एहसास

अब छोड देंगे वो भी पीछा करना,

हमारी परछाइयों का,

उनको भी रास आने लग गया है,

आलम ये तन्हाइयों का।

इक शुष्क दरिया समझते थे हमें 

'परचेत', जो समंदर की चाह वाले,

उनको भी अब अंदाजा हो गया हैं,

हमारे दिल की गहराइयों का।


Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

मुस्लिम बुद्धिजीवियों से सिर्फ एक सवाल !