Tuesday, January 13, 2026

समझ, नासमझ !

मिले न 'फूल' तो हमने 

'चतुरों' से दोस्ती कर ली,

मजबूरी का नाम गांधी, 

जिंदगी यूं ही बसर कर ली।





1 comment:

  1. गांधी और नेहरू दो हड्डी और कबाब हा हा

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वाहियात

आज उन्होंने जैसे मुझे,  पानी पी-पीकर के कोसा, इंसानियत से 'परचेत',  अब उठ गया है भरोसा।