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Showing posts from May, 2009

सिपै चचा !

सूबेदार पूरण सिंह अपने गाँव के वे पहले व्यक्ति थे, जो आजादी के बाद सेना में भर्ती हुए थे । अतः रंगरूटी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब वह पहली बार गाँव आये तो गाँव के बच्चो ने उनका नया नामकरण कर डाला था 'सिपै चचा' यानि सिपाही चाचा । कुछ सालो बाद न सिर्फ बच्चे, अपितु गाँव के बड़े-बूढे सभी उनके लिए इसी नाम का संबोधन करने लगे थे, और तब से आज तक वे इसी नाम से जाने जाते है। अपने जवानी के दिनों में जब सिपै चचा छुट्टी आते थे और अपनी फौजी ड्रेस में एक बिस्तरबंद और एक काला बक्सा लिए गाँव की पहाडी धार वाली सड़क में बस से उतरते थे, तो गाँव में एक अलग ही किस्म का उत्साह सा फैल जाता था। गाँव के कुछ युवा दौड़कर सड़क में ही पहुच जाते और कोई चचा का बैग उठाता, कोई बक्सा और कोई विस्तरबंद । वे ज्यों-ज्यों गाँव के नजदीक पहुँचते, शाम को हुक्का गुडगुडाते हुए चौपाल में बैठे लोग आपस में काना-फूसी करते " सिपै चचा लगता है इस बार माल-ताल काफी लाया है, बक्सा भारी प्रतीत हो रहा है। " माल-ताल से उनका एक ही तात्पर्य होता था, वह था, रम की बोतल । इस बार सिपै चचा की भतीजी, रूपा तकरीबन २ साल के बाद गर्मियों...

हर बात से इत्तेफाक रखते है !

हम तो उनकी हर इक बात से इत्तेफाक रखते है, संग अपने, अपनी बेगुनाही की ख़ाक रखते है।    हर लम्हा मुमकिन था, बेशर्मी की हद लांघना, किंतु जहन में ये था कि हम इक नाक रखते है।   हमको नहीं आता  कैसे , दर्द छुपाते हैं  पलकों में, किंतु नजरों में अपनी, बला–ए–ताक  रखते है।    तमन्ना इतनी थी, हमें सच्चा प्यार मिल जाता, कोई हरगिज ये न सोचे, इरादा नापाक रखते है।   जी करे जब 'परचेत', लिख दे कोई नज्म, गजल, दिल हमारा श्याम-पट्ट है, जेब में चाक रखते है। 

बंटवारे का सच !

वह घटना जहां सबके लिए तकलीफदेह थी और सभी उस घटना से जहां एक और भौचक्के से थे, वहीं दूसरी ओर मोहन को कहीं अन्दर ही अन्दर एक प्रकार की सुख की अनुभूति भी हो रही थी, एक अजीब से सुख की अनुभूति । और साथ ही उसका मन बाबा(दादाजी) के लिए श्रदा से भर आया था । कही दिल के किसी कोने पर उसे इस बात का भी पछतावा था कि नादानी बस उसने अपने बाबा के प्रति बचपन से ही कितने भ्रमित ख्याल दिलो-दिमाग में पाले रखे थे। सुबह से अब तक वह दो बार घर के अन्दर ही मौजूद पूजा-गृह में जाकर दीवार पर टंगी बाबा की आदमकद फोटो के पास खड़े होकर, उनके पैर छूं, बाबा से खुद को माफ़ करने की विनती कर चुका था । चौधरी करमचंद उस जमाने में अपने इलाके के एक दवंग किन्तु स्वच्छ छवि वाले इंसान थे । हर कोई उनकी इज्जत करता था । दिल्ली के समीप के एक गाँव में उनका एक बड़ा घर था । काफी बड़ी जमीन जायदाद के मालिक थे । उस जमाने में उनका एक बड़ा भरा-पूरा परिवार था, पति-पत्नी और आठ बच्चे । आठो लड़के थे, एक लडकी की इच्छा में चौधरी साहब ने परिवार को इतना बड़ा कर दिया था। बच्चे बड़े होने लगे, जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि सभी उंगलिया बराबर नहीं होती, ठीक वैसा...

