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Showing posts from February, 2010

अरे, जब ५०-६० रूपये की भी औकात नहीं थी तो कार खरीदना क्या जरूरी था ?

आज सबेरे-सबेरे अपने पढ़ोसी मुत्तुस्वामी जी से एक बार फिर से मुकालात हो गई ! मदर डेयरी से दूध लेकर आ रहे थे ! अपने को सतारूढ़ दल का दांया अथवा बांया ( पता नहीं कौन सा, मुझे ठीक से नहीं मालूम ) हाथ समझते है! शक्ल से कुछ खीजे से प्रतीत आ रहे थे ! अपनी तो आदत है परत चढ़ते घाव को कुरेदना, अत: झठ से राम-राम ठोक दी ! थोबड़े को हल्का सा पिघलाते हुए, मेरे राम-राम का जबाब दिए बगैर बोले ; ये हमारे लोग भी न, च. चु... क्या बताऊ, कभी नहीं सुधरेंगे ! मैंने शांत होकर पूछा : क्या हुआ मुत्तुस्वामी जी, खीजे हुए क्यों हो इतने ? वे बोले : अरे, गोदियाल जी , कल रात को ग्याराह बजे घर पहुंचा ! मैंने कहाँ : ट्रैफिक जाम की वजह से लेट पहुंचे होंगे, मैं भी देर से ही पहुंचा था! क्या करे, दिल्ली में ट्रैफिक ही इतना हो गया ! वे बोले : अरे ट्रैफिक को मारो गोली, ये तो अपने देश के इन महान नागरिकों की वजह से जाम लगा था कल..... क्यों कल ऐसा क्या था? मैंने बीच में उनकी बात काटते हुए पूछा ! वे बोले : अरे भाई तुम भी न, साहित्यकार बनने के चक्कर में मुझे लगता है कि तुम्हे रास्ते में ड्राइव करते हुए भी ब्लोगबाणी और चिठ्ठाजगत ही ...

नफरत बसाने से फायदा क्या !

दर्द जुबाँ पे आने दो   दबाने से फायदा क्या , अश्रुओ को छलक जाने दो  छुपाने से फायदा क्या।   खिला फूल किसे नहीं भाता मुरझाने  से फायदा क्या , रख पाओ तो  खिला चेहरा   सुजाने  से फायदा क्या।   ज़िन्दगी को  नजदीकियां मिलें ,, दूरियां बढ़ाने से फायदा क्या, सुर ही भटक जाएँ रियाज में, तो नज्म सुनाने से फायदा क्या। भला है हाथ बटाना किसी संग टांग अड़ाने से फायदा क्या , प्यार समायोजन की  गुंजाइश हो, तो नफरत  बसाने से फायदा क्या। 

सचिन निसंदेह एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी है मगर....

सर्वप्रथम सचिन को इस उपलब्धि के लिए मेरी तरफ से हार्दिक बधाई ! निश्चित तौर पर उनकी इस उपलब्धि से क्रीडा के क्षेत्र में देश गौरवान्वित हुआ है । मगर एक बात अपने देश के मीडिया और उन क्रिकेटान्ध से कहना चाहूँगा कि सचिन भगवान् नहीं है भाई ! कल शाम को मैं अपने टीवी सेट पर खबरे सुनने बैठा, सचिन भगवान् है.... सचिन ये है... सचिन वो है.... उफ़, इन खबरिया चैनलों की बकवास सुनकर मुझे मजबूरन कुछ देर बाद सी एन एन का सहारा लेना पडा, अगर मैं बहुत अमीर होता तो शायद कल हाथ में पकडे रिमोट को स्क्रीन पर मारकर टीवी सेट को भी तोड़ देता। हद होती है किसी भी चीज की । आज एक ब्लोगर सज्जन का सुबह-सुबह लेख पढ़ा शहीदों का सम्मान तो दिल को बड़ा दुःख हुआ कि जिनकी कुर्बानियों की वजह से ये मीडिया और क्रिकेटान्ध खूब मनोरंजन और पैसे कमा / बटोर रहे है, उनकी सहादत की खबर देने और सुनने की इनके पास फुरसत नहीं। ये हमारे कुछ क्रिकेटान्ध भले ही यह सुनना पसंद न करे, लेकिन अपनी तो भाई खरी-खरी कहने की ही आदत है ; १. सचिन निश्चित तौर पर बस एक श्रेष्ठ क्रिकेटर है, और कुछ नहीं। २.सचिन ने यह रिकॉर्ड अपने नाम ३७वे साल में खेलते हुए बनाया, ...

