Saturday, January 17, 2026

दिले नादान



याद तो होगा तुमको 

वो दौर-ए-जवानी,

इक दोराहे पर अचानक 

हम-तुम मिले थे,

जहां सड़क तो 

खाली-खाली थी मगर,

सड़क किनारे कुछ 

चाहत के फूल खिले थे।

शनै:-शनै: जब हमने 

कदम बढ़ाए उसतरफ, 

इधर, इसतरफ 

एक वीरान सा सहरा था, 

उधर एक अशांत  मन 

जमीं पे ठहरा था,

अंततः न तो छांव ही मिल पाई, 

न पानी ही,

ज़ख्म जो तुमने दिया था, 

बहुत गहरा था।


1 comment:

तिमाहियांत !

 मार्च तक का ब्रेक ले रहा हूं, मतलबी दोस्तों 🙏