अब छोड देंगे वो भी पीछा करना,
हमारी परछाइयों का,
उनको भी रास आने लग गया है,
आलम ये तन्हाइयों का।
इक शुष्क दरिया समझते थे हमें
'परचेत', जो समंदर की चाह वाले,
उनको भी अब अंदाजा हो गया हैं,
हमारे दिल की गहराइयों का।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
उसका स्वरूप हरदम सराहता हूं, जिस रोशनी को दिल से चाहता हूं, आश लगाए रहता हूं कि रोशनी कभी तो मेरे घर आएगी, अतिशय प्रेममय होकर आलिंगनबद्...
सुंदर
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