होली पर एक धमकी भरी गजल !

हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू, गुजर कर देख हमार गली से, नाम हमरा मुंती ना गर, मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से! डराय करत रहनी जो कबो तोरा से, समझिएगा न हमका वो मुंती, खूब चलत है अब आपन, पूरा आदिवासी विरादरी हमरी है सुनती ! गुलाल डालकर छेड़ना तो दूर, अब के सूरत देख ले हमार भली से, नाम हमरा मुंती ना गर, मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से! तू अब इ न समझि , बन्दूक चलावे के सिर्फ तोहरे के आवत बा, ए.के. सैंतालीस चलावेके, अपने किशनजी हमरो के सिखावत बा! खूबे बर्जिस हम हूँ करत बानि, पहलवान कम नाही कौनो खली से, हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू, गुजर कर देख हमार गली से ! नाम हमरा मुंती ना गर, मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!! भोजपुरी नाम-मात्र की जानता हूँ, अत: भाषाई त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमा !

महंगाई के लिए जिम्मेदार असल छोटे-छोटे मुद्दे, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है!

फिर से एक बार संसद में सरकार द्वारा बढ़ती महंगाई का ठीकरा विश्वव्यापी मंदी के सिर फोड़ दिया गया ! लेकिन इसकी जड़ो तक जाने की या तो किसी के पास फुर्सत नहीं, या यों कहे कि कोई इस ओर ध्यान देना ही नहीं चाहता ! मेरी समझ से आज की इस महंगाई के जो दो मुख्य कारण है वे हैं ; एक तेजी से फैलते कंक्रीट के जंगल , और दूसरा उस पर पसरता वाहनों का मकडजाल ! खुद सरकार की पर्यावरण और वनों से सम्बंधित संसदीय समिति ने अपनी ३०वी रिपोर्ट में कहा था कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का ५० % यानी ३२० मिलियन हेक्टियर वन तथा कृषि योग्य हरित भूमि तथाकथित विकास की भेंट चढ़ गया! आंकड़े बताते है कि अकेले १९५१ से १९८० के बीच ६० हजार हेक्टियर भूमि सिर्फ सडको और विधुत ट्रांसमिशन लाइन बिछाने में ही प्रयुक्त हो गई साथ ही इसी दौरान १३४ हजार हेक्टियर भूमि आवास के लिए इस्तेमाल कर ली गई ! ये तो महज १९८० तक के आंकड़े थे ! अभी हाल के आंकड़ो पर गौर करे तो सिर्फ पिछले दस वर्षो में कुल कृषि योग्य भूमि का ३०% जनता और बिल्डरों ने आवास और टाउनशिप बनाने में नष्ट कर दी है! आप हर हफ्ते के अखबार उठा लीजिये, रोज कोई न कोई बिल्डर कहीं न कही टाउनशि...

नजारा !

बालकनी अथवा  घर की खिडकी से  बाहर गली में झांकना , यानि  कि   दो सम्भाव्यताओं का  उदय। या तो चक्षुओं को सकून अथवा पीड़ा का अनुभव , या फिर कानों को कटु-मीठी श्रुति प्राप्ति ॥ पड़ोस के मकान की छत पर, कोई चांद टहलता  सा दिखे , तो चक्षुओं को  सकूँ  मिलना  निश्चित।  और यदि  नीचे गली में  खम्बे की ओंट मे  खड़ा कोई चकोर  भी नजर आये तो  मधुर कर्ण-श्रुति  प्राप्ति  संभव ॥ किन्तु, यदि अचानक, उस खुशनुमा वातावरण  को  प्रदूषित करने हेतु अमावस्या  छत पर आ जाये । चकोर फुदककर भाग खड़ा हो , चांद दुबककर कहीं छुप जाए तो  कानो को कटु श्रुति  और चक्षुओं को पीड़ा का अनुभव होना  अपरिहार्य ॥

नया एकीकृत पाठ्यक्रम-कुछ सवाल !

