अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,
इक ज़माना था जो हम गाते,
तय पथ था और सफ़र अटल,
उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।
जागे है जब कुछ ऐसी तमन्ना
कि इक नये सांचे में ढल जाते,
नजर आता जो सुकून हमको,
कागज पर लफ्ज़ उतर जाते ।
सफर जारी है धीमे-धीमे मगर,
मुकर्रर वो रास्ते नहीं भाते,
घर की मुंडेरी पे बैठने को 'परचेत',
अब परिंदे भी नहीं आते।।
No comments:
Post a Comment