वर्तमान तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,
उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,
बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,
सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
गर तुम न खरीददार होते, यकीन मानिए, टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर मे...
यह कविता मुझे दोस्त की तरह कंधे पकड़कर समझाती हुई लगती है। आप वर्तमान की कीमत साफ शब्दों में बताते हैं। आप भविष्य बेचने वालों और सड़कछाप नेताओं दोनों से दूरी रखने की बात सीधे कहते हैं। मुझे इसकी बेबाकी पसंद आती है।
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Deleteभविष्यवेत्ता | सही |
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