मानव संसाधन विकास मन्त्री श्री कपिल सिब्बल के देश मे शैक्षणिक सुधारों के प्रति उठाये जा रहे कुछ कदम भले ही स्वागत योग्य हों, जोकि निश्चित तौर पर हमारी सरकारों को बहुत पहले और न सिर्फ़ कुछ गिने-चुने विषयों मे बल्कि पूरे पाठ्यक्रम के सम्बंध मे उठा लिये जाने चाहिये थे। खैर, देर आये दुरस्त आये, लेकिन मुझे इस मुहावरे को हज्म कर पाने मे कुछ दिक्कत मह्सूस हो रही है। मुझे लग रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी, और कहीं यह नया प्रयोग लार्ड मैकाले की सदियों से सुप्त पडी आत्मा को इस देश मे एक बार फिर से अपना कुटिल खेल खेलने का अवसर न दे दे। दूसरी तरफ़ सरकार के इस कदम से अमेरिका समेत कुछ यूरोपीय देश यह आश लगाये बैठे है, और जैसा कि ओबामा प्रशासन मे दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक मन्त्री रौबर्ट ब्लैक ने कहा है कि श्री कपिल सिब्बल ने उनसे वादा किया है कि सरकार संसद मे एक ऐसा विधेयक लायेगी जो भारत मे शिक्षा क्षेत्र खासकर उच्च शिक्षा मे विदेशी भागीदारी को बढायेगा। जैसा कि विदित है कि देश भर के राज्य शिक्षा बोर्डो ने इस बात पर अपनी सहमति दे दी है, और जैसे कि स्कूल शिक्षा बोर्ड परिषद (COB...

वाह जी खुशवंत सिंह जी !

अभी कुछ देर पहले दैनिक हिंदुस्तान के गेस्ट कॉलम में जाने-माने और वयोवृद्ध लेखक श्री खुशवंत सिंह जी का एक आलेख पढ़ रहा था ! शीर्षक था " कितने अलग हैं राहुल और वरुण " यह तो काफी पहले से जानता था कि खुशवंत सिंह जी का एक ख़ास झुकाव नेहरू परिवार और कौंग्रेस के प्रति हमेशा से रहा है, और जो उनके लेखो में कई बार साफ़ परिलक्षित भी होता है! लेकिन मेरा हमेशा यह मानना है कि एक लेखक और साहित्यकार ज्यों-ज्यों वृद्ध होता चला जाता है, उसकी बौद्धिक क्षमता में निखार आता चला जता है! उसकी तर्क शक्ति निष्पक्ष होती चली जाती है! परन्तु आज उनका जब यह लेख पढ़ा तो न जाने मैंने क्यों अपने इस आत्मविश्वाश को डगमगाते पाया ! समझ नहीं पाया कि खुशवंत सिंह जी जैसे प्रसिद्ध लेखक ऐसे कैसे सोच सकते है? आइये, उनके उस लेख की एक हल्की सी झलक आप भी देख लीजिये, और खुद निर्णय कीजिये कि इस बात को नजरअंदाज कर कि इस देश ने यहाँ के सर्वोच्च पद पर एक सिख राष्ट्रपति और एक सिख प्रधानमत्री बिठाया था / है, मेनका जी के माध्यम से सिखों के प्रति इस देश के लोगो की सोच के बारे में उन्होंने जो कहा,क्या वह सत्य है? चूँकि खुशवंत सिंह ज...

