सिपै चचा !
सूबेदार पूरण सिंह अपने गाँव के वे पहले व्यक्ति थे, जो आजादी के बाद सेना में भर्ती हुए थे । अतः रंगरूटी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब वह पहली बार गाँव आये तो गाँव के बच्चो ने उनका नया नामकरण कर डाला था 'सिपै चचा' यानि सिपाही चाचा । कुछ सालो बाद न सिर्फ बच्चे, अपितु गाँव के बड़े-बूढे सभी उनके लिए इसी नाम का संबोधन करने लगे थे, और तब से आज तक वे इसी नाम से जाने जाते है। अपने जवानी के दिनों में जब सिपै चचा छुट्टी आते थे और अपनी फौजी ड्रेस में एक बिस्तरबंद और एक काला बक्सा लिए गाँव की पहाडी धार वाली सड़क में बस से उतरते थे, तो गाँव में एक अलग ही किस्म का उत्साह सा फैल जाता था। गाँव के कुछ युवा दौड़कर सड़क में ही पहुच जाते और कोई चचा का बैग उठाता, कोई बक्सा और कोई विस्तरबंद । वे ज्यों-ज्यों गाँव के नजदीक पहुँचते, शाम को हुक्का गुडगुडाते हुए चौपाल में बैठे लोग आपस में काना-फूसी करते " सिपै चचा लगता है इस बार माल-ताल काफी लाया है, बक्सा भारी प्रतीत हो रहा है। " माल-ताल से उनका एक ही तात्पर्य होता था, वह था, रम की बोतल । इस बार सिपै चचा की भतीजी, रूपा तकरीबन २ साल के बाद गर्मियों...