जज़्बात अब हदों से आगे बढ़ने लगे हैं,
अल्फ़ाज़, खामोशियों से झगड़ने लगे हैं,
हर चीज तय दायरे पार करने लगी है,
अंदाज मे खुमारी 'परचेत',
मदहोशियों के रंग चढ़ने लगे हैं।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
कजरारी जुल्फ़ों और गलमुच्छों का रंग कब धवल हुआ 'परचेत', कुछ पता ही न चला, बस, साज़ और सामान जुटाने मे ही मसरूफ़ रह गया, वक्त कब हा...
गुड
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