गर तुम न खरीददार होते,
यकीन मानिए,
टके-दो-टके में भला कौन बिकता?
मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी
कभी,
बस, निवेश गलत किया है तुमने,
इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
गर तुम न खरीददार होते, यकीन मानिए, टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर मे...
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