नवाबिन और कठपुतली !
पहनकर नकाब हसीनों ने, कुछ पर्दानशीनों ने, गिन-गिनकर सितम ढाये, बेदर्द महजबीनों ने। क़ातिल बड़े शातिराना थे हर अंदाज नवाबिन के, शब्द कसैले दिलों ने खाए, तीर बिषैले सीनो ने। अंदाज-ए-ज़ुल्म वो उनका,करें तो बयां किसको , कर लिया किनारा अब तो, भरोसे से यक़ीनों ने। उलटी बही जो गंगा इस चुनार से उस चुनार तक, जौहरी को जमकर परखा, खोटे-खरे नगीनों ने। बेढंग यूं हो गया 'परचेत',सिलसिला ऋतुओं का , जिस्म को परेशां किया है,शरद में पसीनों ने।