जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो,
उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर,
इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत',
अपना ग़म लेके इधर-उधर मत जाया कर।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो, उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर, इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत', अपना ग़म लेके इधर-उधर...
No comments:
Post a Comment