हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा ,
कविता का सार जैसा,
प्रेम से गर प्यार ना निभे,
फिर प्यार का इजहार कैसा?
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
गर तुम न खरीददार होते, यकीन मानिए, टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर मे...
सुंदर
ReplyDeleteआपने चार पंक्तियों में सीधी बात कह दी और दिल छू लिया। आपने दोस्ती और प्यार को दिखावे से अलग रखा, यह बात मुझे बहुत पसंद आई। अगर इंसान साथ निभाता नहीं, तो बड़े-बड़े इज़हार का क्या मतलब, आपने बिलकुल सही सवाल उठाया।
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