देशी !

हीथ्रो हवाई अड्डे से प्रस्थान के वक्त भी उन दोनों बाप-बेटी को एयर पोर्ट तक ड्रॉप करने आई माँ ने एक पर फिर से रश्मि को, जिसे माँ-बाप प्यार से 'रिश' कहकर पुकारते थे, हिदायत भरे लहजे में समझाया था कि बेटा रिश, लौटते में वहां से फालतू का कूडा-कचडा मत उठा लाना। पर्यटन स्थलों पर वहाँ लोग "देशी माल" पर विलायती लेबल लगाकर पर्यटकों को मूर्ख बनाते है। अगर कोई चीज बहुत पसंद आ भी रही हो तो लेते वक्त दूकानदार जो दाम बताये, उससे ठीक आधे पर भाव तय करना। रश्मि को तो बस दादा-दादी के देश पहुचने की हडबडी थी, अत: वह माँ की बात को बहुत महत्व न देकर फोर्मलटी के लिए सहमती के तौर पर सिर्फ अपनी मुण्डी हिलाकर बार-बार " डोंट वोरी मोंम " कह देती थी। पिता के लिए तो ब्रिटेन से भारत आना मानो दिल्ली से आगरा की ओवर नाईट जर्नी के समान था, और अपने माता-पिता के पास वो अक्सर साल-भर में जब-जब मौक़ा मिलता दसियों बार आ जाते थे। मगर रश्मी अपनी उस १५ साल की उम्र में पहली बार दादा-दादी से मिलने उनके देश, उनके गाँव आ रही थी। उसका जन्म और लालन-पालन ब्रेटन में ही हुआ था। रश्मी के पिता अपनी युवावस्था में ...

संघ की एक 'वृहत हिन्दू मंच' के तहत पिछड़ी दलित-दमित जातियों को साथ लेकर चलने की नई मुहीम कहीं हमारे कुछ समाज विज्ञानियों के पेट-दर्द का सबब न बन जाए।

डिस्क्लेमर: मैं संघ का किसी भी तरह का सदस्य नहीं हूँ ! इस देश में कुछ वो जयचंद वंशीय स्वार्थी तत्व जिन्हें सिर्फ और सिर्फ समाज को बांटे रखकर अपना उल्लू सीधा करना भाता है, अक्सर स्वयं सेवक संघ (आर एस एस ) पर यह आरोप लगाते रहे है कि यह हमेशा से सिर्फ हिन्दुओं के लिए खुला रहा है। यह खुले तौर पर कहता है कि यह हिन्दुओं के हितों की सेवा करने के लिए है। संघ ने कभी भी निचली जातियों या निचले वर्गों के हिन्दुओं के लिए कोई काम नहीं किया है। लेकिन अब जब आर एस एस दलित और निचली जातियों के लिए एक ख़ास मुहीम लेकर आया है तो इनके पेटों में दूसरी तरह का दर्द उठने लगा है , इन्हें यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि संघ ने समरसता अभियान चलाकर दलितों व निम्न तबकों को जोड़ने पर पिछले दशकों में ज्यादा जोर दिया है, और आदिवासी दलित इलाको में इस सम्बन्ध में कुछ प्रशंसनीय कार्य भी किये। मगर यह बात किसी से छुपी नहीं है कि हमारे कुछ तथाकथित सेकुलरों और मिशनरियों को यह रास न आया, और परदे के पीछे रहकर इन्होने फिर विदेशो से इक्कट्ठा किये धन के प्रभाव से नक्सलियों के जरिये अपने कुकृत्यों और मंसूबो को अंजाम दिया, और आज भी दे रह...

गलत निर्णय का खामियाजा !

