दिन-रात हो कि सुबह-शाम बस,
यही अफसोस कचोटता है हाए,
ऐ जिंदगी तुझे हम तमाम उम्र,
बड़े सलीके से नहीं रख पाए।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
आज उन्होंने जैसे मुझे, पानी पी-पीकर के कोसा, इंसानियत से 'परचेत', अब उठ गया है भरोसा।
कोशिश जारी रखिए सलीका आ जाएगा :)
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