निट्ठले बैठे थे जो...

सुना है,  बेनमाजी भी अब नमाजी बन गए है, कलतक निट्ठले थे जो, कामकाजी बन गए है। अदाई की रस्म खुद को तो निभानी आती नहीं, और जनाव हैं कि शहरभर के काजी बन गए है। जब से बने हैं, यही बताते फिर रहे लोगो को कि ख़ुदा नाफरमान की हिमायत नहीं करता। खुद फरमान बरदारी की बात आई जब तो, मस्साल्लाह,  जनाब  दगाबाजी बन गए है।

मिश्रित तहजीव !

घी में गौ-चर्बी, दूध में यूरिया, अनाज में कंकड़, मसालों में बुरादा, सब्जी में रसायन, दालो पर रंग ! और तो और, इस सर-जमीं पर, सरकार भी मिलावटी, सब भगवान भरोसे, अब रोओ या हंसो, जीना इन्ही के संग !! मिलावट और बनावट  का युग है, अपने चरम पर पहुंचा कलयुग है, सराफत की पट्टी माथे, दहशतगर्दी का ढ़ंग !! कुंठित वतन, मांगे है परिवर्तन , बेगरज लाचार, स्वार्थ का भरमार, अपमिश्रित इंसानो का है चहुँ ओर  रंग-तरंग  !!

लघु कथा- सिंगाडे !

हालांकि आगे पढने की दिली ख्वाईस के बावजूद, गरीबी के चलते, दसवीं पास कर हरी मजबूरन सुदूर गांव से अपने एक दूर के रिश्तेदार के पास दिल्ली मे नौकरी ढूढने आ गया था । काफ़ी दिनो तक दर-दर की ठोकरें खाने के बाद, एक प्लेसमेन्ट एजेन्सी के मार्फ़त उसे दो महिने बाद, चितरंजन पार्क मे एक प्राइवेट लिमिटेड कन्सट्रक्सन कम्पनी मे चपरासी की नौकरी मिल गयी थी । नौकरी मिल जाने से हरी काफ़ी खुश था, वह दिल लगाकर अपना हर काम करता, कम्पनी के कर्मचारियों को समय पर चाय-पानी देना, उनके कुर्सी मेज पर दिन मे दो बार कपडा मारना, उनकी फ़ाइलों को तरतीब से और सजा कर रखना, इत्यादि । अत: वहां मौजूद सारा स्टाफ़ उससे काफ़ी खुश था । हरी ने गांव मे मां को भी खत लिखकर सूचित कर दिया था कि उसे दो हजार रुपये महिने पर एक नौकरी मिल गयी है , वह पैसे बचाने की पूरी कोशिश करेगा और फिर उनके खर्चे के लिये भी मनिआर्डर से कुछ रुपये भेजेगा। कम्पनी का मालिक एक बंगाली सेठ था, काफ़ी तुनुक मिजाज । अभी हरी को नौकरी लगे बीस दिन ही हुए थे कि एक दिन दोपहर बाद दफ़्तर मे मालिक से मिलने के लिये दो-तीन लोग आये । हरी ने सेठ के केविन मे उन्हे जब पानी दिया तो सेठ ...

कलयुगी गुरु-शिष्य संवाद

हे गुरुजी, मुझ दास की, विनय बस इतनी सुन लीजिये’ बात बडी गम्भीर है, कृपया कान इधर कीजिये ! शाम को पढू,सुबह को चौपट, याददास्त कमजोर क्यो? आजीविका की लाईन मे , प्रतियोगिता का शोर क्यो ? यह मुझे भी मालूम है गुरु, कि  पृथ्वी सारी गोल है, गोल है खोपडी मगर पास-लिस्ट से अपना नम्बर क्यो गोल है? गुरुजी ने कुर्सी खिसकाई, खडे हुए, कान ऎठकर कहा, बेटा ! जवानी भर मस्ती मारी, फिल्म देखी, आराम से रहा लेटा ! बिन तेरे फिल्म न देखने से, मल्लिका शेरावत ,पिट तो न जाती, अब अपना नम्बर गोल बताते हुए, तुझे शर्म नही आती ? अरे शर्म तो हमे आती है, क्योंकि हम है तेरे गुरु, अब पढाई के ख्वाब छोड, कोई अवैध धन्धा कर शुरू ! बाहर दिखावे को देशी वस्तुवें, अन्दर तस्करी का माल रखना, जरुरत पर कभी-कभार अपने, इस गरीब गुरु का भी ख्याल रखना !!

