तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे
हम, तुम्हारे बाप के पास,
घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि
बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
मैंने ख्वाब देखा था, ख्वाहिश अधूरी रही, चाटने वाले चाट गए, प्लेट साफ पूरी रही।
यार, ये पढ़कर मैं हँस भी पड़ा और आपकी बेबसी भी समझ गया। आपने प्यार के चक्कर में जो हालत दिखाई, वो बिल्कुल रियल लगती है। “घंटों पैर दबाए” वाली लाइन तो सीन पूरा आँखों के सामने खड़ा कर देती है। आपने मज़ाक में ही सही, एक सच्चाई पकड़ ली कि कई बार इंसान कितना झुक जाता है।
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