सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर
एक पैग व्हिस्की,
कभी वो संग-सग पीती थी,
जब न तो आभासी दुनिया थी,
और ना ही वो इस कदर ,
अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी।
अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है,
आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
जिंदगीभर पकते रहे यह सुनते-सुनते कि नेगेटिव नहीं हमेशा पौजेटिव सोचो, काश कि जमाने को अस्पताल का यह दस्तूर भी पता होता कि नेगेटिव आए तो सही...
व्हिस्की रिस्की है |
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