बहुरूपिये!

अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत, 

किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,

रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर

जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !