दिया..... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालो ने !! मुझे याद...

खाए-अघाये लोग और 'आम-धन का खेल' !

जाहिर है कि यह बात उन लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती जो कामरेड के कहने पर दो किलो चावल के लिए पुलिस गश्ती दल के वाहन के नीचे विस्फोटक लगा कर उसे उड़ा देते है, यह बात उन लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती जो कुछ कम्बलों और रोटियों के लिए पूरी ट्रेन का ही अपहरण कर बैठते है ! यह बात उन लोगो के लिए भी मायने नहीं रखती, जो चूहे मारकर उनका गोश्त खाने को मजबूर है, घास खाने को मजबूर है! यह बात मायने रखती है उनके लिए जो ठेकेदार है, और कॉमन वेल्थ खेलों के नाम पर कही किसी प्रोजक्ट से संबद्ध है, यह बात मायने रखती है, सरकारी मशीनरी के उन इंजीनियरों और प्लानिंग से सम्बंधित अफसरों के लिए, जो इन खेलो की ढाचागत सुविधाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार है, यह बात मायने रखती है उस खेल सस्था से जुड़े लोगो के लिए, जिसके ऊपर इसके आयोजन की जिम्मेदारी है, यह बात मायने रखती है उन नेतावो के लिए जिनके कंधो पर सफल आयोजन का सेहरा बाँधने का हक़ और खराब आयोजन के लिए दोषारोपण का भार दूसरो के ऊपर डालने का जिम्मा है, यह बात मायने रखती है यातायात और सुरक्षा से जुड़े लोगो के लिए, और अंत में यह बात मायने रखती है उस आम जनता के लिए, ...

इस नये ’वाद’ के मायने ?

इतिहासकारों की मानें तो पन्द्र्हवी-सोलहवीं सदी मे हमारे इस देश में कुछ गिने-चुने ही ’वाद’ मौजूद थे। जिनमे प्रमुख थे, सगुणवाद, निर्गुणवाद तथा रूढिवाद। यहां से शुरु हुआ इस “वाद” रूपी संक्रामक रोग का सफ़र उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक पहुचते-पहुंचते सामन्तवाद, जातिवाद, नस्लवाद, राष्ट्रवाद, अहिंसावाद और न जाने किन-किन वादों की अपनी अनेको मंजिले तय करता हुआ, आज एक्कीसवीं सदी के प्रारम्भिक पडाव मे क्षेत्रीयवाद, स्वायतवाद, स्वतन्त्रतावाद, मार्क्सवाद, मावोवाद और नक्सलवाद तक जा पहुंचा है। जहां एक ओर भयावह होती यह स्थित दिनो-दिन चिन्ता का विषय बन गई है, वहीं पिछ्ले कुछ सालों से एक और नये किस्म का वाद भी उभरकर सामने आया है, और वह है, नपुंसकतावाद। विदित रहे कि नपुंसक व्यक्ति प्रायः सभी उच्चगुणों के अभिवर्धन और साहस भरे पुरुषार्थी के सम्पादन में असमर्थ रहते हैं। और यहाँ इस वाद का उल्लेख मैं किसी व्यक्तिगत क्षमता के सन्दर्भ में नहीं कर रहा अपितु राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में कर रहा हूँ। हांलाकि, अगर हम अपने अतीत को गौर से देखे तो इस बीमारी का कीटाणु भी हमारे शरीर मे सदियों पूर्व से विद्यमान रहा है...

लघु कथा- वह एक नर्स थी !

डा० मार्क, डा० श्रीवास्तव के एक अजीज मित्र थे, और डा० श्रीवास्तव के ही आमत्रण पर अमेरिका से भारत आये थे। डा० मार्क से डा० श्रीवास्तव की जान पहचान तब हुई थी, जब डा० श्रीवास्तव अमेरिका मे डाक्टरी कोर्स कर रहे थे। कोर्स खत्म होने के उपरान्त देश सेवा और खासकर ग्रामीण समाज की सेवा का जज्बा डा० श्रीवास्तव को स्वदेश खींच लाया था। यहां लौटकर उन्होने सरकारी नौकरी ज्वाइन की और राज्य सरकार के दूर-दराज के ग्रामीण अस्पतालों मे मरीजो को अपनी सेवायें प्रदान करने लगे। उस वक्त तक उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश से अलग राज्य नही था, अत: डा० श्रीवास्तव का तबाद्ला पहाडो की तलहटी मे बसे उस कस्बे के एक सरकारी अस्पताल मे हो गया था, जिसमे केरल की रहने वाली जैनी बतौर नर्स पिछले चार-पांच सालो से कार्यरत थी। हालांकि तब मै बहुत छोटा था, और शायद छठी कक्षा में पढता था। मुझे याद है कि सुन्दर और चुलबुले किस्म की जैनी स्वभाव से बहुत मिलनसार और भावनात्मक तौर पर दिल खोलकर दूसरों की मदद करने वाली थी। वह भारत के केरल प्रान्त के कोच्चि से करीब साठ किलोमीटर दूर अथीरापल्ली इलाके की मूल निवासी थी, और वाईएमसीए दिल्ली से प्रशिक्षित थी...

