ख़्याल !

दिल मे न गिला रखते, जुबां पर न  सिकवा आता,

गर दृष्टा ही सही होती, दृष्टिकोण ही बदल जाता,

सब्र से उठा लेते, उनकी हर इक तशद्दुद 'परचेत',

कमबख़्त ऐ वक्त, तू जो अगर वक्त पर आ जाता।


तशद्दुद=ज़ुल्म 



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