लोकतंत्र में सरकार का चुनाव किसी स्कूल की उस माध्यमिक बोर्ड की परिक्षा के समान है, जिसमे उत्तीर्ण होने वाला विद्यार्थी आगे चलकर अपने और देश के उज्जवल भविष्य की नीव रखता है। मगर यदि एक विद्यार्थी जो न सिर्फ पढ़ाई में एकदम गया गुजरा हो, बल्कि किसी भी दृष्ठिकोंण से उत्तीर्ण होने के काबिल ही न हो, और मूल्यांकनकर्ता जबरन उसे न सिर्फ उत्तीर्ण कर दे, अपितु उसे अब्बल नंबर भी दे दे, तो आप सहज अंदाजा लगा सकते है कि आगे चलकर उस विद्यार्थी के हाथों उस देश का भविष्य क्या होगा, जिसका वह नागरिक है। ठीक यही हाल केंद्र की मौजूदा सरकार का भी है। यह जानते हुए भी कि क्या महंगाई का मुद्दा, क्या आर्थिक मुद्दा, क्या विदेश नीति का मुद्दा, क्या बेरोजगारी का मुद्दा, क्या ढांचागत विकास का मुद्दा, क्या आतंकवाद का मुद्दा, क्या क़ानून और व्यवस्था का मुद्दा, न सिर्फ एक मुद्दे पर अपितु लगभग सभी मुद्दों पर पिछले कार्यकाल के दौरान यह सरकार पूर्णतया विफल रही थी। इस देश के वोटर ने दूसरे कार्यकाल का जिम्मा भी उन्ही को सौंप दिया, यानि एक अनुत्तीर्ण विद्यार्थी को जबरन पास कर दिया, तो खामियाजा भी भुगतना ही होगा। बोया पेड़ बबूल...

एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम !

सर्वप्रथम सभी शिव भक्तो  को मेरी तरफ से महाशिवरात्री पर्व की बधाई और ढेरो शुभकामनाये ! आज इस पावन अवसर पर एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम ; हे भोलेनाथ ! अब इतने  भी भोले मत बनो, कृपया मेरी बात गौर से सुनो, मैंने अपने पूर्वजो से सूना था,  आपके पास तीसरी आँख भी है, और अपने इस देश पर आपकी   हमेशा रहती तांक-झाँक भी है ! अपनी तो पैदाइसी बुद्धि  मंद है, तीसरी की छोडो, अपुन को लगता है आपकी तो दो आँखे भी बंद हैं  ! इस देश की यह हालत न होती, अगर सचमुच ऐसी बात न होती, चारो तरफ मचा हां-हाकार न होता, शठों को मिली ऐसी सौगात न होती ! अगर  सच में तीसरी आँख रखते हो, तो कृपा करके अब उसे खोल दो, "बम' बोलने का अब ज़माना गया, शब्दों को नहीं, क्रिया को मोल दो ! आपका एक भक्त - 'परचेत' !

क्या वोट-बैंक सचमुच इतना अक्लमंद है ?

यूँ तो इस देश की सबसे बड़ी बिडम्बना ही यह है कि यहाँ कुछ भी निश्चित (दृड, ठोस) नहीं है! एक तरफ तो हम और हमारा संविधान कहता है कि देश के सभी नागरिक समान है, कोई रंग-भेद, जाति-वर्ण, धर्म इत्यादि का फर्क नहीं है! और यदि इसमें कोई भेद करता है तो उसके खिलाफ सख्त क़ानून है! एवं दूसरी तरफ सरकारी नौकरी पाने और अपने फायदे के लिए भिन्न-भिन्न राजनैतिक दलों की सरकारें तथा वे स्वार्थी लोग, जिन्हें इसमें फायदा दीखता है, खुद ही जाति-धर्म के आधार पर समाज को बांटने पर तुले है ! तब ये समानता की परिभाषा भूल जाते है! मेरा यह तर्क है कि जब कोई पिछड़ा अल्प्संखयक अथवा दलित यह कहता है कि चूँकि उन्हें हमारे समाज में बहुसंख्यको और उच्च जाति कि लोगो ने शोषित किया, इसलिए उन्हें अपना उत्थान करने के लिए संरक्षण/ आरक्षण जरूरी है तो भाई साहब, चाहे जिन भी कारणों से भूतकाल में सवर्णों और बहुसंख्यको ने आपको शोषित किया हो, तो क्या उसका बदला आप आज की पीढी पर निकालोगे, उनके हक़ और अधिकार मारकर ? आज जब आपकी चल रही है तब आप जमकर कानूनों और अपने ओहदे का जहां तक हो पाता है खूब दुरुपयोग कर रहे है, और इसे आप सही भी मानते है तो जब ...