यह ऐसा अद्धभुत देश हमारा !

इस  पावन धरती ने कितने , भांति-भांति के जीव जने, कुछ गुल्फामों ने चमन उजाडे , कुछ गुलशन की नींव बने।  राम,कृष्ण और बुद्ध की भूमि, बाह्य-धावों,जुल्मों  ने चूमी , कहीं पोषे जयचंद बहुतेरे, कहीं वीर पृथ्वी जैसे वक्ष तने। कहीं बहती है प्यार की गंगा , कहीं नफरत करती है नंगा , कहीं खाप-पंच के पहरे होते  , और कहीं रांझा -हीर घने।   यह ऐसा अद्धभुत देश हमारा , हर बेबस को मिले सहारा , कहीं रंगों,कही खून की होली,  कहीं दीवाली और ईद मने।  

दीवाली पर एक ब्लॉगर भारतीय बच्चे का पटाखा मैनेजमेंट !

सर्वप्रथम आप सभी को एक बार फिर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये ! मन के अन्दर एक बच्चा है, जिसे बहुत रोकने की कोशिश करता हूँ मगर वह है कि कभी- कभार कीडे की तरह उछल पड़ता है ! नहीं मालूम कि जो लिखने जा रहा हूँ उसे आपलोग किस तरह से लेंगे! लेकिन यही कहूंगा कि दिवाली के इस सु-अवसर पर यह हल्का फुल्का हास्य-विनोद है, इसलिए आप उसे अन्यथा न ले ,और अगर किसी भी सज्जन को यह शोभनीय न प्रतीत हो, तो मैं उनसे अग्रिम तौर पर क्षमा प्राथी हूँ ! यह बच्चा जो कि दिनभर इस हिन्दी बलोग जगत में ही उलझा रहता है, आज दिवाली के अवसर पर किस तरह अपने पटाखों का मैनेजमेंट कर रहा है, आये देखे : पापा ने पांच सौ रूपये दिए थे पटाखे खरीदने के लिए, लेकिन पांच सौ के तो कुछ भी नहीं आये ! दो सौ का तो एक ही अनार का डब्बा आया ! चलो ऐसा करता हूँ कि इसकी स्टॉक लिस्ट बनाता हूँ ; १. सुतली वाले समीर अंकल - चार ( चिंटू बोल रहा था कि जब ये फूटते है तो आईटम बम की तरह आवाज करते है, इन्हें तो मै देर रात को जब पडोसी सो जायेंगे, तब उनके गेट पर जाके फोडूगा ) २.डबल सौट वाले ताऊ रामपुरिया - दो (चिंटू बोल रहा था कि ये दो बार आसमान की तरफ गोले छ...

सभी ब्लॉगर मित्रो के लिए एक आवश्यक सूचना !

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आज इस सांसारिक जगत की बारह महान विभूतियाँ आप सभी के मोबाइल नंबर मुझ से मांग रही थी , मैंने उन्हें आपके मोबाईल नंबर तो नहीं दिए, मगर आपके घर के पते, जो भी मेरे पास उपलब्ध थे, उन्हें दे दिए है ! वे अगले एक-दो दिनों में आपके घर पधारने वाले है ! उनके नाम इस तरह से है : १.सुख २.शान्ति ३.समृधि ४.सफलता ५.संस्कार ६.स्वास्थ्य ७.सरलता ८.सम्मान ९.संयम १०.सजगता ११.सम्पूर्णता १२. सादगी मैने इन सभी विभूतियों से आग्रह किया है कि वे आपके घर में सदा के लिए ठहर जाए ! अतः आप उनका जोर-शोर से स्वागत करे ! साथ ही आपको तथा आपके समस्त पारिवारिक जनों को मेरी तरफ से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये ! शुभम करोति कल्याणं, आरोग्यम धन संपदा ! शत्रु, बुद्धि, विनाशाय, दीपम् ज्योति नमस्तुते !! आपका -पी. सी. गोदियाल

इल्तजा

दगा  दिल से किसी के मत कर , ऐ यार, सलवटों में ही दबकर  न रह जाए प्यार।  निश्छल मन  न छल चेहरे पर, यूं हो किसी से,  मुहब्बत का  इजहार।   घर के द्वारे आये, झुकी पलकें, मुस्कुराये,  तभी चाँद का  तू कर  दीदार।   कदर फूल की , फिर  मोल-भाव क्यों ? गुल-ऐ-गुलशन  मत कर जीना दुश्वार।  

चोरो के पैसो पर ऐश करता एक देश !

