Thursday, January 21, 2010

एक देश के अन्दर, कई देश हैं !

बिके हुए न अगर यहाँ    ,
खादी, सफ़ेद- उजले परिवेश होते,
तो आज भला क्यों  फिर,
एक ही देश के अन्दर कई देश  होते।  

सभ्यता-संस्कृति न सिकुड़ती ,
दूर-दराज  के गाँव-द्वारे तक,
देश-प्रेम भावना न सिमटती,
'विविधता में एकता' के नारे तक।  

कुटिल राजनीति के  भेद-भाव  ,
न देते नित नये ठेस होते, 
और क्यों भला फिर आज ,
एक ही देश के अन्दर कई देश  होते। 

रग-रग में पसरा  न ,
लम्बी गुलामियत का खून  होता ,
और न ही देश -गद्दारी का,

जयचन्दो  के सिर चढ़ा जूनून होता।  

मेहनत से संजो के रखे हमने  ,
न ही अंग्रेज-
मुग़लो के अवशेष होते,
तो क्यों भला फिर आज ,
एक ही देश के अन्दर कई देश  होते। 

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13 Comments:

Blogger Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

भाषाओं व राज्यों से आगे बढ़कर सोच बदलनी होगी अगर भारतीय बनना है तो

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger L.R.Gandhi said...

क्योंकि यहाँ आज कल
किन्नरों का राज है ॥
बाबर को ये सर नवायें
पृथ्वी नज़र अंदाज़ है....

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बिके हुए यहाँ सब,
खादी, सफ़ेद और उजले परिवेश हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!


बहुत जबरदस्त गोदियाल जी, शुभकामनाएं.

रामराम.

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger Murari Pareek said...

बहुत सही कहा है इश देश में कई देश है !!!

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger Kulwant Happy said...

एक देश में असल में भी कई देश हैं। आपकी बात बिल्कुल सही है।

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger Udan Tashtari said...

यथार्थ उजागर कर दिया इस रचना से...बहुत बढ़िया.

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
जी हाँ, रोज़ एक नया समाचार आ रहा है।

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger समय चक्र said...

बिलकुल सही फरमा रहे है आप ? आज स्थितियां ऐसी ही बन रही हैं

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger राज भाटिय़ा said...

मेहनत से संजो के रखे अपने,
मुग़ल-अंग्रेज आंकाओ के अवशेष हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
आप की रचना के एक एक शब्द से सहमत हुं, बहुत सुंदर
धन्यवाद

Thursday, 21 January, 2010  
Blogger Unknown said...

देश-प्रेम की भावना रह गई,
विविधता में एकता के नारे तक !!
Vah...vah bahi....
Desh anek aur nara ek hai.
is desh me vividhta me ekta hai.

Friday, 22 January, 2010  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

SACH KAHA HAI .... HAM LOGON KO APNI SOCH BADALNI HOGI NAHI TO AAPKI RACHNA SACH HO JAAYEGI ...

BAHUT DARD BHARI RACHNA HAI ... DESH MEIN BADLAAV JAROORI HAI AB ....

Friday, 22 January, 2010  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

देश-संस्कृति सिमट गई,
दूर-दराज किसी गाँव के द्वारे तक !
देश-प्रेम की भावना रह गई,
विविधता में एकता के नारे तक !!

वर्तमान परिवेश का सुन्दर चित्रण!

Friday, 22 January, 2010  
Blogger Pawan Kumar said...

क्या ही सुन्दर यथार्थ उकेरा है आपने....अनेकता में एकता यही हमारी पहचान भी है.........मगर कभी कभी यही टीस भी दे जाती है.....

Saturday, 23 January, 2010  

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