वजन घटाना है तो ऊँचे पहाड़ो पर जाइए !

अगर आप बिना कोई व्यायाम किये, बिना अपनी खान-पान की खुराक में कमी किये, वजन घटाना चाहते है, तो वैज्ञानिक कहते है कि कुछ हफ्तों के लिए ऊँचाई वाले(high altitude )स्थानों पर चले जाइए! आपका वजन स्वतः ही कम हो जाएगा ! अपने एक अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि ऊँचाई वाले स्थानों पर मात्र एक हफ्ता बिताने के परिणामस्वरूप भी निरंतर वजन में कमी आती है! http://www.wired.com/wiredscience/2010/02/high-altitude-weight-loss/ अध्ययन के मुताविक अधिक वजन के गतिहीन लोग जिन्होंने एक हफ्ता ८७०० फीट की ऊँचाई पर बिना अपनी डाईट में कोई कमी किये, और नही कोई शारीरिक कसरत किये व्यतीत किये थे, और जब वे एक महीने बाद वापस मैदानों पर लौटे तो उनका वजन पहले के उनके वजन का दो तिहाई ही रह गया था ! मजेदार बात यह है कि यह अध्ययन स्पष्ट रूप से यह भी दर्शाता है कि इससे उनका गर्मी सेवन (caloric intake ) भी घट गया! और यह बात शर्तिया तौर पर भी इस आधार पर कही जा सकती है कि जैसा कि आपने भी गौर किया होगा कि पहाडी क्षेत्रो के लोग अक्सर औसत शरीर के और चुस्त-दुरुस्त होते है! और यह बात तो शायद यहाँ बताना अतिश्योक...

आस्तीन के सांप !

जैसा कि आप लोग भी जानते होंगे, एक खबर के मुताविक हाल ही में आजमगढ़ से पकडे गए इंडियन मुजाहीदीन के आतंकवादी शहजाद आलम ने खुलासा किया है कि सितम्बर २००८ में बटला हाउस एंकाउन्टर से फरार होने में और उन्हें पनाह देने तथा आर्थिक मदद देने में दिल्ली का एक पूर्व विधायक शामिल था! विधायक का नाम भले ही अभी गुप्त रखा जा रहा हो , मगर आप और हम अनुमान तो लगा ही सकते है कि वह जैचंद कौन हो सकता है! अब इस खुलासे को भले ही बाद में अपने राजनैतिक लाभ के लिए ये हमारे राजनैतिक गण तोड़-मरोड़कर जो मर्जी अमली जामा पहनाये, इस जांच-पड़ताल का जो मर्जी हश्र हो, लेकिन यह शायद आप लोग भी न भूले हों कि कैसे इन आतंकवादियों का सपा और तृणमूल कौंग्रेस ने कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर महिमा मंडन किया था, उन्हें अपनी तरफ से हर्जाना दिया था और किसतरह कौंग्रेस ने अपना एक सिपहसलार हाल ही में आजमगढ़ भेजकर वोट बैंक की सहानुभूति बटोरनी चाही ! और दूसरी तरफ इस देश के जिस बहादुर सिपाही, इन्स्पेक्टर शर्मा ने इनसे लोहा लेते हुए अपने प्राण न्योछावर किये, उसका परिवार आज तक मूलभूत सुविधाओ के लिए ठोकर खाने को मजबूर है ! ये आस्तीन के सांप जिस था...

कौंग्रेस की इस राजनीति पर तथाकथित सेक्युलर खामोश क्यों ?