ऐसा अनुमान है कि १९४७ में आजादी के तुंरत बाद से अब तक हम भारतीय, जिनमे हमारे नेता, अफसर और कुछ व्यावसायिक घराने शामिल है, अपने देश का धन चुराकर तकरीबन बारह खरब रूपये अकेले सिर्फ स्विस बैंक के खातो में जमा कर चुके है ! यूँ तो समय-समय पर इस देश में यह मांग उठती रही है कि विदेशी बैंको में पडा इस देश का काला धन वापस देश में लाया जाए और इस देश के विकास कार्यो में लगे, मगर यह बात भी किसी से छुपी नहीं कि हम लोग और हमारी सरकारे इस दिशा में कितनी ईमानदारी से पहल करने की कोशिश करते है ! अभी हाल के चुनावों से पहले भी यह मुद्दा खूब उछला लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? वही ढाक के तीन पात ! सबके पास रटा-रटाया एक ही एक्सक्यूज होता है कि स्विस राष्ट्रीय बैंक अपनी गुप्त नीति के तहत इन खातो के आंकडे मुहैया नहीं करा सकती ! दुनिया भर में लोगो के बढ़ते विरोध के बाद स्विस बैंकर एसोशियेसन ने एक नया सगूफा छोड़ दिया है ! अब वे कहते है कि इस बर्ष दिसम्बर माह से वे खातेदार का अता-पता बताये बगैर जिन देशो के साथ उनकी दोहरी कर संधि है उन देशो के खाता धारियों की आय पर वे टैक्स लगाकर उस पैसे को उस देश को दे देंगे जिसके ये ...

ये सरकारे दोस्त है या फिर दुश्मन ?

आज के अखबारों में प्रमुखता से छपी यह खबर आपने भी पढी होगी कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि भविष्य की और टकटकी लगाए युवाओं को यदि नौकरी चाहिए तो वे शिक्षक बने, क्योंकि इस वक्त देश में करीब बारह लाख से अधिक शिक्षको के पद रिक्त है! अभी कुछ दिन पहले आपने यह भी खबर अखबारों में पढी होगी कि देश भर के पुलिस महकमे में इस वक्त लाखो पद खाली पड़े है ! अब सवाल यह है कि जब एक तरफ देश का युवा वर्ग बुरी तरह बेरोजगारी की मार से जूझ रहा है, वहाँ दूसरी तरफ ये सरकारे यह कहकर क्या जतलाना चाहती है कि इस वक्त देश में इतने रोजगार के साधन उपलब्ध है? ये इतने सारे पद रातो-रात तो खाली नहीं हुए, सालो से यह रिक्तता चली आ रही है, और मंदी भी तो पिछले एक-डेड साल पहले ही आयी थी! और क्या मंदी में इन सरकारों के धर्ता-कर्ता अपने शानो-शौकत के खर्चो में कमी लाये ? यदि देश के पास प्रयाप्त धन उपलब्ध नहीं था, इन पदों के अभ्यर्थियों को वेतन देने के लिए तो क्या इन्होने अरबो रूपये अपनी मूर्तियों और अन्य तरह के बेफजूल बातो पर नहीं खर्च किया ? फिर क्यों नहीं, इन सरकारों ने इस और ध्यान दिया कि इस दे...

नोबेल वाली रेवड़ियां !

नोबेल शान्ति पुरुष्कार २००९ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को देने की घोषणा की खबर जनमानस के लिए यदि आश्चर्यजनक नहीं थी, तो सहज पचने योग्य भी नहीं थी ! एक वक्त था ,जब इस पुरुष्कार की सही मायने में एक अलग प्रतिष्ठा थी ! इंसान जिसे पाने के लिए अपने हुनर को तन-मन से अपने उद्देश्य में झोंक देता था, मगर कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच इसे बामुश्किल ही प्राप्त कर पाता था! हो सकता है कि बराक हुसैन ओबामा आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय शान्ति के एक प्रमुख दूत उभर कर आये, लेकिन यह बात गले नहीं उतरती कि महज अपने ९ महीने के शासन काल में उन्होंने ऐसा क्या कर दिखाया है, जो इस पुरुष्कार की चयन समिति द्बारा उन्हें इस योग्य समझ लिया गया ? अगर अमेरिकी डेमोक्रेतिवे पार्टी उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाती तो २ साल पहले तक उन्हें जानता कौन था ? सवाल यह नहीं है कि उन्हें यह पुरुष्कार क्यों मिला, सवाल यह है कि क्या इस इतनी बड़ी दुनिया में उनके अलावा एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अन्तराष्ट्रीय शान्ति का दूत कहलाने के काबिल हो ? अगर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कुछ आक्रामक नीतिया अपने शासन का...

