Saturday, January 17, 2026

बहुरूपिये!

अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत, 

किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,

रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर

जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।

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चराग तले...

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