यह तो सभी जानते है कि 'फूट डालो और राज करो', यह गुरु-मन्त्र कौंग्रेस को विरासत में अंग्रेजो से मिला था, मगर वोट के लिए वे इतने छोटे दर्जे की राजनीति पर उतर आयेंगे कि इनके सिपहसलार यह भी भूल जांए कि उनके इस गैर-जिम्मेदाराना कदम से देश की सुरक्षा पर क्या असर पडेगा, तो निश्चित तौर पर यह सब इस देश के लिए एक चिंता का विषय है ! तुष्टीकरण और वोट बैंक की अपनी राजनीति के तहत कौंग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने जिस तरह आजमगढ़ के संजरपुर जाकर उन परिवारों से मिलकर , जिनके घर के युवा दहशतगर्दी में आरोपित हैं, बाद में बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए यह कहा कि उन्होंने खुद बाटला हाउस में हुए मुठभेड़ में मारे गए दो युवकों के फोटोग्राफ देखे थे, जिसमें एक लड़के की सिर में गोली लगी थी, मुठभेड़ में सामने से गोली चलेगी तो पेट या सीने में लगेगी न कि सिर पर ! अब इनके इस बयान को हास्यास्पद न कहा जाए तो और क्या कहेंगे ? इन जनाव को इतना भी अहसास नहीं कि जब सामने से गोलियों की बौछार आ रही हो तो निशाने पर खडा व्यक्ति अपने को बचाने के लिए स्वाभाविक तौर पर सिर नीचे झुकाता है, और यदि पहले ही पेट में गोली लग...

जीना तो बस टाइम पास रह गया !

मकसद न अब जीने का, यहां कुछ ख़ास रह गया, यूँ  लगे है कि जीना तो बस, टाइम पास रह गया। ढोये जा रहे बोझ को, मानो  किसी कुली की तरह, गाडी आई-गई, स्टेशन का ही अहसास रह गया।   कोई न हमसफ़र,चले अकेला मंजिल-ए-मुसाफिर, बेरहम  है ये दुनिया, सोचके दिल उदास रह गया। खुद के पैमानों पर जीना चाहते थे जिन्दगी मगर, वक्त की ठोकर में अटका, कतरा-ए-सांस रह गया। सोचते थे यों कि  हमेशा चलेंगे शुतुरमुर्ग की चाल , बैसाखियों पर सिमटा ,बन्दा-ए-बिंदास रह गया।  

क्या गजब का शिगूफा छोड़ा है, माननीय !

देखा गया है कि हम हिन्दुस्तानियों की याददास्त बहुत कमजोर होती है, और शायद यही वजह रही होगी कि एक गुलामी झेलने के बावजूद भी दूसरी गुलामी हमारे सिर पा आ बैठी थी क्योंकि ये भुल्लकड़ हिन्दुस्तानी पिछली गुलामी की मार को भूल गए थे और इसी तरह दूसरी, दूसरे के बाद तीसरी और फिर उसके बाद चौथी गुलामी आराम से यहाँ पैर पसारती रही। भ्रष्टता के लिए हम लोग रोज नए नए फोर्मुले इजाद करते रहते है इसलिए याददाश्त कमजोर हो जाती है। अत: याद दिलाना चाहूँगा कि आज से ठीक एक साल पहले व्यापारी सुभाषचन्द्र अग्रवाल ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर केन्द्रीय मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों की सम्पति के ब्योरे का जानकारी नहीं देने का आरोप लगाते हुए कहा था कि कार्यालय ने इस मामले पर पलटी मार ली है। श्री अग्रवाल ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन देकर मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों की सम्पति का ब्योरा माँगा था। उन्होंने बताया प्रधानमंत्री कार्यालय शुरुआत में यह जानकारी देने को तैयार हो गया था, पर 17 दिसम्बर 2008 के एक पत्र में उसने पलटी मारते हुए कहा कि माँगी गई जानकारी सूचना के अधिकार कानून की 8.1 (ई) और 8.1. (जे) के तहत व्य...

यही द्वन्द होने लगा है !

