अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,
इक ज़माना था जो हम गाते,
तय पथ था और सफ़र अटल,
उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।
जागी है जब कुछ ऐसी तमन्ना
कि इक नये सांचे में ढल जाते,
नजर आता जो सुकून हमको,
कागज पर लफ्ज़ उतर जाते ।
सफर जारी है धीमे-धीमे मगर,
मुकर्रर वो रास्ते नहीं भाते,
घर की मुंडेरी पे बैठने को 'परचेत',
अब परिंदे भी नहीं आते।।
सुंदर
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ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 13 मई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
भावपूर्ण रचना
ReplyDeleteसफर जारी है धीमे-धीमे
ReplyDeleteसुन्दर सफर