हे खुदा, चलो आपने किसी को तो अक्ल बख्शी !

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खबर :Burqas banned at al-Azhar University CAIRO: Egypt’s top Islamic cleric said Thursday that students and teachers will not be allowed to wear face veils in classrooms and dormitories of Sunni Islam’s premier institute of learning, al-Azhar, part of a government effort to curb radical Islamic practices.The decision announced by Sheik of al-Azhar Mohammed Sayyed Tantawi came days after he said the face veil, or niqab, ‘has nothing to do with Islam.’ तंतावी जहां अपना पक्ष इस तरह रखते है कि ‘face of a woman is not a shame.’ वहीं मुस्लिम जमात के ठेकेदार भी तैयारी करने लगे है " The media arm of the group accused Tantawi of ‘declaring war on the niqab, and facilitating matters of vice’ in a statement posted on its Web site,". एक और खबर : Canadian Muslim group calls for burqa ban OTTAWA: A Muslim group on Thursday called for a ban on the wearing of burqas in public in Canada, saying it ‘marginalizes women.’ The burqa has absolutely no place in Canada,’ said Farzana Hassan of the ...

करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाये !

सभी जीजावो-बहनों, भाइयो और भाभियों को मेरी तरफ से करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाये, इन दो पंक्तियों के साथ : ऐ चाँद तू भी क्या  सितम  ढाता है ! बचपन में मामा, और जवानी में सनम नजर आता है !! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx ऐ मुए चाँद , तेरी वजह से बचपन में  मैंने भी खूब डांट खाई है, करवाचौथ के दिन तुझे निहारते हुए  मम्मी से पूछ बैठा था  कि क्या ये मामू आपका भाई है।      .

डूब मरो बेव्डो कहीं चुल्लू भर दारू मे !

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पव्वे पर पंद्रह रुपये, अद्धे पर बीस  रुपये और पूरी बोतल पर तीस  रुपये अतिरिक्त वसूला जा रहा है, पिछले एक अर्से से उत्तम  प्रदेश के फुट्कर शराब बिक्रेताओ द्वारा इन बेव्डो से ।   मगर अब तक किसी भी माई के लाल की इतनी हिम्मत नही हुई कि जरा सा चूं भी कर सके इस हो रहे अन्याय के प्रति, इसे कहते है प्रशासन का खौप। बात सिर्फ़ दस-बीस अथवा तीस रुपये की नही, बात है इस देश के कायदे- कानूनों की , जो कहते है कि आप किसी भी ग्राहक से वस्तु पर प्रिन्टेड रेट; खुदरा अधिकतम मूल्य (MRP ) से अधिक नही वसूल सकते। वहाँ  के शराब विक्रेताओं से इस बात पर विरोध दर्ज करो तो उनका टका सा जबाब होता है “हम क्या करे, ऊपर से आदेश हैं !” ! ८५ रूपये एम् आर पी छपा है, मगर बोतल  सौ  रूपये की बिक रही है ! ऐसा अनुमान है कि उत्तम परदेश मे प्रतिदिन तीन लाख शराब की बोतलों की खपत होती है, और पव्वे, अद्धे और पूरी बोतल के औसतन  के हिसाब से दस रुपये प्रति बोतल भी अतिरिक्त वसूली का सीधा मतलब हुआ कि प्रतिदिन तीस लाख रुपये औ...

आके तो देख, साबरमती के संत !

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चौक-चौराहों पे लटका के तेरा बुत, बनाते  उसे अपने तिजारत की ढाल ! आके तो देख साबरमती के संत, तेरे ये भक्त, क्या-क्या कर रहे कमाल !! पब्लिक को सरे-आम मूर्ख बनाते,  थोक ,फुटकर दोनों ही में कमाते , बदन पर अपने ओढ़कर खादी, इन्होने देश की तिजोरी खा दी , अपने लिए क्या-क्या नहीं जोड़ा, मवेशियों का चारा भी नहीं छोडा, खेल, टूजी ,कोलगेट सब  छा गए , तोपे, शहीदों के कफ़न भी खा गए, रोडपति से चलकर करोड़पति की चाल ! गए कई क्वात्रोक्की होकर माला-माल, आके तो देख साबरमती के संत, तेरे ये भक्त, क्या-क्या कर रहे कमाल !! कुछ इस तरह भी ; लूट खा गए देश तिजोरी,  मिलकर राजा रंक दे नाल, साबरमती के संत देख,  तेरे पूतों ने क्या किया कमाल ! मंदी में भी खूब लहराया,  २जी,सीडब्ल्यूजी मायाजाल, साबरमती के संत देख,  तेरे पूतों ने क्या किया कमाल ! लोकतंत्र की आड़ में,  राजनीति इन्होने अजब चलाई, प्रजा को  दे दी दरिद्रता, और खुद खा रहे है रस-मलाई...