दिल  का धैर्य  मंद होने लगा है , झंकृत  भावनाओं का   हर छंद होने लगा है, है यहाँ अब कोई  अपना  भी चाहने वाला , मन को ऐसा  ही कुछ  द्वंद  होने लगा है। 

दरिन्दे - इंसानियत के असली दुश्मन !

एक तरफ इन्सान ( बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, डॉक्टर , इंजीनियर इत्यादि ) दूसरे इंसानों के जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए दिन रात मेहनत कर, अपने जीवन की भोग विलासिता को त्यागकर पूर्ण रूप से अनुसंधानों को समर्पित किये हुए है, और दूसरी तरफ इस धरा पर ये पाषण युगीन निश्चर भी मौजूद है ; (नोट: भले ही इस कडवी सच्चाई को कुछ बुद्दिजीवी लोग, मेरी पता नहीं कौन सी मानसिकता का खिताब दे, मगर ऐसी खबरों को प्राथमिकता देने का उद्देश्य बिना किसी धार्मिक भेदभाव के आज के इस तथाकथित सभ्य समाज में इन सोये हुए लोगो को मेरा जगाने भर का प्रयास मात्र है ) खबर: Tuesday,02 February , 2010 -12:25 A 12-year-old Saudi girl unexpectedly gave up her petition for divorce from an 80-year-old man her father forced her to marry in exchange for a dowry, Saudi media reported Tuesday. Despite support from human rights lawyers and child welfare advocates, the girl and her mother, who originally sought the divorce, withdrew the case Monday in a court in Buraidah, in Al-Qasim province, newspapers said. The girl told the court that ...

सीमाए लांघता सरकारी धन का दुरुपयोग !

बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी पर अंकुश लगाने के लिए बहुप्रचारित दैनिक जीवन में सादगी (austerity ) अपनाने की कौंग्रेस की बात वहाँ ख़त्म हो गई दीखती है, जहां एक दिन राहुल भैया, पूरे गाजे-बाजे और बीच राह में कुछ छुटभैयों द्वारा प्रायोजित पथराव की नौटंकी के साथ पंजाब से दिल्ली रेल में बैठकर आ गए ! देश जहां एक तरफ महंगाई की मार से त्राहिमान-त्राहिमान कर रहा है, और सरकार सरकारी फंड में कमी का रोना रोकर सरकारी नियंत्रण वाली आम उपभोग की वस्तुओ के दाम बढ़ाने का बहाना ढूंढ रही है, वहीं दूसरी तरफ यही सरकारें, किस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग कर रही है, उसके कुछ उदाहरण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; कल मैंने ब्लॉग जगत पर झूटा सच ब्लॉग http://jhoothasach.blogspot.com/2010/02/blog-post.html के आदरणीय कविराज जोशी जी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमे उन्होंने एक खबर का जिक्र किया था कि ३७५०० किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राज मार्ग पर हर २५ किलोमीटर पर श्रीमती सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के फ़ोटो वाले २०x१० फुट के होर्डिंग लगेंगे ! इनकी संख्या १४८८ होगी और हरेक होर्डिंग पर दो लाख रुपये का खर्चा आएगा ! ए...

हे कृष्ण ! तुम्हारा क्या पक्ष है ?

आज तो सवालों के घेरे में   घिरा, स्वयं यक्ष है, पक्षपातियों के चंगुल में फंस चुका,निष्पक्ष है। दर-दर की ठोकरें खाता, ईमान का सुत दीन है, शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुए जा रहा दक्ष है। धुर्तों के कक्ष में तो हर शाम मनती है दीवाली, वीरान-सुनशान सा पडा हरीशचंद्र का कक्ष है। चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पे काबिज हो गए, और कौए जहां मूंग दल रहे, वो हंस का वक्ष है।   कृष्ण भी भूल गए शायद, 'यदा-यदा ही धर्मस्य',  बीज बोया था जैंसा,फल भी वैसा हमारे समक्ष है।