खिड़की !

दो हफ्तों से भारत और पाक के मध्य चल रहा घमासान युद्घ, अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका था ! फ्रंट पर मौजूद अधिकांश पाकिस्तानी सैनिक या तो मारे गए थे, या फिर एक-एक कर आत्मसमर्पण कर रहे थे ! उत्तर-पश्चमी सीमा पर तैनात भारतीय सेना की एक टुकडी ने पाकिस्तानी सैनिको के एक बंकर को घेर लिया था ! जब यह खबर फैली कि पूर्वी सीमा पर पाकिस्तान के लगभग सभी सैनिक आत्मसमर्पण कर चुके, तो वहा, उस बंकर में मौजूद पाकिस्तानी सैनिक भी हथियार छोड़कर, हाथ उठा आत्मसमर्पण के लिए आगे बढे ! मेजर शर्मा अपनी टुकडी का नेतृत्व करते हुए, पाकिस्तानी सैनिको के ऊपर धीरे-धीरे शिकंजा कस रहे थे, उनकी उस टुकडी में मौजूद दो जिगरी दोस्त, नायब सूबेदार सुरेन्द्र सिंह और हवलदार मोहन सिंह भी थे! मेजर शर्मा ने दोनों को पाक सैनिको के उस बंकर की उल्टी दिशा से जाकर, उसे घेरने के निर्देश दिए ! कवर फायरिंग का सहारा लेते हुए दोनों रेंगते हुए पाकिस्तानी बंकर के जब एकदम समीप पहुचे, तो तब तक पाक सैनिक हाथ खड़े कर आत्समर्पण के लिए आगे बढ़ चुके थे! अतः यह देख दोनों ने खुद को रिलैक्स महसूस किया और सीधे खड़े होकर पीछे से उन पर बंदूके तान, समर्पण वाले ...

लालची ब्लॉगर

मध्य-रात्रि का समय था। आसमान में घने-काले बादल रह-रहकर एक तेज कड़कन पैदा कर रहे थे । बिजली चमकती, तेज हवाए चलती, और उसके बाद फिर से बादलो की गडगडाहट । चौदह वर्षीय गूगुल प्रसव पीडा से छटपटाये जा रही थी, जिस इलाके में वह रहती थी, वहां से मुख्य शहर और नर्सिंग होम करीब ४० किलोमीटर दूर थे। अतः उसका मित्र माइक्रोसोफ्ट भी उसे घर से बाहर निकालने और अस्पताल पहुचाने में खुद को असहाय सा महसूस कर रहा था, क्योंकि तेज आंधी में सडको पर पेड़ गिरने और ड्राईव करने का ख़तरा वहाँ मौजूद था। माइक्रोसोफ्ट अपने पास मौजूद एल सी डी प्रोजक्टर को अपने लैपटॉप से जोड़ सामने सफ़ेद दीवार पर यू ट्यूब की मदद से 'लाइव बर्थ' की वीडियो डॉक्युमेंटरी देख-देखकर, उसी प्रकार की हर संभव सहायता गूगुल को पहुचा रहा था। और आखिर वह घड़ी भी आ गयी, जब नन्हे मेहमान ने गूगुल की उस वृहत दुनिया में अपने कदम रखे। जब वह पैदा हुआ तो रोते हुए वह एक ही शब्द को बार-बार मुह से निकाल रहा था, ब्लॉग-ब्लाग-ब्लाग- ब्लॉग । अतः गूगुल और माइक्रोसोफ्ट ने प्यार से उसका नाम ब्लॉगर रख दिया। ब्लॉगर धीरे-धीरे बड़ा होना शुरू हुआ, और शीघ्र ही वह ...