फ़कत़ जिंदा-दिली..

है कहीं अमीरी का गूम़ां तो कहीं गरीबी का तूफ़ां, ये आ़बोहवा, मेरे शहऱ की, कुछ गरम है, कुछ नरम है। कहीं तरुणाई का योवनवदन छलकते जाम, हाथों मे ...