Wednesday, May 6, 2026

लॉकडाउन को-रोना-२०१९ की घरेलू हिंसा।


गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे थे,

तमाशबीन बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे से रूठे थे। 


डरी सूरत बता रही थी,बिखरे महीन कांच के टुकडो की,

कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे थे। 


ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,

इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे थे। 


पटकी जा रही थी हर चीज,जो पड़ जाए कर-कमल उनके,  

वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे थे। 


तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत', मनुहार मिलाना भूल गए,

फकत इतने भर से ही बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे थे।

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शुन्य

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