Sunday, January 25, 2026

राय

वर्तमान  तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,

उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,

बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,

सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।

4 comments:

  1. यह कविता मुझे दोस्त की तरह कंधे पकड़कर समझाती हुई लगती है। आप वर्तमान की कीमत साफ शब्दों में बताते हैं। आप भविष्य बेचने वालों और सड़कछाप नेताओं दोनों से दूरी रखने की बात सीधे कहते हैं। मुझे इसकी बेबाकी पसंद आती है।

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इल्तज़ा

  मोहब्बत मे, आंखों मे भर आए आंसुओं को गिरने न देना 'परचेत', क्योंकि प्यार के आंसू ही रूह की खुराक होते हैं।